पाकिस्तान की बेरुखी बनाम भारत की दरियादिली: अफगान शरणार्थियों के लिए संकटमोचक बना हिंदुस्तान

दुनिया के मानचित्र पर एक देश ऐसा है जो अपने ही पड़ोसियों के साथ विश्वासघात के लिए कुख्यात है, वहीं दूसरी ओर भारत है जिसे आज संपूर्ण विश्व अपना ‘संकटमोचक’ मानता है। एक तरफ आर्थिक बदहाली से जूझ रहा पाकिस्तान है, जो दशकों तक अफगान अवाम को पनाह देने का स्वांग रचता रहा और आज उन्हें निर्दयता से अपने मुल्क से खदेड़ रहा है। इसके विपरीत, भारत मानवता का परिचय देते हुए बिना किसी स्वार्थ के इन्हीं बेघर और लाचार अफगानियों के लिए आश्रय का प्रबंध कर रहा है। यह मात्र एक समाचार नहीं है, बल्कि वैश्विक पटल पर भारत की एक ऐसी सशक्त तस्वीर है जिसने पाकिस्तान के खोखले ‘धार्मिक भाईचारे’ के दावों की कलई खोल दी है।

कल्पना कीजिए, जिन अफगानियों ने पाकिस्तान को अपना दूसरा घर समझा, आज वही पाकिस्तानी तंत्र सेना और पुलिस के दम पर उन्हें ट्रकों में भरकर सीमा पार धकेल रहा है। बिना किसी पूर्व सूचना या दयाभाव के, उन्हें अवैध प्रवासी बताकर निष्कासित किया जा रहा है। जब ये हजारों असहाय परिवार अफगानिस्तान की बंजर भूमि पर कदम रखते हैं, तो उनके पास न छत होती है और न ही आजीविका। ऐसी विषम परिस्थिति में भारत एक मसीहा के रूप में सामने आया है।

भारत का मानवीय मास्टरस्ट्रोक

भारत सरकार ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को दिखा दिया है कि हमारी विदेश नीति केवल राजनयिक बैठकों तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देती है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने आधिकारिक तौर पर साझा किया है कि भारत ने अफगानिस्तान के शरणार्थी और पुनर्वास मंत्रालय (MoRR) को मानवीय सहायता के अंतर्गत बड़ी संख्या में रिलीफ टेंट (राहत तंबू) प्रदान किए हैं।

ये टेंट उन अफगान परिवारों के लिए किसी जीवनदान से कम नहीं हैं जिन्हें पाकिस्तान ने रातों-रात बेघर कर दिया। ये केवल कपड़े के टेंट नहीं, बल्कि भारत का वह अटूट भरोसा है जो संकट के समय अपने पड़ोसियों के काम आता है। भारत का ध्येय स्पष्ट है—जो लोग अपनी उम्र भर की कमाई पाकिस्तान में छोड़कर खाली हाथ लौट रहे हैं, उन्हें कम से कम खुले आसमान के नीचे न सोना पड़े।

पाकिस्तान का क्रूर चेहरा और हताशा

प्रश्न यह है कि पाकिस्तान आखिर इन शरणार्थियों के साथ इतनी बर्बरता क्यों कर रहा है? दरअसल, इसके पीछे उसकी आंतरिक विफलता और भू-राजनीतिक हताशा है। वर्षों तक आतंक को खाद-पानी देने वाले पाकिस्तान ने अफगानिस्तान को हमेशा अपने प्रोपेगेंडा के लिए इस्तेमाल किया, लेकिन वहां सत्ता परिवर्तन के बाद पाकिस्तान का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो गया।

साथ ही, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। आईएमएफ (IMF) के कर्ज में डूबा यह देश दिवालिया होने की कगार पर है। वहां महंगाई चरम पर है और जनता रोटी के लिए तरस रही है। अपनी इस ऐतिहासिक नाकामी से ध्यान भटकाने के लिए पाकिस्तान ने इन बेबस शरणार्थियों को बलि का बकरा बनाना शुरू कर दिया है। सरकार ने आदेश दिया कि बिना वैध दस्तावेजों वाले अफगानियों को देश छोड़ना होगा।

इसके लिए 10 जुलाई की समयसीमा निर्धारित की गई थी, जिसके समाप्त होते ही पाकिस्तानी प्रशासन ने वह क्रूरता शुरू की, जिसके लिए वह बदनाम है। मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाते हुए लोगों को घरों से जबरन निकाला जा रहा है।

ग्राउंड जीरो के चौंकाने वाले आंकड़े

निष्कासन के आंकड़े विचलित करने वाले हैं। अफगानिस्तान के मीडिया आउटलेट ‘अमू टीवी’ के अनुसार, तालिबान के आधिकारिक डेटा से पता चलता है कि पिछले सप्ताहांत केवल 24 घंटों के भीतर 4,000 से अधिक अफगानियों को पाकिस्तान सीमा से धक्के मारकर निकाल दिया गया।

पाकिस्तान के ही अखबार ‘डॉन’ की रिपोर्ट के अनुसार, लांडी कोटल स्थित हमजा बाबा ट्रांजिट पॉइंट पर मानवीय संकट गहरा गया है। स्थानीय अधिकारियों का मानना है कि प्रतिदिन 10,000 से अधिक अफगानी नागरिक वापस लौट रहे हैं। यह कोई सामान्य संख्या नहीं है, बल्कि एक बड़े मानवीय संकट की आहट है। ये वही लोग हैं जिन्होंने दशकों तक पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दिया, लेकिन आज उन्हें कूड़े की तरह फेंक दिया गया है।

मानवाधिकार और संयुक्त राष्ट्र की चिंता

इस संकट का सबसे हृदयविदारक पहलू महिलाओं और बच्चों की स्थिति है। वैश्विक मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र (UN) ने पाकिस्तान की इस कठोरता पर कड़ी आपत्ति जताई है। यूएनएचसीआर (UNHCR) के प्रवक्ता कैसर खान अफरीदी ने पाकिस्तान सरकार के निर्णय पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि महिलाओं और लड़कियों को ऐसे माहौल में वापस भेजा जा रहा है जहां उनके बुनियादी अधिकार ही सुरक्षित नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र ने अपील की है कि यदि निर्वासन करना ही है, तो यह स्वैच्छिक और सम्मानजनक होना चाहिए। परंतु पाकिस्तान से ‘सम्मान’ और ‘मानवता’ की अपेक्षा करना बेमानी है।

भारत की प्रतिबद्धता: मानवीय सेवा का अटूट संकल्प

भारत की वर्तमान विदेश नीति आक्रामक भी है और करुणामयी भी। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उल्लेख किया था कि अफगानिस्तान संकट के दौरान भारत ने न केवल नागरिकों को सुरक्षित निकाला, बल्कि पूर्ण सम्मान के साथ ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ के स्वरूपों को भी भारत लाया गया।

यह पहला अवसर नहीं है जब भारत ने अफगानिस्तान की मदद की हो। पूर्व में सूखे के संकट के दौरान भारत ने 50,000 मीट्रिक टन गेहूं भेजकर लाखों लोगों को भुखमरी से बचाया था। विडंबना देखिए, वह गेहूं भी उसी पाकिस्तान के रास्ते गया था जो आज अफगानियों को भूखा मारने पर उतारू है। कोरोना काल में भी भारत ने ‘वैक्सीन मैत्री’ के जरिए जीवन रक्षक दवाएं और वैक्सीन अफगानिस्तान पहुंचाई थीं।

दक्षिण एशिया का वास्तविक नेतृत्व

भारत की यह ‘सॉफ्ट पावर’ कूटनीति एक बड़ा गेमचेंजर है। एक तरफ पाकिस्तान है जिसके सभी नैरेटिव ध्वस्त हो चुके हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत है जिसने कभी अपना एजेंडा नहीं थोपा, बल्कि वहां के लोगों के दिलों को जीता है। भारत ने वहां सलमा डैम, संसद भवन, सड़कें और अस्पताल बनवाए हैं।

आज की वैश्विक परिस्थिति से यह स्पष्ट है कि दक्षिण एशिया का असली नेतृत्व भारत के पास है। पाकिस्तान एक ‘विफल राष्ट्र’ बन चुका है जिसके पास न तो साख बची है और न ही संसाधन। इसके विपरीत, भारत ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की नीति को चरितार्थ कर रहा है। भले ही हमने वहां की वर्तमान सरकार को मान्यता न दी हो, लेकिन हमारा जुड़ाव वहां की जनता से है। पाकिस्तान आज जो नफरत बो रहा है, उसका फल उसे भविष्य में भुगतना होगा, जबकि भारत का मानवीय दृष्टिकोण उसे विश्व गुरु की ओर अग्रसर कर रहा है।

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