दशकों से हमें और पूरी दुनिया को यही बताया गया कि अंतरिक्ष तो सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन जैसी महाशक्तियों की बपौती है। आसमान के पार सैटेलाइट भेजने का मतलब था इन देशों की बड़ी-बड़ी सरकारी एजेंसियों और अरबों डॉलर की फंडिंग वाली दिग्गज कंपनियों के आगे हाथ फैलाना। लेकिन अब यह पूरा का पूरा समीकरण हमेशा के लिए पलटने वाला है। इसरो की शानदार सफलताओं ने पूरी दुनिया में जो डंका बजाया है, उसके बाद अब भारत के प्राइवेट सेक्टर ने भी अंतरिक्ष की रेस में अपनी ऐसी जबरदस्त धमक दिखा दी है कि पश्चिमी देशों के स्पेस मार्केट में पसीना छूटने लगा है। हैदराबाद की एक स्पेस स्टार्टअप कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने एक ऐसा बड़ा ऐलान कर दिया है, जिसने रातों-रात पूरी दुनिया के स्पेस मार्केट में खलबली मचा कर रख दी है।
यह कोई छोटी-मोटी घोषणा नहीं है। यह अंतरिक्ष की दुनिया में भारत की वो छलांग है जो ग्लोबल कमर्शियल लॉन्च मार्केट का पूरा गणित जड़ से बदल कर रख देगी। स्वदेशी ‘विक्रम-वन’ रॉकेट अब पूरी तरह से तैयार है और श्रीहरिकोटा से अपनी पहली ऐतिहासिक उड़ान भरने के लिए लॉन्चपैड पर गरजने को बेताब है। आज पूरी दुनिया की नजरें भारत के इस स्वदेशी रॉकेट पर टिक गई हैं। आलम यह है कि खुद एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स भी लगातार इस महाबली भारतीय रॉकेट की तरफ देख रही है। आखिर इसरो के बाद भारत की एक निजी अंतरिक्ष कंपनी ने ऐसा कौन सा ब्रह्मास्त्र तैयार कर लिया है और क्या 300 किलोग्राम तक का पेलोड अंतरिक्ष में पहुंचाने की क्षमता रखने वाला स्वदेशी विक्रम-वन भारत के लिए सबसे बड़ा गेमचेंजर साबित होने वाला है, आइए इसे बिल्कुल आसान और बोलचाल की भाषा में समझते हैं।
विक्रम-वन: भारत का नया स्पेस बाहुबली
स्काईरूट एयरोस्पेस का विक्रम-वन कोई आम रॉकेट नहीं है, बल्कि यह एक बेहद एडवांस और अत्याधुनिक मशीन है। इसे 100 प्रतिशत भारत में डिजाइन और डेवलप किया गया है। यह एक चार चरणों यानी फोर-स्टेज वाला रॉकेट है। रॉकेट के स्टेज का सीधा सा मतलब होता है कि रॉकेट अलग-अलग हिस्सों में बंटा होता है। जैसे-जैसे रॉकेट आसमान का सीना चीरते हुए ऊपर जाता है, उसका ईंधन खत्म होने वाला हिस्सा अलग होकर नीचे गिर जाता है। इससे रॉकेट का वजन कम होता चला जाता है और वह और भी ज्यादा भयंकर स्पीड से अंतरिक्ष की तरफ बढ़ता है।
विक्रम-वन रॉकेट लगभग 300 किलोग्राम तक के भारी-भरकम उपग्रहों को लो अर्थ ऑर्बिट यानी पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित करने की ताकत रखता है। अब आप सोचेंगे कि ये निचली कक्षा क्या होती है। पृथ्वी की निचली कक्षा हमारी धरती से लगभग 500 से 2000 किलोमीटर ऊपर होती है। आज के समय में दुनिया भर के जितने भी अहम संचार उपग्रह हैं, मौसम की सटीक जानकारी देने वाले सैटेलाइट्स हैं या फिर अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स हैं, वो सब इसी कक्षा में भेजे जाते हैं। 300 किलोग्राम का पेलोड सुनने में शायद आपको बहुत ज्यादा न लगे, लेकिन आज के नैनो टेक्नोलॉजी के युग में यह एक बहुत बड़ा और जादुई आंकड़ा है।
आजकल के उपग्रह पहले की तरह किसी स्कूल बस जितने बड़े नहीं होते। माइक्रोचिप्स के आने के बाद अब उपग्रहों का आकार एक छोटे सूटकेस या आपके घर के माइक्रोवेव ओवन जितना हो गया है। ऐसे में 300 किलोग्राम की क्षमता का सीधा सा मतलब है कि विक्रम-वन एक ही बार में कई छोटे-छोटे विदेशी और स्वदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जाकर सेट कर सकता है। इस रॉकेट की पहली उड़ान कोई मामूली टेस्ट नहीं होगी। कंपनी ने साफ कर दिया है कि अपनी पहली ही उड़ान में विक्रम-वन कई ग्राहकों के उपग्रहों को अंतरिक्ष में लेकर जाएगा। यानी भारत की प्राइवेट स्पेस इंडस्ट्री अब टेस्टिंग के दौर से बाहर निकलकर सीधे अरबों डॉलर के कमर्शियल बिजनेस के अखाड़े में उतर चुकी है।
3D प्रिंटिंग: रॉकेट निर्माण की सबसे बड़ी क्रांति
विक्रम-वन रॉकेट की सबसे बड़ी और क्रांतिकारी खासियत इसका इंजन है। इस रॉकेट में 3D-प्रिंटेड लिक्विड इंजन का इस्तेमाल किया गया है। 3D प्रिंटिंग तकनीक को आप बिल्कुल ऐसे समझ सकते हैं कि जैसे कोई नॉर्मल प्रिंटर कागज पर स्याही से कुछ छापता है, वैसे ही 3D प्रिंटर कंप्यूटर में बनाए गए डिजाइन के आधार पर धातु या प्लास्टिक की परतों को एक के ऊपर एक रखकर कोई भी ठोस चीज बना सकता है।
पारंपरिक तरीके से अगर किसी रॉकेट का इंजन बनाया जाए तो उसमें महीनों का लंबा समय लगता है। उसमें हजारों छोटे-छोटे पुर्जे होते हैं जिन्हें नट-बोल्ट और वेल्डिंग के जरिए बहुत ही बारीकी से जोड़ा जाता है। अगर एक भी पुर्जा खराब हुआ या वेल्डिंग में मिलीमीटर भर की भी चूक हुई, तो पूरा इंजन अंतरिक्ष में फट सकता है और करोड़ों का नुकसान हो सकता है। लेकिन 3D प्रिंटिंग ने इस पूरी गेम को ही बदल दिया है। इस तकनीक से पूरा का पूरा इंजन कुछ ही दिनों में एक ही टुकड़े के रूप में बनकर तैयार हो जाता है। इसमें न कोई वेल्डिंग होती है और न ही हजारों पुर्जे जोड़ने का कोई सिरदर्द। इससे रॉकेट का वजन भी कम होता है, लागत भी एकदम जमीन पर आ जाती है और सबसे बड़ी बात, इसे बहुत ही ज्यादा तेजी से बनाया जा सकता है।
इसरो का मजबूत साथ और ग्लोबल टारगेट
फिलहाल इस शानदार विक्रम-वन रॉकेट का अंतिम परीक्षण और पूरा एकीकरण इसरो के श्रीहरिकोटा स्पेसपोर्ट में बहुत ही जोरों-शोरों से चल रहा है। एकीकरण का मतलब है रॉकेट के सभी अलग-अलग हिस्सों को जोड़कर उसे लॉन्च के लिए फाइनल टच देना। सबसे अच्छी बात यह है कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो इस पूरी प्रक्रिया में स्काईरूट का एक बड़े भाई की तरह पूरा साथ दे रहा है। इसरो की वर्ल्ड-क्लास सुविधाएं और दशकों का बेजोड़ अनुभव अब भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर को एक लोहे जैसा मजबूत आधार दे रहा है।
लॉन्चिंग की तैयारियां अपने अंतिम चरण में हैं और अगले कुछ ही हफ्तों में यह रॉकेट आसमान में अपनी ताकत दिखाएगा। यह सिर्फ एक कंपनी की सफलता नहीं होगी, बल्कि यह पूरे देश के प्राइवेट स्पेस इकोसिस्टम की ताकत का दुनिया के सामने एक बहुत बड़ा शक्ति प्रदर्शन होगा। कंपनी का सीधा टारगेट है साल 2027 से विक्रम-वन को पूरी तरह से कमर्शियल लॉन्च सेवाओं के लिए ग्लोबल मार्केट में उतारना। कमर्शियल लॉन्च का मतलब है कि दुनिया की कोई भी कंपनी, कोई भी देश अपना सैटेलाइट भेजने के लिए स्काईरूट को पैसा देगी और हमारा विक्रम-वन उसे पूरी सुरक्षा के साथ अंतरिक्ष में छोड़कर आएगा।
सबसे गर्व करने वाली बात यह है कि स्काईरूट को पूरी उम्मीद है कि उसके लगभग 80 प्रतिशत ग्राहक विदेशों से होंगे। अब तक अमेरिका और यूरोप की कंपनियां ही दुनिया भर के देशों के उपग्रह लॉन्च करके अरबों डॉलर छापती रही हैं। लेकिन अब भारत का प्राइवेट सेक्टर इस एकाधिकार की जड़ें काटने के लिए तैयार है। विदेशी ग्राहक भारत की तरफ इसलिए आ रहे हैं क्योंकि हमारी तकनीक वर्ल्ड-क्लास है और लागत पश्चिमी देशों के मुकाबले आधी से भी कम है।
असफलता से सफलता का सफर और स्पेसएक्स का उदाहरण
अंतरिक्ष विज्ञान कोई बच्चों का खेल नहीं है। यह एक बहुत ही जटिल और जोखिम भरा क्षेत्र है जहां पल भर की चूक से मिशन राख हो सकता है। स्काईरूट के नेतृत्व का मानना है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में अगर कोई मिशन फेल होता है, तो वह हार नहीं है। हर विफलता अपने साथ डेटा का एक बहुत बड़ा खजाना लाती है। स्पेसएक्स का उदाहरण हमारे सामने है, जिनके शुरुआती कई रॉकेट ब्लास्ट हुए थे और कंपनी दिवालिया होने वाली थी, लेकिन आज वो दुनिया पर राज कर रहे हैं। इसरो ने भी अपनी कई चुनौतियों से पार पाया है। सरकारी एजेंसी और प्राइवेट सेक्टर एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं और जब दोनों मिलते हैं तो देश का नाम आसमान की बुलंदियों पर पहुंचता है।
भारत की पहली स्पेस-टेक यूनिकॉर्न और इन्फिनिटी कैंपस
इसी तकनीकी ताकत पर दुनिया भर के निवेशकों ने अपना खजाना खोल दिया है। विक्रम-वन की उड़ान से पहले ही स्काईरूट भारत की पहली स्पेस-टेक यूनिकॉर्न बन चुकी है। यानी कंपनी का वैल्यूएशन एक अरब डॉलर को पार कर गया है। हाल ही में 6 करोड़ डॉलर की नई फंडिंग के बाद स्काईरूट का कुल मूल्यांकन लगभग 1.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।
इस भारी फंडिंग से कंपनी ने हैदराबाद में अपना अत्याधुनिक और विशाल ‘इन्फिनिटी’ कैंपस शुरू किया है। यह कोई आम फैक्ट्री नहीं है। यह भारत के रॉकेट निर्माण का सबसे आधुनिक केंद्र है जहां असेंबली लाइन प्रोडक्शन के जरिए हर महीने एक पूरा का पूरा रॉकेट बनकर तैयार हो सकता है। कारों की तरह रॉकेट का प्रोडक्शन होना अपने आप में एक असंभव लगने वाला कारनामा है जो अब भारत में हकीकत बन रहा है।
भविष्य का ब्रह्मास्त्र: विक्रम-टू और क्रायोजेनिक इंजन
स्काईरूट की भूख केवल विक्रम-वन तक नहीं है। विक्रम-वन के साथ-साथ विक्रम-टू के विकास का काम भी जोरों पर है। विक्रम-टू में क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल किया जाएगा, जो अंतरिक्ष विज्ञान की सबसे मुश्किल तकनीक है। इसमें गैसों को बेहद ठंडे तापमान पर लिक्विड बनाकर इस्तेमाल किया जाता है। इसकी मदद से विक्रम-टू लगभग 900 किलोग्राम तक का भारी पेलोड उठा सकेगा। 2027 तक यह भारत को भारी सैटेलाइट लॉन्च मार्केट का खूंखार दावेदार बना देगा।
विक्रम-वन को पूरी तरह से कार्बन फाइबर से बनाया गया है जो स्टील से कई गुना मजबूत लेकिन प्लास्टिक जितना हल्का होता है। इसके एवियोनिक्स यानी रॉकेट के दिमाग को भारतीय इंजीनियरों ने खुद अपनी लैब्स में बनाया है। अब हमें किसी विदेशी तकनीक के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। जब विक्रम-वन हर महीने कमर्शियल उड़ान भरेगा, तो यह ट्रिलियन डॉलर की ग्लोबल स्पेस इकोनॉमी में भारत का झंडा गाड़ देगा और देश के युवाओं के लिए इनोवेशन की एक नई लहर पैदा करेगा।





