क्या पाकिस्तान का पांच अरब डॉलर का महा-प्रोजेक्ट ‘नीलम-झेलम’ सिर्फ एक प्राकृतिक भूस्खलन से बर्बाद हुआ? या फिर इसके पीछे नई दिल्ली का कोई ऐसा मास्टरप्लान है, जिसने पाकिस्तानी सेना और आईएसआई की नींद उड़ा दी है? 2020 में एलओसी पर भारत की जवाबी कार्रवाई और 2024 में अचानक टनल के ढहने के बीच का वो रहस्य क्या है, जिसे पाकिस्तान की फौज पूरी दुनिया से छिपाने की नाकाम कोशिश कर रही है?
एक तरफ भारत ने सिंधु जल संधि के तहत कड़ाई दिखाई है, वहीं दूसरी तरफ अफगानिस्तान ने काबुल नदी का पानी रोक दिया है। क्या भारत और तालिबान के बीच कोई गुप्त समझौता हुआ है जिसने पाकिस्तान के खिलाफ ‘वॉटर वॉर’ का मोर्चा खोल दिया है? क्या चीन ने जानबूझकर पाकिस्तान को ऐसे ‘डेथ ट्रैप’ में फंसाया जिससे वह कभी उबर न सके? हाल ही में वाप्डा चेयरमैन के एक खुलासे ने पूरे इस्लामाबाद में हड़कंप मचा दिया है।
यह महज एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि बिना हथियार चलाए लड़ा गया दुनिया का सबसे घातक भू-राजनीतिक जल-युद्ध है। एक ऐसा खामोश मिशन जिसने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा की धज्जियां उड़ा दी हैं। आज हम उसी कूटनीतिक चक्रव्यूह को डिकोड करेंगे, जिसे भारत ने इतनी बारीकी से बुना है कि पाकिस्तान को संभलने का मौका तक नहीं मिला।
इस संकट की जड़ें पाकिस्तान सीनेट की एक बेहद गोपनीय मीटिंग में छिपी हैं। मुद्दा था नीलम-झेलम हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, जो पीओके के मुजफ्फराबाद में स्थित है। इस मीटिंग में वाप्डा (WAPDA) के अधिकारियों ने यह कड़वा सच कबूला कि 969 मेगावाट का यह विशाल प्रोजेक्ट अब मलबे के ढेर में तब्दील हो चुका है। 2024 में इसकी मुख्य हेडरेस टनल बुरी तरह ढह गई, जिससे बिजली का उत्पादन पूरी तरह ठप हो गया।
अधिकारियों के मुताबिक, इस बांध को फिर से खड़ा करने में 2028 तक का वक्त लगेगा। 2007 में शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट, जिस पर पाकिस्तान ने 500 अरब रुपये स्वाहा कर दिए, अब पूरी तरह बेकार हो चुका है। पाकिस्तानी सीनेटर्स अब सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह कोई साजिश है? लेकिन इस तबाही के तार सीधे तौर पर भारत की दूरगामी रणनीति से जुड़ते दिख रहे हैं।
इस खेल को समझने के लिए भारत के ‘किशनगंगा हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट’ को समझना जरूरी है। पाकिस्तान का नीलम-झेलम प्रोजेक्ट असल में भारत को अंतरराष्ट्रीय जल संधि के जाल में फंसाने के लिए था। नीलम नदी (किशनगंगा) पर अधिकार जताने के लिए पाकिस्तान ने हड़बड़ी में काम शुरू किया, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार जो देश पहले प्रोजेक्ट पूरा करता है, नदी के पानी पर पहला हक उसी का होता है।
पाकिस्तान को लगा था कि वह भारत से पहले डैम बनाकर बाजी मार लेगा, लेकिन भारत ने बांदीपोरा में किशनगंगा प्रोजेक्ट पर दिन-रात काम करके उनका खेल बिगाड़ दिया। भारत की सटीक इंजीनियरिंग और रणनीतिक गति ने पाकिस्तान को बैकफुट पर धकेल दिया।
जब भारत ने किशनगंगा का पानी वुलर झील की ओर मोड़ा, तो पाकिस्तान रोते हुए हेग स्थित इंटरनेशनल कोर्ट पहुंच गया। लेकिन भारत की मजबूत दलीलों के सामने पाकिस्तान की एक न चली। कोर्ट ने भारत के प्रोजेक्ट को पूरी तरह कानूनी करार दिया। 2018 में मोदी सरकार ने इस प्रोजेक्ट का उद्घाटन कर पाकिस्तान के मंसूबों पर पानी फेर दिया।
अब सवाल उठता है कि 2024 में यह टनल अचानक कैसे ढह गई? इसका सीधा कनेक्शन 13 नवंबर 2020 की उस रात से है, जब पाकिस्तान ने एलओसी पर सीजफायर तोड़ा था। भारत की सेना ने उस वक्त ऐसी भीषण गोलाबारी की थी कि पाकिस्तानी बंकर मिट्टी में मिल गए थे।
उस दौरान पाकिस्तान ने खुद दावा किया था कि भारतीय गोले नीलम-झेलम बांध के बेहद करीब गिरे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि उस वक्त की शॉकवेव्स ने घटिया चीनी निर्माण वाली इस टनल में सूक्ष्म दरारें पैदा कर दी थीं, जो 2024 तक आते-आते एक बड़े विनाश का कारण बनीं। पाकिस्तान अब अपनी नाकामी छिपाने के लिए इसे कुदरत का खेल बता रहा है।
इस तबाही से पाकिस्तान के नेशनल ग्रिड में भारी बिजली संकट पैदा हो गया है। अब उसे मजबूरन महंगी थर्मल बिजली पैदा करनी पड़ रही है, जिसके लिए उसके पास पैसे नहीं हैं। जनता पर बिजली बिलों का बोझ इतना बढ़ गया है कि लोग सड़कों पर उतर आए हैं। भारत ने बिना सीमा पार किए पाकिस्तान को आर्थिक रूप से पंगु बना दिया है।
पाकिस्तान का ‘सदाबहार दोस्त’ चीन भी अब कन्नी काट रहा है। नीलम-झेलम के निर्माण में चीनी कंपनी गेझोउबा ग्रुप ने घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया और अब जिम्मेदारी लेने के बजाय वहां से भाग खड़ी हुई है। चीन को अब अपने निवेश के डूबने का डर सता रहा है, और ऊपर से आतंकवादियों के डर ने चीनी इंजीनियर्स को पाकिस्तान छोड़ने पर मजबूर कर दिया है।
भारत ने अब ‘टू-फ्रंट वॉटर वॉर’ शुरू कर दिया है। पूरब में शाहपुर कंडी बैराज के जरिए रावी नदी का वह पानी रोक लिया गया है जो पाकिस्तान जाता था। अब वह पानी जम्मू-कश्मीर और पंजाब के किसानों के काम आ रहा है। इससे पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में खेती और पानी का हाहाकार मच गया है।
पश्चिम में अफगानिस्तान का तालिबान शासन भी पाकिस्तान के लिए मुसीबत बन गया है। काबुल नदी पर तालिबान के नए बांध और नहरें पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा को सुखा रही हैं। जानकारों का कहना है कि इसके पीछे भारत और तालिबान की कोई मूक सहमति हो सकती है। पाकिस्तान आज दोनों तरफ से पानी के लिए तरस रहा है।
सबसे बड़ी चुनौती पीओके (POK) में उठ रही बगावत है। वहां के लोग बिजली और बुनियादी सुविधाओं के लिए पाकिस्तान के खिलाफ सड़कों पर हैं। ‘अवामी एक्शन कमेटी’ के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन अब पाकिस्तान से आजादी की मांग कर रहा है। पीओके के लोग भारत के जम्मू-कश्मीर की प्रगति देखकर अब भारत के साथ आने के सपने देख रहे हैं।
मोदी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब पाकिस्तान की ब्लैकमेलिंग नहीं सहेगा। एफएटीएफ से लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक, भारत ने पाकिस्तान को अलग-थलग कर दिया है। भारत का लक्ष्य उसे केवल युद्ध में हराना नहीं, बल्कि उसे रणनीतिक रूप से अप्रासंगिक (irrelevant) बना देना है।
2028 तक बांध मरम्मत का दावा केवल जनता को शांत करने के लिए एक छलावा है। हकीकत यह है कि नीलम-झेलम प्रोजेक्ट अब पाकिस्तान के लिए एक ऐसा जख्म बन गया है, जो उसे हमेशा भारत की कूटनीतिक जीत की याद दिलाता रहेगा।

