ड्रैगन और रूस के हथियारों को कचरे में फेंक भारत से डिफेंस डील क्यों कर रहे हैं दुनिया के देश?

ड्रैगन और रूस के हथियारों को कचरे में फेंक भारत से डिफेंस डील क्यों कर रहे हैं दुनिया के देश?

भारतीय रक्षा निर्यात का यह नया अध्याय अब दुनिया के सबसे बड़े रक्षा दिग्गजों की नींद उड़ा रहा है। एक समय था जब भारत अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका, रूस, फ्रांस और इजरायल जैसे देशों पर निर्भर था और दुनिया उसे सिर्फ एक हथियार आयातक के रूप में जानती थी। लेकिन पिछले एक दशक में मोदी सरकार की लीडरशिप में एक ऐसी खामोश सामरिक क्रांति हुई है, जिसने वैश्विक रक्षा बाजार का पूरा भूगोल ही बदल कर रख दिया है। आज भारत सिर्फ हथियारों का खरीदार नहीं है, बल्कि एक ऐसा नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर बन चुका है जो साउथ-ईस्ट एशिया से लेकर मिडिल-ईस्ट और काकेशस तक के देशों को अपनी अत्याधुनिक मिसाइलें, रडार और आर्टिलरी सिस्टम एक्सपोर्ट कर रहा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट अपने ऑल-टाइम हाई 38,424 करोड़ रुपये यानी लगभग 4.6 बिलियन डॉलर्स पर पहुंच गया है। पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले यह 63 प्रतिशत की जबर्दस्त छलांग है। इस महा-निर्यात में पब्लिक सेक्टर का योगदान 55 प्रतिशत और प्राइवेट सेक्टर का योगदान 45 प्रतिशत रहा है। ये आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि भारत अब दुनिया को सिर्फ छोटे-मोटे पुर्जे नहीं, बल्कि युद्ध के मैदान का पूरा सामरिक पैकेज डिलीवर कर रहा है।

काकेशस के पहाड़ों में हुए हालिया संघर्षों ने हथियारों के बाजार की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। नागोर्नो-काराबाख युद्ध के दौरान अर्मेनिया के पुराने रूसी एयर डिफेंस सिस्टम ड्रोन हमलों के सामने फेल हो गए थे। ऐसे में अर्मेनिया ने भारत के साथ लगभग 720 मिलियन डॉलर्स की मेगा-डील साइन की और आकाश 1एस एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा। आकाश 1एस में स्वदेशी एक्टिव रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर लगा है जो मिसाइल के टर्मिनल फेज में खुद अपने शिकार को ढूंढकर नष्ट कर देता है। इसका राजेंद्र फेस्ड-अरे रडार एक साथ कई टारगेट्स को ट्रैक करने में सक्षम है। इसके साथ ही अर्मेनिया ने पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम भी खरीदा जिसकी एक बैटरी महज 44 सेकंड में 72 रॉकेट दागकर दुश्मन के पूरे इलाके को तबाह कर सकती है। भारत ने स्वाथी वेपन लोकेटिंग रडार भी दिए हैं जो दुश्मन की तोप से दागे गए शेल को ट्रैक कर उसके सटीक जीपीएस कोऑर्डिनेट्स सेकंडों में निकाल लेते हैं।

अर्मेनिया में भारतीय हथियारों की इस सफलता को देखकर सेंट्रल एशिया के ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे देश भी सोवियत युग के पुराने हथियारों को छोड़कर भारत के आकाश 1एस सिस्टम की ओर रुख कर रहे हैं। रूस खुद यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है और अपने सैनिकों को साजो-सामान देने में व्यस्त है। ऐसे में इन देशों को एक ऐसे मोबाइल एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत है जो सस्ता भी हो और अचूक भी। भारत हाई इंडिजिनस कंटेंट होने की वजह से इन्हें टेक्नोलॉजी कोऑपरेशन और लॉन्ग-टर्म मेंटेनेंस सपोर्ट भी दे रहा है जो चीन और रूस कभी नहीं देते।

साउथ चाइना सी में चीन की दादागिरी का मुकाबला करने के लिए भारत ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का पत्ता फेंका है। ब्रह्मोस मैक 2.8 की रफ्तार से उड़ान भरती है और इसे रडार पर पकड़ना लगभग नामुमकिन है। फिलीपींस ने अपनी नौसेना के लिए ब्रह्मोस की तीन बैटरियां खरीदी हैं जिससे उसे एंटी-एक्सेस एरिया डिनायल की ताकत मिल गई है। इस डील के बाद वियतनाम, इंडोनेशिया और मिडिल-ईस्ट के कई देश भी इस मिसाइल को खरीदने के लिए कतार में खड़े हो गए हैं।

इसके अलावा भारत प्रलय टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल को भी एक्सपोर्ट मार्केट में उतारने की तैयारी कर रहा है। यह एक क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल है जो उड़ान के टर्मिनल फेज में अपना रास्ता बदल सकती है जिससे पैट्रियट और थाड जैसे एयर डिफेंस सिस्टम भी धोखा खा जाते हैं। मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजिम की गाइडलाइंस का पालन करते हुए इस मिसाइल का 290 किलोमीटर रेंज वाला एक्सपोर्ट वेरिएंट तैयार किया गया है जिसे खरीदने के लिए आर्मेनिया सहित कई एशियाई देश बेताब हैं। हवा में दुश्मन के फाइटर जेट्स को ढेर करने के लिए अस्त्र बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल भी मलेशिया, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों के लिए एक नया और बेहतर विकल्प बनकर उभरी है।

ब्राज़ील की वायुसेना के साथ तेजस मार्क 1ए फाइटर जेट को लेकर भी बड़ी चर्चाएं चल रही हैं। ब्राज़ील को रूटीन एयर डिफेंस और बॉर्डर पेट्रोल के लिए एक किफायती मल्टीरोल फाइटर चाहिए जिस पर तेजस पूरी तरह फिट बैठता है। इसके अलावा भारत और ब्राज़ील के बीच एक संभावित बार्टर डील का एंगल भी है जिसमें भारत ब्राज़ील से ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट खरीद सकता है और बदले में ब्राज़ील भारत से तेजस फाइटर्स ले सकता है। इजिप्ट और नाइजीरिया के साथ भी तेजस की डील अंतिम चरण में है।

आखिर दुनिया के तमाम देश अमेरिका, रूस और चीन को छोड़कर भारत की तरफ क्यों खिंचे चले आ रहे हैं? इसके पीछे मुख्य रूप से तीन कारण हैं। पहला कारण नो पॉलिटिकल ब्लैकमेल है। अमेरिकी हथियारों की तरह भारत अपने हथियारों के साथ कोई अनुचित पाबंदियां या शर्तें नहीं लगाता। चीन के हथियारों की तरह भारत अपने खरीदारों को डेट ट्रैप में नहीं फंसाता। दूसरा कारण बेहतरीन कॉस्ट-टू-परफॉरमेंस रेशियो है जहाँ पश्चिमी देशों के मुकाबले भारतीय हथियार काफी किफायती और नाटो स्टैंडर्ड्स के अनुकूल हैं। तीसरा कारण भारत का डिफेंस लाइन ऑफ क्रेडिट है जिसके तहत मित्र देशों को सॉफ्ट लोन दिए जा रहे हैं। इन सभी वजहों से भारत ग्लोबल डिफेंस मार्केट में एक नया और मजबूत पावर सेंटर बनकर उभर रहा है।

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