22 जून 2016 की वह सुबह, जब पूरी दुनिया की निगाहें भारत के पूर्वी तट पर टिक गई थीं। अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश अपनी सांसें थामे हुए आसमान की तरफ देख रहे थे। एक वो दौर था जब पश्चिमी देश हमारी तकनीक का, हमारे वैज्ञानिकों का खुलेआम मजाक उड़ाते थे। लेकिन उस दिन श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के लॉन्च पैड पर भारत का बाहुबली रॉकेट, पीएसएलवी-सी34 आग उगलने के लिए पूरी तरह से तैयार खड़ा था। उस वक्त अमेरिका, जर्मनी, कनाडा और इंडोनेशिया के बड़े-बड़े स्पेस एक्सपर्ट्स के पसीने छूट रहे थे। इसका कारण यह था कि उनके खुद के सैटेलाइट, उनकी करोड़ों डॉलर की बेशकीमती मशीनें, भारत के इसी रॉकेट के साथ बंधकर अंतरिक्ष में जाने का इंतजार कर रही थीं। एक समय जो विदेशी ताकतें हमें नीचा दिखाती थीं, आज वही दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्तियां अपनी मशीनें सुरक्षित अंतरिक्ष में भेजने के लिए इसरो की चौखट पर हाथ बांधे खड़ी थीं। तभी एक भयंकर धमाका हुआ और इस बाहुबली रॉकेट ने अपना वो काम कर डाला, जिसने पूरी दुनिया के स्पेस मार्केट को जड़ से हिला कर रख दिया।
आखिर 22 जून की उस सुबह 9 बजकर 26 मिनट पर ऐसा कौन सा चमत्कार हुआ था जिसने ग्लोबल स्पेस इंडस्ट्री के समीकरण हमेशा के लिए बदल दिए? और कैसे सिर्फ 16 मिनट के अंदर भारतीय वैज्ञानिकों ने वो कर दिखाया जिसे करने में बड़े-बड़े विकसित देशों के हाथ-पैर कांप जाते हैं?
श्रीहरिकोटा के उस हाई-टेक कंट्रोल रूम में उस दिन माहौल किसी वर्ल्ड कप फाइनल के आखिरी ओवर से भी ज्यादा तनावपूर्ण था। हर एक वैज्ञानिक की सांसें थमी हुई थीं और कंप्यूटर स्क्रीन्स पर डेटा बिजली की रफ्तार से दौड़ रहा था। मिशन कोई छोटा-मोटा नहीं था। चुनौती थी 20 अलग-अलग सैटेलाइट्स को एक साथ अंतरिक्ष में उनकी बिल्कुल सटीक जगह पर पहुंचाना। इसे एकदम सरल भाषा में समझें तो यह एक ऐसी डिलीवरी वैन चलाने जैसा था, जिसे 20 अलग-अलग नाजुक पार्सल, 20 अलग-अलग घरों में, वह भी बुलेट ट्रेन से हजारों गुना तेज रफ्तार से दौड़ते हुए बिल्कुल सही समय पर फेंकने थे। जरा सी चूक, जरा सी भी टाइमिंग की गड़बड़ का सीधा मतलब था करोड़ों डॉलर की मशीनें हमेशा के लिए अंतरिक्ष के कचरे में तब्दील हो जाना और देशों के बीच कूटनीतिक भूचाल आ जाना। यह वह समय था जब इसरो एक ऐसे महामिशन को अंजाम देने जा रहा था जिसका मानसिक दबाव किसी भी आम इंसान को पूरी तरह तोड़ कर रख दे।
इस महामिशन का असली हीरो था भारत का सबसे भरोसेमंद और शक्तिशाली रॉकेट, पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल यानी पीएसएलवी। यह कोई साधारण लोहे और टाइटेनियम का ढांचा नहीं है। इसे दुनिया भर में अंतरिक्ष का सबसे मजबूत, अचूक और सटीक डिलीवरी बॉय माना जाता है। सी34 मिशन अपने आप में इसलिए भी पूरी दुनिया का सबसे अलग मिशन बन गया था क्योंकि इसमें जो पेलोड था, वह कोई आम वजन नहीं था। रॉकेट के सबसे ऊपरी हिस्से में कुल 1288 किलोग्राम का भारी-भरकम वजन बेहद बारीकी और इंजीनियरिंग के परफेक्शन के साथ पैक किया गया था। इतने विशाल वजन को लेकर पृथ्वी की जबर्दस्त ग्रेविटी को चीरते हुए बाहर निकलना और फिर हर एक सैटेलाइट को बिना एक दूसरे से टकराए स्पेस में अलग करना, एक ऐसी खतरनाक चुनौती थी जिसने बड़े-बड़े विदेशी इंजीनियरों के दिमाग को उलझा कर रख दिया था।
भारत की पैनी आंख: कार्टोसैट-2 का जादुई कमाल
इस पूरे ऐतिहासिक मिशन का सबसे बड़ा और चमकता हुआ सितारा था भारत का अपना कार्टोसैट-2 सीरीज का सैटेलाइट। इसका कुल वजन 727.5 किलोग्राम था और यह कोई मामूली कैमरा नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में बैठकर धरती पर नजर रखने वाली भारत की एक बेहद तेज और पैनी आंख है। कार्टोसैट-2 को ऐसे अत्याधुनिक और सेंसिटिव कैमरों से लैस किया गया था जो पृथ्वी से सैकड़ों किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष के घने अंधेरे में बैठकर भी जमीन पर खड़ी एक छोटी सी कार की बिल्कुल साफ और अचूक तस्वीर ले सकते हैं। इन कैमरों की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन्होंने भारत की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के विकास दोनों की तस्वीर पूरी तरह से बदल कर रख दी। यह सिर्फ एक मशीन नहीं थी, बल्कि आसमान से देश की निगरानी करने वाला एक साइलेंट गार्ड बन गया था जो दुश्मनों की हर चाल पर बारीक नजर रख सकता था।
जमीन से लेकर आसमान तक, कार्टोसैट-2 ने हर उस जगह अपना कमाल दिखाया जहां भारत को सटीक और लाइव जानकारी की जरूरत थी। चाहे वह भविष्य के स्मार्ट शहरों की बेहतरीन प्लानिंग करनी हो, दूर-दराज के गांवों में पक्की सड़कों का मजबूत जाल बिछाना हो, घने जंगलों और सूखते पानी के स्रोतों पर नजर रखनी हो, या फिर समुद्र के किनारे वाले तटीय इलाकों का बारीकी से अध्ययन करना हो, इस सैटेलाइट ने हर मोर्चे पर एकदम अचूक डेटा इसरो के कमांड सेंटर में भेजना शुरू कर दिया। सबसे बड़ी बात यह थी कि हमारे सुरक्षा बलों और सेना को सीमा पार की हर छोटी-बड़ी हरकत का लाइव और सटीक अपडेट मिलने लगा। आसान शब्दों में कहें तो यह तकनीक देश के लिए एक ऐसा डिजिटल ब्रह्मास्त्र साबित हुई जिसने जमीन पर होने वाले हर बदलाव को सीधा इसरो के सर्वर पर लाकर रख दिया।
विदेशी महाशक्तियों का भारत के सामने सरेंडर
कार्टोसैट-2 के साथ 19 और सैटेलाइट्स इस रॉकेट के अंदर बिल्कुल सटीकता से फिट किए गए थे। पूरी दुनिया के लिए सबसे ज्यादा हैरानी और भारत के लिए सबसे बड़े गौरव की बात यह थी कि इनमें से 13 सैटेलाइट सीधे अमेरिका के थे। जी हां, वही अमेरिका जिसके पास नासा जैसी भारी-भरकम बजट वाली दुनिया की सबसे पुरानी स्पेस एजेंसी मौजूद है। इसके अलावा टेक्नोलॉजी में खुद को बॉस मानने वाले कनाडा के दो, इंजीनियरिंग के महारथी जर्मनी का एक और इंडोनेशिया का एक सैटेलाइट भी इस भारतीय रॉकेट में अपनी जगह बनाए हुए था। विदेशी एजेंसियों का भारत की तरफ यह जो भारी झुकाव था, वह कोई रातों-रात हुआ चमत्कार नहीं था। इसके पीछे इसरो की वह शानदार और बेदाग साख थी, जिसमें बेहद कम बजट में सौ प्रतिशत सफलता की ठोस गारंटी दी जाती है। पूरी दुनिया की स्पेस कंपनियों को यह बात बहुत अच्छी तरह समझ आ गई थी कि अगर अपने महंगे सैटेलाइट सुरक्षित और सस्ते में लॉन्च करने हैं, तो इसरो से बेहतर कोई भी विकल्प इस पूरी धरती पर मौजूद नहीं है।
युवाओं के सपनों की अंतरिक्ष में उड़ान
अंतरिक्ष की यह ऊंची उड़ान सिर्फ बड़े-बड़े वैज्ञानिकों, कद्दावर राजनेताओं और विदेशी देशों तक ही सीमित नहीं थी। इस मिशन ने भारत के युवाओं और कॉलेज जाने वाले आम छात्रों के लिए भी आसमान के बंद दरवाजे पूरी ताकत से खोल दिए थे। पीएसएलवी-सी34 के अंदर दो ऐसे छोटे लेकिन बेहद खास और स्मार्ट सैटेलाइट मौजूद थे, जिन्हें किसी बड़ी सरकारी हाई-टेक लैब में नहीं, बल्कि भारत के कॉलेज कैंपस की साधारण लैब्स में छात्रों के हाथों से बनाया गया था। पहला था चेन्नई के सत्यभामा विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा दिन-रात एक करके बनाया गया सत्यभामासैट और दूसरा था पुणे के इंजीनियरिंग कॉलेज के होनहार छात्रों द्वारा तैयार किया गया स्वयं सैटेलाइट। इन दोनों मशीनों की मौजूदगी ने पूरी दुनिया को भारत की युवा शक्ति का एक बहुत ही कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया।
चेन्नई के छात्रों द्वारा बनाया गया सत्यभामासैट कोई सजावट का खिलौना नहीं था, बल्कि इसका काम हमारे पर्यावरण में मौजूद ग्रीनहाउस गैसों का सटीक डेटा इकट्ठा करना था ताकि प्रदूषण से लड़ा जा सके। वहीं पुणे के छात्रों का स्वयं सैटेलाइट रेडियो कम्युनिकेशन के क्षेत्र में एक नई क्रांति लाने के लिए डिजाइन किया गया था। इन छात्रों की सफलता यह चीख-चीख कर बता रही थी कि भारत की युवा पीढ़ी अब सिर्फ मोटी-मोटी किताबें रटकर डिग्रियां नहीं ले रही है, बल्कि वह अपने हाथों से अंतरिक्ष के ऐसे जटिल उपकरण बना रही है जो सीधे धरती के बाहर जाकर काम करते हैं। यह एक ऐसा प्रेरणादायक क्षण था जिसने देश के लाखों बच्चों के मन में वैज्ञानिक बनने और देश के लिए कुछ कर गुजरने का बीज बो दिया।
16वें मिनट का वो रोंगटे खड़े कर देने वाला मास्टरक्लास
लॉन्च के समय की वह उल्टी गिनती जैसे-जैसे कम हो रही थी, पूरी दुनिया की धड़कनें तेज होती जा रही थीं। दस, नौ, आठ, सात… हर एक सेकंड किसी सदी के बराबर लग रहा था। और फिर वह ऐतिहासिक पल आ ही गया। ठीक सुबह के 9 बजकर 26 मिनट पर पीएसएलवी-सी34 ने अपने इंजनों से आग का एक विशालकाय बवंडर छोड़ते हुए श्रीहरिकोटा के आसमान का सीना चीर दिया। रॉकेट की वह कान फोड़ देने वाली गर्जना और उसकी गुरुत्वाकर्षण को मात देने वाली रफ्तार किसी भी सच्चे भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा करने के लिए काफी थी। शुरुआती चरण बिल्कुल मक्खन की तरह एक के बाद एक पूरे होने लगे। स्ट्रैप-ऑन मोटर्स बिल्कुल सही समय पर रॉकेट से अलग हुए और मुख्य इंजन ने अंतरिक्ष की तरफ अपना काम पूरी ताकत के साथ शुरू कर दिया।
उड़ान भरने के ठीक 16 मिनट और 30 सेकंड बाद इस पूरे मिशन का सबसे क्रिटिकल यानी सबसे खतरनाक मोड़ सामने आ गया था। अब भारत का यह रॉकेट अंतरिक्ष की उस ठंडी और शांत कक्षा में पहुंच चुका था जहां उसे अपना सारा कीमती सामान खाली करना था। सबसे पहले 727.5 किलो के बेहद भारी कार्टोसैट-2 सैटेलाइट को बड़ी ही नजाकत और गणितीय सटीकता के साथ रॉकेट से अलग करके अंतरिक्ष में स्थापित किया गया। इसके बाद जो हुआ, वह स्पेस इंजीनियरिंग का एक ऐसा मास्टरक्लास था जिसे देखकर बड़े-बड़े विदेशी वैज्ञानिक अपनी कुर्सियों से उठकर तालियां बजाने पर मजबूर हो गए। अगले कुछ ही मिनटों के अंदर, एक-एक करके बाकी 19 सैटेलाइट्स को रॉकेट ने बिल्कुल सही एंगल और स्पीड के साथ अंतरिक्ष के अनंत अंधेरे में छोड़ना शुरू कर दिया।
बिना घर्षण के 20 सैटेलाइट्स की अचूक टाइमिंग
अंतरिक्ष में किसी भी चीज को रॉकेट से अलग करना कोई सामान्य या आसान प्रक्रिया नहीं होती है। स्पेस में जब भी कोई सैटेलाइट रॉकेट से अलग होता है, तो वह पीछे की तरफ एक बहुत ही तगड़ा झटका पैदा करता है जिसे रिकॉयल कहते हैं। 20 सैटेलाइट्स को एक के बाद एक अलग करने का सीधा सा मतलब था कि रॉकेट को बार-बार बहुत तेज झटके लग रहे थे। लेकिन इसरो के वैज्ञानिकों ने रॉकेट के सॉफ्टवेयर और उसकी इंटरनल कंट्रोलिंग को इतना अचूक और स्मार्ट बनाया था कि हर झटके के बाद रॉकेट खुद को तुरंत और अपने आप स्थिर कर लेता था। एक के बाद एक, सभी 20 सैटेलाइट अपनी-अपनी तय कक्षाओं में बिल्कुल आराम से स्थापित हो गए। एक भी मशीन अपनी जगह से एक इंच भी नहीं भटकी। सौ प्रतिशत सफलता का यह वह जादुई आंकड़ा था जिसने स्पेस टेक्नोलॉजी की किताबों के कई पुराने नियम हमेशा के लिए बदल कर रख दिए।
अंतरिक्ष में कोई हवा नहीं होती, वहां कोई घर्षण नहीं होता है। वहां पर एक बार जो चीज जिस स्पीड से आपके हाथ से निकल जाती है, उसे रोकना या उसकी दिशा बदलना नामुमकिन के बराबर होता है। इसलिए 20 सैटेलाइट्स को एक दूसरे से बिना टकराए एक ही जगह से छोड़ना अपने आप में एक बहुत ही महान कला है। भारतीय वैज्ञानिकों ने हर सैटेलाइट के रिलीज होने की टाइमिंग को सेकंड के हजारवें हिस्से यानी मिलीसेकंड्स में सेट कर रखा था। एक सैटेलाइट के निकलने और दूसरे के निकलने के बीच का वह छोटा सा अंतर ही इस पूरे महामिशन की जान था। और इसरो की टीम ने इस टाइमिंग को इतनी खूबसूरती से मेंटेन किया कि दुनिया भर की स्पेस कम्युनिटी इस परफेक्शन को देखकर दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो गई।
ग्लोबल स्पेस मार्केट पर भारत का एकतरफा राज
इस शानदार और बेदाग सफलता का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि इसरो रातों-रात दुनिया के कमर्शियल स्पेस मार्केट का बेताज बादशाह बन गया। ग्लोबल स्पेस इंडस्ट्री जो उस समय अरबों डॉलर की थी और जिस पर सिर्फ गिने-चुने देशों का ही कब्जा था, उसमें भारत ने अपनी एक ऐसी मजबूत पकड़ बना ली जिसे तोड़ना किसी भी पश्चिमी देश के लिए पूरी तरह से नामुमकिन हो गया। अमेरिका जैसी महाशक्ति का अपने 13 सैटेलाइट्स के लिए भारत पर आंख मूंदकर भरोसा जताना इस बात का सबसे बड़ा सबूत था कि अत्याधुनिक तकनीक के मामले में अब हम दुनिया में किसी के भी पीछे नहीं चलने वाले हैं। यह भारत के लिए एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक शिफ्ट था।
एक समय था जब भारत अपने छोटे-मोटे सैटेलाइट लॉन्च करवाने के लिए भी रूस और यूरोप के रॉकेट्स पर निर्भर रहता था और उनके हिसाब से करोड़ों रुपये चुकाता था। और 22 जून के इस ऐतिहासिक दिन ने पूरी दुनिया के समीकरण पूरी तरह पलट कर रख दिए थे। अब यूरोप और अमेरिका के एडवांस सैटेलाइट भारत के रॉकेट पर सवार होकर अंतरिक्ष की सैर कर रहे थे। विदेशी सैटेलाइट्स को सफलतापूर्वक लॉन्च करने से भारत सरकार को जो भारी विदेशी मुद्रा कमाई के रूप में मिली, उसने इसरो के भविष्य के बड़े और महत्वाकांक्षी मिशनों के लिए एक बहुत ही मजबूत आर्थिक आधार तैयार कर दिया।
यह ऐतिहासिक उड़ान इसरो के लिए कोई अंतिम मंजिल नहीं थी। यह तो बस एक छोटी सी शुरुआत थी उस बहुत बड़े तूफान की, जो आगे चलकर अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में आने वाला था। 20 सैटेलाइट्स को एक साथ लॉन्च करके इसरो ने अपने ही पिछले कई रिकॉर्ड्स को चकनाचूर कर दिया था और पूरी दुनिया को एक खुली चेतावनी दे दी थी कि भारत के रॉकेट अब एक साथ कई गुना ज्यादा पेलोड और मशीनें ले जाने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। इसी सी34 मिशन ने उस मजबूत नींव को पक्का किया, जिसके दम पर बाद में भारत ने एक साथ 104 सैटेलाइट्स लॉन्च करने का वह वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया, जिसने अच्छे-अच्छों के पसीने छुड़ा दिए और अंतरिक्ष के इतिहास में एक ऐसा पन्ना जोड़ दिया जिसे दुनिया की कोई ताकत नहीं मिटा सकती।
भारत का स्पेस प्रोग्राम आज जिस भी बुलंदी पर खड़ा है और चंद्रयान से लेकर गगनयान तक जो गगनचुंबी छलांगें लगा रहा है, उसमें पीएसएलवी-सी34 का यह 22 जून का मिशन एक सबसे अहम मील का पत्थर माना जाता है। इसने दुनिया को यह कड़वा सच बता दिया कि असली ताकत अंधाधुंध पैसा बहाने में नहीं, बल्कि तेज दिमाग, सटीक प्लानिंग और अटूट हौसले में होती है। बेहद कम संसाधनों में दुनिया का सबसे बेहतरीन और शानदार परिणाम कैसे दिया जाता है, यह कला आज की तारीख में इसरो से बेहतर कोई भी स्पेस एजेंसी नहीं जानती। विदेशी धरती से भारत की ओर देखने का वह पुराना नजरिया अब पूरी तरह से खत्म हो चुका है और आज पूरा ब्रह्मांड भारत की इस वैज्ञानिक शक्ति को सलाम करता है।





