पाकिस्तान और तुर्की की उड़ी नींद: आर्मेनिया में ‘प्रलय’ लाने जा रहा है भारत का यह सबसे घातक हथियार!

वर्तमान में दुनिया की तमाम महाशक्तियां भारत के साथ रक्षा और कूटनीतिक समझौते करने की होड़ में जुटी हैं। एक ओर अमेरिका भारत के साथ अपने रिश्तों को नए मुकाम पर ले जा रहा है, तो दूसरी ओर फ्रांस अपने विशेष विशेषज्ञों को भेजकर एमका (AMCA) फाइटर जेट प्रोजेक्ट में भारत का भागीदार बनने की कोशिश कर रहा है। रूस भी ऊर्जा और गैस के बड़े सौदों के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। लेकिन इन वैश्विक शक्तियों की गहमागहमी के बीच, कॉकस के संवेदनशील क्षेत्र में एक ऐसी कूटनीतिक बिसात बिछाई गई है, जिसने पाकिस्तान और तुर्की की रातों की नींद हराम कर दी है। भारत के एक भरोसेमंद मित्र ने एक ऐसी भारतीय मिसाइल की मांग की है, जिसका नाम सुनते ही दुश्मन देशों के खेमे में हड़कंप मच गया है। आखिर आर्मेनिया भारत से ऐसा कौन सा ‘ब्रह्मास्त्र’ मांग रहा है जो विरोधी देशों के सुरक्षा घेरे को मिट्टी में मिला देगा? और कैसे भारत का यह रणनीतिक कदम दुनिया के सामरिक संतुलन को बदलने वाला है?

यह कहानी आर्मेनिया की है, जो पिछले कई वर्षों से अपनी जमीन और अस्मिता के लिए एक भीषण युद्ध लड़ रहा है। उसके सामने अजरबैजान है, जिसे तुर्की और पाकिस्तान का खुला सैन्य समर्थन प्राप्त है। जब अजरबैजान ने विदेशी ड्रोन्स और मिसाइलों के जरिए आर्मेनिया पर दबाव बनाया, तब आर्मेनिया को अपने पुराने सहयोगी रूस से मदद की उम्मीद थी। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय दबाव और अपने स्वयं के युद्धों में उलझे होने के कारण रूस का समर्थन आर्मेनिया के अधिक काम नहीं आ सका। पुराने रूसी हथियारों की तकनीक आधुनिक युद्ध के मैदान में उतनी प्रभावशाली साबित नहीं हुई, जितनी उम्मीद की गई थी।

ऐसे कठिन समय में आर्मेनिया ने भारत की ओर रुख किया, जो आज दुनिया की सबसे तेजी से उभरती सैन्य शक्ति है। भारत ने भी इस मौके पर अपनी कूटनीतिक परिपक्वता दिखाई। याद रहे कि जब भारत अपने आंतरिक मामलों और कश्मीर जैसे मुद्दों पर दुनिया को अपना रुख स्पष्ट कर रहा था, तब अजरबैजान और तुर्की ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के एजेंडे का समर्थन किया था। अब कूटनीति के पन्नों पर उसी पुराने हिसाब को ब्याज समेत चुकाने का समय आ गया है।

भारत और आर्मेनिया की रक्षा साझेदारी अब जमीन पर अपना असर दिखा रही है। भारत ने आर्मेनिया को सबसे पहले स्वदेशी ‘पिनाका’ मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर और ‘आकाश’ एयर डिफेंस सिस्टम प्रदान किए। जब कॉकस की पहाड़ियों में भारतीय पिनाका रॉकेटों ने अपने लक्ष्यों को ध्वस्त किया, तो पूरी दुनिया भारतीय तकनीक की कायल हो गई। आर्मेनिया को यह समझ आ गया कि तुर्की-पाकिस्तान गठजोड़ का मुकाबला करने के लिए भारतीय हथियार ही सबसे सटीक विकल्प हैं। इसी विश्वास के कारण आर्मेनिया भारतीय ‘आकाश 1-एस’ एयर डिफेंस सिस्टम का पहला विदेशी खरीदार बना। लगभग 720 मिलियन डॉलर के इस सौदे के तहत 15 प्रणालियों की आपूर्ति हो चुकी है, जिसने आर्मेनिया के हवाई क्षेत्र को एक अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान किया है।

अब कॉकस क्षेत्र में खतरे का स्वरूप बदल गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अजरबैजान ने पाकिस्तान से जेएफ-17 (JF-17) ब्लॉक-3 लड़ाकू विमान खरीदे हैं। अजरबैजान को लगता है कि इन विमानों के दम पर वह आर्मेनिया के मौजूदा रक्षा तंत्र को भेद देगा। लेकिन वह यह भूल गया कि आर्मेनिया के साथ अब भारत की ताकत खड़ी है। इस नए खतरे को देखते हुए आर्मेनिया अब भारत से अगली पीढ़ी का ‘आकाश-एनजी’ (Akash-NG) एयर डिफेंस सिस्टम हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

आकाश-एनजी (Akash-NG) कोई सामान्य प्रणाली नहीं है। डीआरडीओ द्वारा विकसित यह सिस्टम इतना स्मार्ट है कि दुश्मन के विमानों के पास बचने का कोई रास्ता नहीं बचता। इसमें उन्नत ‘एईएसए रडार सीकर’ लगा है, जो दुश्मन के विमान को तब भी ट्रैक कर लेता है जब वह रडार से छिपने का प्रयास कर रहा हो। इसकी ड्यूल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर मिसाइल को अत्यधिक गति प्रदान करती है। लगभग 30 किलोमीटर की रेंज में यह प्रणाली तेज रफ्तार वाले लक्ष्यों को पलक झपकते ही नष्ट करने में सक्षम है। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के दौर में, जहां रडार जैमिंग एक बड़ी चुनौती है, वहां आकाश-एनजी पूरी तरह अचूक है।

जहां आकाश-एनजी आर्मेनिया की ढाल है, वहीं ‘प्रलय’ टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल उसकी सबसे घातक तलवार बनने जा रही है। तुर्की और अजरबैजान के पास फिलहाल ऐसा कोई डिफेंस सिस्टम नहीं है जो प्रलय की मार को रोक सके। 150 से 500 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली यह मिसाइल पूरी तरह ‘कैनिस्टराइज्ड’ है, यानी इसे ट्रक पर लादकर कहीं भी ले जाया जा सकता है और तुरंत फायर किया जा सकता है।

प्रलय मिसाइल की सबसे बड़ी खूबी इसका ‘क्वासी-बैलिस्टिक’ होना है। यह हवा में उड़ते समय अपना रास्ता बदलती रहती है, जिससे दुश्मन का रडार यह अनुमान नहीं लगा पाता कि यह किस दिशा में मुड़ेगी। यह इजरायल के ‘लारा’ (LORA) सिस्टम का भारतीय जवाब है। आर्मेनिया के पास प्रलय होने का अर्थ है कि अजरबैजान के सभी प्रमुख सैन्य ठिकाने अब सीधे निशाने पर होंगे।

जमीन और हवा के बाद अब आसमान के वर्चस्व की बात करें। आर्मेनिया के पास रूस से खरीदे गए चार ‘सुखोई-30 एसएम’ विमान हैं। हालांकि, रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण इन विमानों के स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस में आर्मेनिया को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।

आर्मेनिया ने एक बार फिर भारत की ओर हाथ बढ़ाया है। भारत दुनिया के सबसे बड़े सुखोई ऑपरेटरों में से एक है और एचएएल (HAL) ने इन विमानों के आधुनिकीकरण में महारत हासिल कर ली है। अब भारत आर्मेनिया के सुखोई विमानों को उन्नत स्वदेशी एवियोनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और आधुनिक सेंसरों से लैस करेगा।

इस पूरे अपग्रेड का सबसे घातक हिस्सा ‘अस्त्र’ मिसाइल है। आर्मेनिया के सुखोई अब भारत की स्वदेशी ‘अस्त्र मार्क-1’ बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल से लैस होंगे। 110 से 160 किलोमीटर की रेंज वाली यह मिसाइल पायलटों को दुश्मन के विमान को देखे बिना ही उसे मार गिराने की शक्ति देती है। यह पुराने सोवियत हथियारों की तुलना में कहीं अधिक घातक है।

निष्कर्ष के तौर पर, यह केवल हथियारों की बिक्री नहीं है, बल्कि भारत की नई और आक्रामक कूटनीति का प्रमाण है। तुर्की, पाकिस्तान और अजरबैजान के भारत-विरोधी रुख का जवाब भारत ने उनके ही पड़ोस में आर्मेनिया को सैन्य रूप से सशक्त बनाकर दिया है। अब वे अपने ही बुने हुए जाल में फंसते नजर आ रहे हैं।

पाकिस्तान और तुर्की के लिए यह एक कड़ा संदेश है कि यदि वे भारत के आंतरिक मामलों में दखल देंगे, तो भारत उनके प्रभाव क्षेत्र में घुसकर उनके समीकरण बिगाड़ने की क्षमता रखता है। साथ ही, यह ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता को भी दर्शाता है। आज भारत केवल हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि उन्नत रक्षा तकनीक का वैश्विक निर्यातक बन चुका है।

Share This Article
Leave a Comment