दक्षिण चीन सागर की उफनती लहरों से लेकर काकेशस के सुलगते पहाड़ों तक एक ऐसी खामोश बिसात बिछाई जा चुकी है, जिसने रातों-रात बीजिंग, अंकारा और इस्लामाबाद की नींद उड़ा दी है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि कल तक दुनिया भर से हथियार खरीदने के लिए लाइन में लगने वाला भारत इन दोनों के आर्म्स मार्केट का नया बाजीगर बन गया है। क्यों भारत के एक इशारे पर फिलीपींस अपनी पूरी डिफेंस स्ट्रेटेजी बदलने को तैयार हो गया है। अज़रबैजान और तुर्किये के खतरनाक गठजोड़ को मिट्टी में मिलाने के लिए आर्मेनिया को भारत अपना सबसे घातक 120 km रेंज वाला रॉकेट सिस्टम क्यों सौंपने जा रहा है। और सबसे बड़ा सवाल, जब आर्मेनिया यूरोपीय संघ यानी EU और रूस के EAEU के बीच एक भयंकर जिओपॉलिटिकल युद्ध में फंसा है, तो वहां भारतीय रक्षा मंत्रालय की सीक्रेट मीटिंग्स किस नए तूफान की तैयारी कर रही हैं। अगर आपको लगता है कि भारत सिर्फ अपनी सीमाओं पर बैठकर दुनिया का तमाशा देख रहा है, तो आप बहुत बड़े मुगालते में हैं। आज भारत उसी की भाषा में, उसी के अखाड़े में घुसकर अपने दुश्मनों को घेर रहा है, और यह सब हो रहा है भारत की उस नई आक्रामक विदेश और रक्षा नीति के दम पर, जिसने वेस्टर्न देशों और चीन के हथियार माफियाओं का पूरा सिंडिकेट हिलाकर रख दिया है।
डिफेंस मार्केट का नया ग्लोबल बाजीगर भारत
आज से कुछ साल पहले तक किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि भारत, जो खुद हथियारों का सबसे बड़ा इंपोर्टर रहा है, वह एक दिन दुनिया के उन देशों को अपने हथियार बेचेगा जो सीधे तौर पर चीन और तुर्किये जैसे विस्तारवादी देशों के निशाने पर हैं। मोदी सरकार की डिफेंस एक्सपोर्ट पॉलिसी ने अब एक ऐसा गियर बदला है, जिसका सीधा असर ग्लोबल पावर डायनामिक्स पर पड़ रहा है। सबसे पहले बात करते हैं फिलीपींस की, जहां इस वक्त चीन के खिलाफ एक बहुत बड़ी किलेबंदी चल रही है। फिलीपींस वही देश है जो साउथ चाइना सी में चीन की दादागिरी का सीधा शिकार है। चीन के जहाज आए दिन फिलीपींस की नौसेना को धमकाते हैं, लेकिन अब मनीला ने बीजिंग के इस गुरूर को तोड़ने के लिए भारत का हाथ थाम लिया है। साल 2022 में फिलीपींस ने भारत के साथ 375 मिलियन डॉलर की ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की जो डील साइन की थी, उसने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था। अब उस डील के तहत ब्रह्मोस की बैटरीज फिलीपींस को डिलीवर भी की जा चुकी हैं। लेकिन असली खेल तो अब शुरू हुआ है।
फिलीपींस के साथ आकाश 1एस डिफेंस डील
लेटेस्ट रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिलीपींस अब भारत से 200 मिलियन डॉलर की एक और मेगा डील करने जा रहा है। और यह डील है भारत के स्वदेशी आकाश 1एस एयर डिफेंस सिस्टम की। साल 2026 तक इस डील के फाइनल होने की पूरी उम्मीद है। आप सोच रहे होंगे कि इसमें इतनी बड़ी बात क्या है। बड़ी बात यह है कि ब्रह्मोस एक ऑफेंसिव वेपन है, जो समंदर में चीन के जंगी जहाजों को पलक झपकते ही तबाह कर सकता है। लेकिन दुश्मन के पलटवार को हवा में ही खाक करने के लिए एक मजबूत शील्ड की जरूरत होती है। आकाश 1एस वही अचूक शील्ड है। यह सिस्टम फाइटर जेट्स, हेलीकॉप्टर्स, क्रूज मिसाइल्स और यहां तक कि दुश्मन के ड्रोन स्वार्म को हवा में ही इंटरसेप्ट करके राख कर सकता है। अगर फिलीपींस को आकाश सिस्टम मिल जाता है, तो वह भारत के हथियारों से एक पूरा लेयर्ड डिफेंस आर्किटेक्चर तैयार कर लेगा। समंदर से हमला करने वालों के लिए ब्रह्मोस और हवा से हमला करने वालों के लिए आकाश सिस्टम। यह भारत के लिए एक बहुत बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत है, क्योंकि इससे भारत दुनिया के सामने वेस्टर्न और चाइनीज हथियारों का एक बेहद सॉलिड और रिलायबल अल्टरनेटिव बनकर उभर रहा है।
स्पेस पावर और प्रिसिजन स्ट्राइक का डेडली कॉम्बिनेशन
लेकिन क्या इतने घातक और सटीक हमले सिर्फ जमीन पर रखे रडार से मुमकिन हैं। बिल्कुल नहीं। यहीं पर एंट्री होती है भारत की स्पेस पावर की। इसरो द्वारा डेवलप किया गया ईओएस-05 यानी अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट जैसे एडवांस स्पेस एसेट्स आज भारत की सामरिक ताकत की रीढ़ बन चुके हैं। जब आप 120 किलोमीटर दूर बैठे दुश्मन के ठिकानों को तबाह करने की सोचते हैं, तो आपको पिनपॉइंट एक्यूरेसी वाले रियल टाइम डेटा और हाई रेजोल्यूशन इमेजरी की जरूरत होती है। इसरो के यह अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स दुश्मन की हर हरकत, उनके मिलिट्री बेस, उनके आर्टिलरी डिप्लॉयमेंट और उनके रसद के रास्तों पर अंतरिक्ष से पैनी नजर रखते हैं। यही डेटा जब भारत के एडवांस वेपन सिस्टम्स में फीड किया जाता है, तो मिसाइलें और रॉकेट्स दुश्मन के छिपने के हर ठिकाने को श्मशान में बदल देते हैं। स्पेस टेक्नोलॉजी और ग्राउंड फायरपावर का यह डेडली कॉम्बिनेशन ही भारत के हथियारों को आज दुनिया में सबसे ज्यादा डिमांडिंग बना रहा है।
काकेशस में भारत का नया रणनीतिक दांव
फिलीपींस के बाद अब नजर डालिए काकेशस के उस बारूदी इलाके पर, जहां तुर्किये और पाकिस्तान की शह पर अज़रबैजान लगातार आर्मेनिया के वजूद को मिटाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन आर्मेनिया ने भी अब ठान लिया है कि वह घुटने नहीं टेकेगा, और इस लड़ाई में उसका सबसे बड़ा तारणहार बनकर उभरा है भारत। आर्मेनिया पहले ही भारत से 75 किलोमीटर रेंज वाला गाइडेड पिनाका सिस्टम खरीद चुका है, जिसने अज़रबैजान के खेमे में भारी खलबली मचाई थी। लेकिन अब डिफेंस सोर्सेज से जो खबर बाहर आ रही है, वह तुर्किये और अज़रबैजान के होश उड़ाने के लिए काफी है। आर्मेनिया अब भारत के अपकमिंग 120 किलोमीटर रेंज वाले नए गाइडेड पिनाका रॉकेट का पहला इंटरनेशनल कस्टमर बनने की तैयारी कर रहा है। यह कोई साधारण रॉकेट नहीं है। 120 किलोमीटर की रेंज का मतलब है कि आर्मेनिया की सेना अपनी सीमा के अंदर सुरक्षित बैठकर अज़रबैजान के डीप मिलिट्री बेस, लॉजिस्टिक्स हब और कमांड पोस्ट को सेकंडों में तबाह कर सकती है।
आर्मेनिया के लिए गेमचेंजर साबित होगा 120 किमी पिनाका
इस नई 120 किलोमीटर पिनाका का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आर्मेनिया को इसके लिए कोई नया लॉन्चर या नया इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं खरीदना पड़ेगा। यह पुराने लॉन्चर से ही फायर की जा सकेगी। इसका सीधा मतलब है कि आर्मेनिया की सेना को बिना किसी एक्स्ट्रा ट्रेनिंग और भारी खर्चे के अपनी मारक क्षमता को लगभग दोगुना करने का मौका मिल रहा है। भारत के डिफेंस सेक्टर की यही खूबी है, वह स्केलेबल वेपन फैमिली डेवलप कर रहा है, जिससे खरीदार देश को बार-बार पूरा सिस्टम बदलने की जरूरत ना पड़े। मिड 2027 तक इस 120 किलोमीटर गाइडेड पिनाका का प्रोडक्शन शुरू होने की उम्मीद है और आर्मेनिया को इसे सबसे पहले ऑफर किया जाएगा। सोचिए, जब यह रॉकेट आर्मेनिया के पहाड़ों पर तैनात होगा, तो पाकिस्तान के उन भाड़े के आतंकियों और तुर्किये के उन बायरकतार ड्रोन्स का क्या हश्र होगा, जिनके दम पर अज़रबैजान उछल रहा है। दुनिया भर के देश, जो महंगे बैलिस्टिक मिसाइल नहीं खरीद सकते, वो आज भारत के इस कॉस्ट-इफेक्टिव और डेडली प्रिसिजन रॉकेट आर्टिलरी की तरफ टकटकी लगाए देख रहे हैं।
रूस, यूरोप और आर्मेनिया का जिओपॉलिटिकल भंवर
लेकिन यह पूरी कहानी सिर्फ हथियारों की खरीद-फरोख्त तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक बहुत बड़ा जिओपॉलिटिकल भंवर चल रहा है, जिसमें रूस, यूरोप और भारत के हित आपस में टकरा रहे हैं। आर्मेनिया इस वक्त एक ऐतिहासिक दोराहे पर खड़ा है। आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान ने हाल ही में एक ऐसा ऐलान कर दिया है जिसने मॉस्को में भूकंप ला दिया है। निकोल पाशिन्यान ने कहा है कि उनका देश जल्द ही यूरोपीय संघ यानी ईयू की सदस्यता के लिए आवेदन करने की प्रक्रिया शुरू करेगा। इस एक बयान ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को बुरी तरह भड़का दिया है। रूस का कहना है कि आर्मेनिया वर्तमान में ईएईयू यानी यूरेशियन इकॉनमिक यूनियन का हिस्सा है, जिसे रूस लीड करता है। अगर आर्मेनिया ईयू में जाने की कोशिश करता है, तो उसे ईएईयू से मिलने वाली तमाम रियायतें और व्यापारिक फायदे रातों-रात खत्म हो जाएंगे।
रूसी चेतावनी और आर्मेनिया का कड़ा रुख
रूसी उप विदेश मंत्री मिखाइल गलुजिन और पुतिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने खुलेआम आर्मेनिया को चेतावनी दी है कि ईयू की सदस्यता के लिए आवेदन करने पर आर्मेनिया को भयंकर विरोधाभासों और मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। रूस, बेलारूस, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान साफ कह चुके हैं कि आर्मेनिया को इस मुद्दे पर देशव्यापी जनमत संग्रह कराना चाहिए। यह फैसला दिसंबर 2026 तक लिया जाना है, क्योंकि तभी ईएईयू के राष्ट्राध्यक्षों की बड़ी बैठक होनी है। आर्मेनिया के लिए यह फैसला आसान नहीं है। उसे कस्टम, व्यापार और कानूनों को यूरोपीय मानकों में ढालना होगा, जो कि एक बहुत लंबी और जटिल प्रक्रिया है। लेकिन आर्मेनिया यह रिस्क क्यों ले रहा है। क्योंकि 2020 के युद्ध में जब अज़रबैजान ने उस पर हमला किया था, तो रूस के नेतृत्व वाले सुरक्षा गठबंधन ने आर्मेनिया की कोई खास मदद नहीं की थी। तभी से आर्मेनिया ने समझ लिया था कि उसे अपनी सुरक्षा के लिए नए और भरोसेमंद साथी तलाशने होंगे।
भारतीय रक्षा सचिव की सीक्रेट मीटिंग्स और कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक
और यहीं पर भारत की एंट्री एक मास्टरस्ट्रोक साबित होती है। भारत के रिश्ते रूस से भी बेहतरीन हैं और आर्मेनिया से भी। जब आर्मेनिया और रूस के बीच तनातनी चल रही है, ठीक उसी वक्त भारतीय रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने आर्मेनिया की दो दिन की अहम यात्रा पूरी की है। इस यात्रा में उन्होंने आर्मेनिया के उप रक्षा मंत्री करेन ब्रुट्यान और जनरल स्टाफ प्रमुख एडवर्ड अस्र्यान के साथ लंबी और सीक्रेट द्विपक्षीय बैठकें की हैं। इस दौरान क्षमता निर्माण, मिलिट्री ट्रेनिंग और डिफेंस आरएंडडी को लेकर बहुत ही क्रिटिकल चर्चा हुई है। दोनों देशों के रक्षा मंत्रालयों के बीच एक बड़ा एमओयू साइन हुआ है, जो इस बात का सबूत है कि आर्मेनिया चाहे ईयू में जाए या ईएईयू में रहे, भारत उसके लिए एक सॉलिड डिफेंस पार्टनर बना रहेगा। भारत यहां बहुत ही स्मार्ट कूटनीति खेल रहा है। वह रूस को नाराज किए बिना काकेशस में अपना इन्फ्लुएंस बढ़ा रहा है और साथ ही तुर्किये-पाकिस्तान-अज़रबैजान एक्सिस को उसी के घर में काउंटर कर रहा है।
मेक इन इंडिया बना दुनिया का नया ब्रह्मास्त्र
अब जरा पूरी तस्वीर को एक साथ रखकर देखिए। एक तरफ ईस्ट में साउथ चाइना सी है, जहां भारत फिलीपींस को ब्रह्मोस और आकाश 1एस देकर चीन की घेराबंदी कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ वेस्ट में काकेशस के पहाड़ हैं, जहां भारत आर्मेनिया को 120 किलोमीटर गाइडेड पिनाका और आर्टिलरी गन्स देकर तुर्किये और पाकिस्तान के मंसूबों पर पानी फेर रहा है। यह नया भारत है, जो डिफेंस इंपोर्टर के टैग को उखाड़ फेंककर अब दुनिया भर में सुरक्षा की नई छतरी तान रहा है। जब 2026 में फिलीपींस को आकाश 1एस मिलेगा और 2027 में आर्मेनिया की सरजमीं पर 120 किलोमीटर पिनाका की तैनाती होगी, तब दुनिया देखेगी कि मेक इन इंडिया सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि दुनिया के पावर बैलेंस को बदलने वाला सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र है। भारत के इस बढ़ते डिफेंस एक्सपोर्ट और आक्रामक जिओपॉलिटिकल माइंडसेट पर आपकी क्या राय है। क्या आपको लगता है कि भारत को अब वियतनाम और ताइवान जैसे देशों को भी ऐसे घातक हथियार बेचना शुरू कर देना चाहिए ताकि चीन को उसी की भाषा में परमानेंट जवाब दिया जा सके। अपनी राय कमेंट्स में जरूर बताएं, क्योंकि भारत की यह नई उड़ान अभी सिर्फ एक शुरुआत है, असली तूफान तो अभी आना बाकी है।





