‘मुंह या नस से कुछ मत देना’, सफदरजंग अस्पताल से वांगचुक की पत्नी का अल्टीमेटम, नीट के खिलाफ 20 जुलाई को बड़ा तूफान

'मुंह या नस से कुछ मत देना', सफदरजंग अस्पताल से वांगचुक की पत्नी का अल्टीमेटम, नीट के खिलाफ 20 जुलाई को बड़ा तूफान

देश की राजधानी दिल्ली का दिल कहे जाने वाले जंतर-मंतर पर बीती रात जो कुछ भी हुआ, उसने पूरे सिस्टम पर एक बहुत बड़ा और बेहद गंभीर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। रात के अंधेरे में खाकी वर्दी का एक भारी हुजूम आता है और एक साठ साल के बुजुर्ग को, जो पिछले इक्कीस दिनों से सिर्फ पानी के सहारे देश के युवाओं के हक की लड़ाई लड़ रहा था, उसे जबरन उठाकर अस्पताल ले जाया जाता है। नीट परीक्षा में हुए कथित घोटाले के खिलाफ अपनी जान की बाजी लगाने वाले सोनम वांगचुक आज सफदरजंग अस्पताल के एक बेड पर पड़े हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या वांगचुक का शरीर कमजोर पड़ा है, या फिर सिस्टम के हाथ-पांव फूलने लगे थे? शुरुआत में ही यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ एक सामाजिक कार्यकर्ता के अनशन की रूटीन कवरेज नहीं है। यह कहानी है इस देश के उन लाखों मेडिकल छात्रों की, जिनके सुनहरे सपनों को नीट परीक्षा के विवादों ने बेरहमी से रौंद कर रख दिया है।

जंतर-मंतर का वो हाई-वोल्टेज ड्रामा

जब सिस्टम युवाओं की आवाज़ सुनने में पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहा था, तब सोनम वांगचुक ने जंतर-मंतर को अपना युद्ध का मैदान बनाया। एक ऐसा मैदान जहाँ न कोई हथियार था, न कोई पत्थरबाज़ी थी, बल्कि हथियार था तो सिर्फ गांधीवादी भूख हड़ताल। लगातार इक्कीस दिनों तक अन्न का एक दाना भी उनके हलक के नीचे नहीं गया। वांगचुक का वजन नौ किलो से ज्यादा गिर चुका है। उनके शरीर का बीस प्रतिशत हिस्सा, जो पहले चर्बी और फिर मांसपेशियों के रूप में था, वो पूरी तरह से गल चुका है। मेडिकल साइंस कहती है कि इसके बाद सीधा असर शरीर के अहम अंगों और फिर दिमाग पर पड़ता है। लेकिन सिस्टम की नींद तब टूटती है जब दिल्ली हाई कोर्ट एक आदेश जारी करता है और फिर शुरू होता है पुलिस का वो एक्शन जिसने सबको हैरान कर दिया।

शनिवार की सुबह, जब धरना स्थल पर अभी ठीक से दिन भी नहीं निकला था, पुलिस भारी दलबल और सिविल ड्रेस में वहां पहुंचती है। बताया जाता है कि ये लोग डॉक्टर थे, लेकिन वहां मौजूद चश्मदीदों और वॉलंटियर्स का साफ कहना है कि उनका बर्ताव किसी मेडिकल टीम जैसा बिल्कुल नहीं था। वॉलंटियर्स को वहां से हटने का कड़ा अल्टीमेटम दिया जाता है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब उन्होंने सुबह के तय समय पर चेकअप की बात कही, तो अचानक हाई कोर्ट के ऑर्डर का हवाला देकर वांगचुक को वहां से जबरन शिफ्ट कर दिया गया।

सीजेपी और अभिजीत दीपके के गंभीर आरोप

इस पूरे प्रोटेस्ट को फ्रंट से लीड कर रहे कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके का जो बयान सामने आया है, वो इस पूरे घटनाक्रम में एक नया ट्विस्ट ले आता है। उनका साफ आरोप है कि पुलिस ने धरना स्थल पर न सिर्फ जबरदस्ती की, बल्कि उनके साथ मारपीट भी की गई। अभिजीत का सीधा और चुभता हुआ सवाल है कि क्या अपने देश के युवाओं के लिए आवाज उठाना कोई बहुत बड़ा अपराध है? क्या विदेश से लौटकर अपने देश के एजुकेशन सिस्टम को सुधारने की मांग करना कोई गुनाह है? पुलिस महकमा अपने डिफेंस में कह रहा है कि उन्होंने अधिकतम संयम बरता है और पूरी प्रक्रिया को सुरक्षित ढंग से पूरा किया है। डीसीपी नई दिल्ली की तरफ से साफ किया गया है कि हाई कोर्ट के आदेश का पालन करते वक्त कुछ प्रदर्शनकारियों ने बाधा डालने की कोशिश की, जिससे हल्की अफरातफरी मची। लेकिन ग्राउंड जीरो पर मौजूद लोगों के जो गंभीर आरोप हैं, वो पुलिस की इस ‘संयम’ वाली थ्योरी पर बहुत भारी पड़ रहे हैं।

पत्नी का वो खौफनाक अल्टीमेटम

इस पूरे हाई वोल्टेज ड्रामे के बीच सबसे बड़ी, सबसे सख्त और सबसे गंभीर चेतावनी आई है वांगचुक की पत्नी गीतांजलि की तरफ से। सफदरजंग अस्पताल से गीतांजलि ने सोशल मीडिया के जरिए सिस्टम को साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि उनके पति के मुंह या नसों के जरिए कोई भी दवा या लिक्विड तब तक हरगिज न दिया जाए, जब तक कि परिवार और उन एक्सपर्ट डॉक्टर्स की सहमति न ले ली जाए जो पिछले बीस दिनों से वांगचुक की सेहत की पल-पल निगरानी कर रहे हैं।

यह कोई मामूली बयान नहीं है। इसके पीछे एक बहुत गहरा डर, एक आशंका और अविश्वास छिपा है। परिवार और समर्थकों को डर है कि कहीं वांगचुक का अनशन जबरन तोड़ने के लिए कोई अनचाहा मेडिकल इंटरवेंशन न कर दिया जाए। जब एक आम नागरिक का सिस्टम की नीयत से भरोसा उठ जाता है, तब ऐसे ही हालात पैदा होते हैं। बिना कंसेंट के किसी को ड्रिप लगाना या फीड करना सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन माना जाता है, और वांगचुक का परिवार इसी बात को लेकर पूरी तरह से अलर्ट मोड में है।

नीट घोटाला और युवाओं का भविष्य

अब जरा उस असल मुद्दे की गहराई में चलते हैं जिसकी वजह से यह पूरी आग लगी है। नीट परीक्षा। एक ऐसा एग्जाम जिस पर देश के लाखों परिवारों का भविष्य, उनका पैसा और उनकी उम्मीदें टिकी होती हैं। एक गरीब किसान या मिडिल क्लास बाप अपनी पाई-पाई जोड़कर बच्चे को कोचिंग भेजता है, बच्चा दिन-रात एक करके पढ़ाई करता है, लेकिन जब इस एग्जाम में पेपर लीक और धांधली के आरोप लगते हैं, तो छात्रों का पूरा का पूरा भरोसा चकनाचूर हो जाता है। वांगचुक इसी टूटे हुए भरोसे को वापस लाने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर अड़े हुए थे। उनका मकसद सिर्फ एक परीक्षा को रद्द कराना नहीं है, बल्कि पूरे के पूरे एजुकेशन सिस्टम की ऐसी ओवरहॉलिंग करना है कि भविष्य में कोई माफिया छात्रों के करियर से खिलवाड़ न कर सके।

उन्होंने अपने वीडियो संदेश में देश की जनता से जो सवाल पूछा था, वो सीधा दिल पर वार करता है। उन्होंने पूछा था कि क्या भारत के लोग अपने बच्चों की जिंदगी और शिक्षा से ज्यादा प्यार करते हैं या फिर प्याज से? इतिहास गवाह है कि जब इस देश में प्याज की बढ़ती कीमतों पर जनता का गुस्सा फूटता है, तो साल 1980 और 1998 में केंद्र से लेकर दिल्ली और राजस्थान तक की सरकारें भरभरा कर गिर गई थीं। अगर प्याज के दामों पर सरकारें गिर सकती हैं, तो फिर देश के लाखों युवाओं के भविष्य से खेलने वालों का क्या हश्र होगा, यह समझना रॉकेट साइंस नहीं है।

हाई कोर्ट का आदेश और सियासी तूफान

दिल्ली हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच ने जो आदेश दिया था, वो दरअसल वांगचुक की जान बचाने के मकसद से था। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया था कि वांगचुक की सेहत पर नजर रखी जाए और अगर हालत गंभीर होती है, तो डॉक्टरों की राय के आधार पर जरूरी कदम उठाए जाएं। अदालत का यह दखल यह बताता है कि मामला आउट ऑफ कंट्रोल हो रहा था। लेकिन इस कानूनी आदेश के बाद जिस तरह से पुलिस ने एग्जीक्यूशन किया, उसने एक बहुत बड़े सियासी तूफान को जन्म दे दिया है।

देश का सियासी पारा अब सातवें आसमान पर पहुंच चुका है। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने इस पुलिसिया कार्रवाई को सीधे तौर पर ‘गुंडागर्दी’ करार दिया है। उनका कहना है कि सत्ता का अहंकार युवाओं और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठी चला रहा है और यही युवा आने वाले समय में तख्त उखाड़ फेंकेंगे। वहीं, समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने भी इसे लोकतंत्र और संविधान को कुचलने वाला कदम बताया है। विपक्ष का साफ आरोप है कि सरकार वांगचुक की जायज मांगों को सुनने के बजाय, तानाशाही रवैया अपनाते हुए उन्हें अस्पताल में कैद कर रही है।

20 जुलाई का संसद मार्च और आगे का रास्ता

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वांगचुक को जंतर-मंतर से हटा देने से यह आंदोलन खत्म हो जाएगा? जवाब है, बिल्कुल नहीं। बल्कि इसके उलट, अब यह आग और तेजी से फैलने वाली है। 20 जुलाई को सीजेपी ने जो ‘चलो संसद’ मार्च का आह्वान किया था, वो हर हाल में होकर रहेगा। सीजेपी ने साफ ऐलान कर दिया है कि उनका मार्च अपने तय कार्यक्रम के अनुसार ही निकाला जाएगा। वांगचुक ने भी अस्पताल जाने से पहले अपने समर्थकों से अपील की थी कि जनता की भागीदारी ही इस आंदोलन की असली ताकत है। उन्होंने कहा था कि भले ही उनका शरीर गल रहा है, लेकिन उनका दिमाग पूरी तरह से अलर्ट है और उनका हौसला पहाड़ से भी ज्यादा मजबूत है।

भले ही आज जंतर-मंतर से वांगचुक का टेंट उखाड़ दिया गया हो, भले ही पुलिस ने उस जगह को खाली करवा लिया हो, लेकिन क्या इससे वो ज्वाला शांत हो जाएगी जो लाखों छात्रों के दिलों में धधक रही है? क्या सफदरजंग अस्पताल का वो कमरा अब इस पूरे प्रोटेस्ट का नया एपीसेंटर बन जाएगा? सरकार और पूरे सरकारी तंत्र के लिए आने वाले कुछ घंटे और कुछ दिन किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं हैं। युवा अब जाग चुका है, उसे अपने हकों की समझ आ चुकी है, और जब देश का युवा सिस्टम से सवाल पूछने के लिए सड़क पर उतरता है, तो बड़े-बड़े सत्ताधीशों की नींदें उड़ जाती हैं। वांगचुक का यह संघर्ष अब सिर्फ एक व्यक्ति की जिद नहीं रहा, बल्कि यह पूरे देश के भविष्य को सुरक्षित करने का एक बहुत बड़ा राष्ट्रवादी आंदोलन बन चुका है। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि 20 जुलाई को जब दिल्ली की सड़कों पर युवाओं का सैलाब उतरेगा, तो सिस्टम इस उठते हुए बवंडर को कैसे संभालता है।

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