जयशंकर का ऐतिहासिक अल्टीमेटम: UNSC में भारत को हक नहीं मिला, तो हमेशा के लिए शटडाउन हो जाएगा UN?

जयशंकर का ऐतिहासिक अल्टीमेटम: UNSC में भारत को हक नहीं मिला, तो हमेशा के लिए शटडाउन हो जाएगा UN?

संयुक्त राष्ट्र बचेगा या हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा? भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर का वो आखिरी अल्टीमेटम जिसने संयुक्त राष्ट्र की 80 साल पुरानी नींव को पूरी तरह से हिला कर रख दिया है! क्या साल 2027 तक दुनिया दो फाड़ हो जाएगी? अगर भारत को यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल यानी UNSC में वो जगह नहीं मिली जिसका वो असली हकदार है, तो क्या पूरा UN सिस्टम ही भरभराकर कोलैप्स कर जाएगा? बंद दरवाजों के पीछे जयशंकर की अरब देशों के साथ आखिर ऐसी क्या सीक्रेट डील हुई है जिसकी भनक वेस्टर्न मीडिया के बड़े-बड़े दिग्गजों को भी नहीं लगी? और 57 इस्लामिक देशों का वो कौन सा गुट है, जो भारत की बढ़ती रफ्तार को रोकने के लिए मध्य एशिया के एक छोटे से देश ताजिकिस्तान को मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रहा है? आज हम ग्लोबल पावर प्ले के उस डार्क रूम में घुसने वाले हैं, जहां 2028 की वोटिंग के नाम पर P-5 देशों से उनकी वीटो पावर का एकाधिकार छीनने की सबसे बड़ी बिसात बिछाई जा चुकी है।

शुरुआत में आपको लग रहा होगा कि ये सिर्फ दो साल की एक अस्थायी सदस्यता यानी नॉन-परमानेंट सीट का चुनाव है, इसमें नया क्या है? भारत इससे पहले भी 1950 से लेकर 2022 तक आठ बार, कुल सोलह साल तक UNSC का नॉन-परमानेंट मेंबर रह चुका है। तो इस बार ऐसा क्या तूफान आ गया है कि अभी से अमेरिका, चीन और पाकिस्तान के थिंक टैंक्स की रात की नींद उड़ी हुई है? असल में ये सिर्फ एक इलेक्शन कैंपेन नहीं है, ये एक बहुत बड़ा जिओपॉलिटिकल शिफ्ट है। भारत अब दुनिया को ये बताने नहीं गया है कि हम नियम मानने वाले यानी रूल टेकर हैं, बल्कि भारत ये तय करने गया है कि अब से ग्लोबल नियम बनाए कैसे जाएंगे। 2028-29 का ये टर्म सिर्फ एक झांसा है, एक ड्रेस रिहर्सल है। भारत का असली निशाना संयुक्त राष्ट्र में परमानेंट सीट और वीटो पावर हासिल करना है। जयशंकर ने न्यू यॉर्क से जो बिगुल फूंका है, वो एक उभरती हुई महाशक्ति की वो दहाड़ है, जो दुनिया को साफ-साफ बता रही है कि अगर पुराने मॉडल पर चल रही इस संस्था ने खुद को आज की जमीनी सच्चाइयों के हिसाब से नहीं बदला, तो इसका हाल भी लीग ऑफ नेशंस की तरह होगा, यानी टोटल शटडाउन और पूर्ण पतन।

OIC का चक्रव्यूह और पाकिस्तान का ‘कॉफ़ी क्लब’

लेकिन इस बार का रास्ता उतना आसान नहीं है जितना पिछली आठ बार था। जून 2027 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में चुनाव होने हैं। एशिया-पैसिफिक ग्रुप की इस इकलौती सीट के लिए भारत का सीधा मुकाबला मध्य एशिया के देश ताजिकिस्तान से है। ग्लोबल इकॉनमी और मिलिट्री पावर के लिहाज से सुनने में ताजिकिस्तान बहुत छोटा प्रतिद्वंदी लगता है, लेकिन जिओपॉलिटिक्स में जो सामने दिखता है, असली खेल उसके बहुत पीछे चल रहा होता है। ताजिकिस्तान के पीछे पर्दे के असली खिलाड़ी छुपे हुए हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि ताजिकिस्तान को 57 देशों वाले ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी OIC ने अपना पूरा और आधिकारिक समर्थन दे दिया है। इसका सीधा मतलब ये है कि 57 इस्लामिक देशों का एकमुश्त वोट बैंक एक ब्लॉक की तरह ताजिकिस्तान के खाते में ट्रांसफर करने की स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है। पाकिस्तान इस पूरे गेम में ताजिकिस्तान का सबसे बड़ा चीयरलीडर बना हुआ है, क्योंकि उसका इकलौता मकसद भारत को ग्लोबल मंच पर ब्लॉक करना और कश्मीर जैसे मुद्दों पर इंटरनेशनल नेरेटिव को मैनिपुलेट करना है।

अब जरा इस वोटिंग के गणित को गहराई से समझिए। संयुक्त राष्ट्र में कुल 193 सदस्य देश हैं। इस चुनाव को जीतने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी कम से कम 129 देशों का वोट चाहिए। अगर OIC के 57 देशों ने एक साथ ताजिकिस्तान को वोट कर दिया, तो भारत के लिए 129 का वो जादुई आंकड़ा छूना बहुत बड़ी चुनौती बन सकता है। इसके अलावा एक और बहुत बड़ा रोड़ा है जिसे कॉफी क्लब कहा जाता है। 1990 के दशक में बना ये कॉफी क्लब, जिसे यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस भी कहते हैं, दुनिया के उन देशों का एक सीक्रेट और बहुत ही अग्रेसिव गठजोड़ है, जिसका एकमात्र मकसद भारत, ब्राजील, जापान और जर्मनी जैसे G-4 देशों को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने से रोकना है। इस क्लब में इटली, पाकिस्तान, तुर्की और अर्जेंटीना जैसे देश शामिल हैं। इनका एजेंडा बहुत क्लियर है। इटली किसी भी कीमत पर जर्मनी को पावरफुल नहीं होने देना चाहता, अर्जेंटीना ब्राजील का रास्ता रोकता है, और पाकिस्तान का तो काम ही भारत के हर कदम का आंख बंद करके विरोध करना है।

चाणक्य नीति और सीक्रेट बैलेट का मास्टरस्ट्रोक

अब सवाल ये उठता है कि क्या ये कॉफी क्लब और मुस्लिम लीग मिलकर भारत का रास्ता रोक पाएंगे? क्या भारत इस चक्रव्यूह में फंस जाएगा? यहीं पर आता है इस पूरी स्ट्रैटेजी का सबसे बड़ा ट्विस्ट और भारत का नया गेम प्लान। इस मास्टरप्लान के चीफ आर्किटेक्ट हैं भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर। जयशंकर की चाणक्य नीति ये बहुत अच्छी तरह जानती है कि OIC कागजों पर भले ही एक ब्लॉक की तरह काम करता हो, लेकिन जब इंटरनेशनल वोटिंग की बारी आती है, तो दुनिया का हर देश अपने नेशनल इंटरेस्ट और इकॉनमिक सर्वाइवल को सबसे ऊपर रखता है। इसीलिए भारत ने मल्टीलेटरल मंचों की जगह बाइलेटरल यानी द्विपक्षीय कूटनीति का ब्रह्मास्त्र निकाल लिया है। अगर आप पिछले कुछ महीनों का जिओपॉलिटिकल ट्रेंड देखें, तो आपने ध्यान दिया होगा कि जयशंकर ने कतर, बहरीन, कुवैत, ओमान और यूएई जैसे बड़े खाड़ी देशों का ताबड़तोड़ दौरा किया है। ये दौरे कोई रूटीन विजिट्स नहीं थे, ये OIC के वोट बैंक में सेंधमारी करने का सबसे बड़ा जिओ-इकोनॉमिक ऑपरेशन है।

आपको ये समझना होगा कि UN के अंदर चुनाव सीक्रेट बैलेट के जरिए होता है। किसी को कानों-कान खबर नहीं होती कि किसने किस देश के पक्ष में बटन दबाया है। भारत इसी सीक्रेट वोटिंग का पूरा फायदा उठाने वाला है। कागजों पर भले ही अरब देश OIC के दबाव में ताजिकिस्तान के साथ खड़े दिखने का दिखावा करें, लेकिन बंद कमरों के अंदर होने वाली डील्स का सच कुछ और ही है। भारत आज यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर बन चुका है। इन अरब देशों को बहुत अच्छी तरह पता है कि उनकी फूड सिक्योरिटी, उनके मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और फ्यूचर टेक्नोलॉजी का विजन भारत के बिना पूरी तरह अधूरा है। जब 2027 में सीक्रेट वोटिंग का वक्त आएगा, तो यही देश अपनी अर्थव्यवस्था और भारत के साथ अपने स्ट्रैटेजिक रिश्तों को चुनेंगे, ना कि पाकिस्तान द्वारा बनाए गए किसी इस्लामिक ब्लॉक के खोखले एजेंडे को।

समंदर का सिकंदर: लैंडलॉक्ड बनाम ब्लू वाटर नेवी

अब उस सच की बात करते हैं जिसे दुनिया के बड़े देश छिपाने की कोशिश कर रहे हैं और जयशंकर ने जिसे दुनिया के सामने पूरी तरह एक्सपोज कर दिया है। जयशंकर ने न्यू यॉर्क में अपने अभियान की शुरुआत करते हुए सबसे ज्यादा जोर अगर किसी एक चीज पर दिया है, तो वो है मैरीटाइम सिक्योरिटी यानी समुद्री रास्तों की सुरक्षा। आखिर भारत ने इस मुद्दे को अपना सबसे बड़ा हथियार क्यों बनाया है? इस वक्त पूरी दुनिया की सप्लाई चेन एक टाइम बम पर बैठी है। रेड सी, गल्फ ऑफ अदन और होर्मुज स्ट्रेट में हूती विद्रोहियों और समुद्री लुटेरों ने आतंक मचा रखा है। ईरान के खिलाफ चल रहे अमेरिका और इजरायल के संघर्ष ने दुनिया भर के कमर्शियल जहाजों का रास्ता ब्लॉक कर दिया है। अमेरिका और यूरोप का समुद्री व्यापार अरबों डॉलर का नुकसान झेल रहा है। ग्लोबल फ्यूल के दाम किसी भी वक्त आसमान छू सकते हैं और वैश्विक महंगाई बेकाबू हो सकती है। पश्चिमी एशिया में चल रहे इस क्राइसिस के बीच दुनिया भर के क्रू मेंबर्स खतरे में हैं।

ऐसे में दुनिया की नजरें सुरक्षा के लिए किस देश पर टिकी हैं? क्या कोई ताजिकिस्तान से मदद मांग रहा है? ताजिकिस्तान तो खुद एक लैंडलॉक्ड देश है, जिसके पास समंदर का एक कतरा तक नहीं है। वो समुद्री लुटेरों से लड़ना तो दूर, अपने खुद के लॉजिस्टिक्स के लिए दूसरों पर पूरी तरह निर्भर है। वहीं दूसरी तरफ भारत है, जिसकी ब्लू वाटर नेवी आज इंडो-पैसिफिक से लेकर अरेबियन सी तक पूरी दुनिया के कमर्शियल जहाजों को रेस्क्यू कर रही है। पिछले महीनों के ऑपरेशन्स का डेटा निकाल कर देखिए, इंडियन नेवी ने दर्जनों जहाजों को हाईजैक होने से बचाया है, ड्रोन अटैक्स को न्यूट्रलाइज किया है, और सबसे बड़ी बात, इनमें कई विदेशी नाविक भी शामिल थे जिनकी जान भारत ने बचाई है। जयशंकर ने दुनिया को बहुत ही सलीके से याद दिलाया है कि यूएन कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी यानी UNCLOS के नियमों का पालन अगर कोई देश ताकत के साथ करवा सकता है, तो वो सिर्फ भारत है। अगर ग्लोबल मैरीटाइम ट्रेड को सुरक्षित रखना है, तो सुरक्षा परिषद में भारत का बैठना सिर्फ भारत का शौक नहीं है, बल्कि अमेरिका, यूरोप और पूरी दुनिया के इकॉनमिक सर्वाइवल की सबसे बड़ी जरूरत है।

भारत का ‘शांति’ एजेंडा और वेस्टर्न हेजेमनी को चुनौती

भारत ने अपनी इस पूरी अग्रेसिव स्ट्रैटेजी को एक ही शब्द में पिरोया है, जिसे जयशंकर ने ‘शांति’ यानी SHANTI कहा है। ये कोई आम नारा या जुमला नहीं है, इसका फुल फॉर्म है – Securing Holistic Advancement through Norms, Trust and Integrity। ये एक बेहद शार्प विजन डॉक्यूमेंट है जो दुनिया को बता रहा है कि भारत UN में क्या करने जा रहा है। इसके तहत भारत ने छह बड़ी प्राथमिकताएं तय की हैं जो सीधे-सीधे वेस्टर्न हेजेमनी को चुनौती देती हैं। इस शांति एजेंडे की पहली और सबसे बड़ी प्राथमिकता है ग्लोबल साउथ की आवाज बनना। आज दुनिया के गरीब और विकासशील देश कर्ज के जाल में फंसे हैं। चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के नाम पर आधे अफ्रीका और एशिया के देशों को इकॉनमिक कोलैप्स की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। जब बड़े देश इन छोटे देशों की बात दबा देते हैं, तब भारत उनके लिए एक भरोसेमंद विकल्प बनकर उभरा है।

याद कीजिए G-20 का वो ऐतिहासिक पल, जब भारत ने अपनी कूटनीतिक ताकत के दम पर 55 देशों वाले अफ्रीकन यूनियन को परमानेंट मेंबर बनवाया था। उस एक फैसले ने पूरे अफ्रीकन महाद्वीप में भारत की साख को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है जहां चीन और वेस्टर्न देश कभी नहीं पहुंच सकते। अफ्रीका के पास UN में 54 वोट हैं, और लैटिन अमेरिका के पास 33 वोट। भारत का असली गेम प्लान इन 87 वोटों को अपने पाले में करना है। अगर भारत ने इन देशों का भरोसा जीत लिया, तो ताजिकिस्तान और पाकिस्तान का गेम वहीं पर खत्म हो जाएगा।

दूसरी बड़ी प्राथमिकता है यूएन रिफॉर्म्स। भारत अब दबे शब्दों में नहीं, बल्कि खुलेआम कह रहा है कि पांच देशों के पास वीटो पावर होना आज की मॉडर्न दुनिया का सबसे बड़ा मजाक है। 1945 में जब UN बना था, तब दुनिया की आबादी, इकॉनमी और जिओपॉलिटिक्स का नक्शा कुछ और था। और अगर आपको लग रहा है कि इस वीटो पावर के खिलाफ सिर्फ भारत लड़ रहा है, तो आप गलत हैं। पर्दे के पीछे अब खुली बगावत शुरू हो चुकी है। हाल ही में मलेशिया और फिनलैंड ने P-5 देशों के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। मलेशिया के उप विदेश मंत्री ने साफ शब्दों में कह दिया है कि वीटो पावर पूरी तरह से अनुचित है और इसे खत्म कर दिया जाना चाहिए। मलेशिया का सीधा आरोप है कि वैश्विक संकटों के दौरान इन महाशक्तियों ने अपनी वीटो पावर का जिस तरह से गलत इस्तेमाल किया है, उसने UNSC की विश्वसनीयता को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है। वहीं यूरोप से भी आवाजें उठने लगी हैं। फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने कड़े शब्दों में मांग की है कि UNSC में व्यापक सुधार होने चाहिए और P-5 देशों की इस मनमानी शक्ति को अब खत्म किया जाना चाहिए।

वीटो पावर पर भारत का कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक

अब जरा सोचिए, जब दुनिया भर में वीटो पावर के खिलाफ इतना गुस्सा है, तो भारत ने क्या किया? भारत ने यहां एक ऐसा कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक खेला है जिसने P-5 देशों की बोलती बंद कर दी है। भारत लंबे समय से UNSC में सुधारों की वकालत कर रहा है, लेकिन भारत का ऑफिशियल स्टैंड वीटो पावर को तुरंत छीनने का नहीं, बल्कि परमानेंट सदस्यता का दायरा बढ़ाने का है। भारत ने G-4 देशों के साथ मिलकर एक ऐसा प्रस्ताव पेश किया है जिसे सुनकर अमेरिका और चीन हैरान रह गए। भारत ने कहा है कि अगर हमें स्थायी सदस्यता मिलती है, तो हम शुरुआती 15 वर्षों के लिए अपनी वीटो पावर का इस्तेमाल टालने पर सहमत हो सकते हैं। भारत की शर्त सिर्फ इतनी है कि UNSC में भेदभावपूर्ण टू-टियर व्यवस्था यानी दो अलग-अलग स्तर की स्थायी सदस्यता नहीं बननी चाहिए। भारत का ये दांव दरअसल P-5 देशों के उस बहाने को खत्म करने के लिए है जिसमें वो कहते हैं कि ज्यादा देशों को वीटो देने से फैसला लेने में देरी होगी। भारत ने साफ कर दिया है कि हमें पावर का घमंड नहीं है, हमें सिर्फ ग्लोबल टेबल पर अपनी सही जगह चाहिए।

यही वजह है कि भारत के शांति विजन को अब दुनिया भर से अभूतपूर्व समर्थन मिल रहा है। पोलैंड जैसे ताकतवर यूरोपीय देश आज खुलकर 2028-29 के लिए भारत की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे हैं। पोलैंड का ये भारी समर्थन कोई छोटी बात नहीं है, ये दिखाता है कि यूरोप भी अब मान चुका है कि भारत के बिना भविष्य की ग्लोबल सुरक्षा नीतियां नहीं बन सकतीं। तीसरी प्राथमिकता है मॉडर्न पीसकीपिंग। यूनाइटेड नेशंस में सबसे ज्यादा शांति सैनिक भेजने वाले देशों में भारत का नाम सबसे ऊपर आता है। सालों से खून हमारे जवानों का बहता आ रहा है, लेकिन फैसले वो देश बंद कमरों में लेते हैं जिनकी जमीन पर कोई जंग नहीं हो रही और जिनका कोई सैनिक नहीं मर रहा। भारत अब इस अन्याय को बर्दाश्त नहीं करेगा। शांति सेनाओं को नई तकनीक और नई चुनौतियों के हिसाब से तैयार करने की वकालत भारत ने बहुत मजबूती से की है।

चौथी और पांचवीं प्राथमिकताएं सीधे तौर पर फ्यूचर वॉरफेयर और ग्लोबल टेररिज्म से जुड़ी हैं। भारत ने दुनिया में पहली बार UN के मंच पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के गलत इस्तेमाल को ग्लोबल सिक्योरिटी के लिए एक बड़ा खतरा बताकर एक बिल्कुल नया नैरेटिव सेट कर दिया है। इसके साथ ही टेरर फंडिंग को रोकने का सीधा अल्टीमेटम दिया गया है। ये सीधा इशारा पाकिस्तान और उन ताकतों की तरफ है, जो आतंकवाद को एक स्टेट पॉलिसी की तरह इस्तेमाल करते हैं। जयशंकर ने साफ कर दिया है कि आतंकवादियों तक पहुंचने वाली मनी सप्लाई और रिसोर्सेज को पूरी तरह चोक किए बिना कोई भी ग्लोबल शांति संभव नहीं है।

अब जरा भारत और ताजिकिस्तान की हैसियत का एक डेटा ड्रिवन कंपैरिजन देखिए। एक तरफ भारत है, जो 3.7 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी है, एक न्यूक्लियर पावर है, जिसकी स्पेस एजेंसी चांद के साउथ पोल पर उतर चुकी है और जिसकी सेना दुनिया की टॉप मिलिट्री पावर्स में गिनी जाती है। भारत के पास 16 साल तक इस सुरक्षा परिषद में बैठने का विशाल कूटनीतिक अनुभव है। दूसरी तरफ ताजिकिस्तान है, जो पहली बार अपनी किस्मत आजमा रहा है। ग्लोबल इकॉनमी में उसका प्रभाव ना के बराबर है और उसका पूरा फोकस सिर्फ मध्य एशिया की क्षेत्रीय सुरक्षा और पानी के बंटवारे तक सीमित है। ऐसे में क्या ताजिकिस्तान दुनिया के बड़े क्राइसिस को सॉल्व कर सकता है? क्या वो ग्लोबल साउथ की आवाज बन सकता है? बिल्कुल नहीं। ताजिकिस्तान को मिलने वाला ये इस्लामिक सपोर्ट सिर्फ एक पॉलिटिकल टूल है, जिसका इस्तेमाल भारत की बढ़ती हुई बार्गेनिंग पावर को चेक करने के लिए किया जा रहा है।

लेकिन मॉडर्न इंडिया अब डिफेंसिव नहीं खेलता। पोलैंड के साथ-साथ अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, ऑस्ट्रिया और कई अन्य यूरोपीय देशों ने भारत का खुला समर्थन कर दिया है। ये बड़े पावर ब्लॉक्स बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि एशिया में चीन के दबदबे को अगर कोई मिलिट्री और इकॉनमिक लेवल पर संतुलित कर सकता है, तो वो सिर्फ भारत है। दुनिया भर की कैपिटल मार्केट्स भारत में इन्वेस्ट कर रही हैं, और ग्लोबल सप्लाई चेन को चीन से बाहर निकालकर भारत में शिफ्ट किया जा रहा है। ऐसे में भारत को UNSC से बाहर रखना खुद वेस्टर्न वर्ल्ड के लिए एक सुसाइडल कदम साबित होगा।

सोचिए, अगर भारत 2028-29 में एक भारी बहुमत के साथ सुरक्षा परिषद में एंट्री करता है, तो इसका असल इंपैक्ट क्या होगा? ये सिर्फ 129 वोटों की जीत नहीं होगी, ये उन देशों का एक ऑफिशियल डिक्लेरेशन होगा कि वो अब मुट्ठी भर वीटो पावर वाले देशों की मोनोपॉली से तंग आ चुके हैं। मोदी सरकार की विदेश नीति ने पिछले कुछ सालों में जिस तरह से भारत की स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी को दुनिया के सामने पेश किया है, वो बेमिसाल है। चाहे वो पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद रूस से तेल खरीदना हो, या फिर अमेरिका के साथ जेट इंजन्स और क्रिटिकल टेक्नोलॉजी की डील्स करना हो, भारत ने हर बार अपने नेशनल Interest को सर्वोपरि रखा है। ये कॉन्फिडेंस बताता है कि हम अब किसी गुट के पीछे चलने को तैयार नहीं हैं, हम खुद अपना गुट बनाते हैं।

अब ये जिओपॉलिटिक्स की लड़ाई पूरी तरह आर या पार की हो चुकी है। 2027 की वोटिंग का वो दिन सिर्फ भारत का भविष्य तय नहीं करेगा, बल्कि ये तय करेगा कि यूनाइटेड नेशंस नाम की ये संस्था आगे सरवाइव करेगी या इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दफन हो जाएगी। ताजिकिस्तान के कंधे पर बंदूक रखकर भारत को रोकने का जो खौफनाक प्लान कॉफी क्लब और पाकिस्तान ने बनाया है, जयशंकर ने अपनी अरेबियन डिप्लोमेसी और इंडियन नेवी की ताकत से उस प्लान की धज्जियां उड़ाने की शुरुआत कर दी है। भारत अब सिर्फ अपनी जगह मांग नहीं रहा है, बल्कि दुनिया को मजबूर कर रहा है कि वो नए ग्लोबल ऑर्डर को स्वीकार करे। असली खेल तो अब शुरू हुआ है और 2027 के चुनाव तक इस ग्लोबल चेसबोर्ड पर अभी कई मोहरे कटेंगे, कई सीक्रेट डील्स होंगी और कई नई चालें चली जाएंगी।

दोस्तों, संयुक्त राष्ट्र में सुधारों और भारत की इस कूटनीतिक जंग के बारे में आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि भारत के बिना संयुक्त राष्ट्र वाकई अप्रासंगिक हो जाएगा, या फिर कॉफी क्लब भारत का रास्ता रोकने में कामयाब रहेगा? नीचे कमेंट्स में अपना पॉइंट ऑफ व्यू जरूर शेयर करें, मैं आपके जवाब का इंतजार करूंगा।

You Might Also Like

View More

Latest & Breaking Updates

All Stories