शहबाज शरीफ का चीन दौरा और भारत का कूटनीतिक जवाब: क्या अब चलेगा तिब्बत कार्ड?

ड्रैगन ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपना असली चेहरा उजागर कर दिया है, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि चीन कभी भी भारत का विश्वसनीय मित्र नहीं हो सकता। ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों में मित्रता का स्वांग रचने वाला चीन, वास्तविकता में भारत के खिलाफ कूटनीतिक षड्यंत्र रचता रहता है। रूस और भारत के साथ मिलकर ‘ग्लोबल साउथ’ की वकालत करने का दिखावा करने वाले चीन ने अपनी कूटनीतिक मर्यादाओं को ताक पर रख दिया है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की हालिया बीजिंग यात्रा और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनके साझा बयान ने भारत के भीतर कड़े आक्रोश को जन्म दिया है।

इस जॉइंट स्टेटमेंट में कश्मीर को लेकर जो जहर उगला गया है, उसने यह सिद्ध कर दिया है कि बीजिंग और इस्लामाबाद की यह जुगलबंदी भारत की बढ़ती वैश्विक शक्ति से डरी हुई है। आखिर चीन क्यों बार-बार भारत की क्षेत्रीय अखंडता को चुनौती देने का दुस्साहस कर रहा है? क्या भारत की मजबूत होती अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता ड्रैगन के लिए सिरदर्द बन गई है? सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या अब भारत को चीन की दुखती रग यानी ‘तिब्बत’ पर सीधा कूटनीतिक प्रहार कर वैश्विक भू-राजनीति की दिशा बदल देनी चाहिए?

बीजिंग में तैयार हुआ भारत विरोधी एजेंडा

शहबाज शरीफ का यह बीजिंग दौरा कोई सामान्य राजनयिक शिष्टाचार नहीं था। यह एक ऐसे दिवालिया होते देश की छटपटाहट थी, जिसका खजाना खाली है और जो अपने आका के सामने मदद की गुहार लगाने पहुंचा था। शी जिनपिंग के साथ मिलकर पाकिस्तान ने एक ऐसा प्रोपेगंडा तैयार किया, जिसका एकमात्र उद्देश्य भारत की संप्रभुता पर हमला करना था।

इस साझा बयान में उसी पुरानी शब्दावली का प्रयोग किया गया है, जिसे पाकिस्तान दशकों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलापता रहा है। इस बार चीन ने पर्दे के पीछे रहने के बजाय खुलकर कश्मीर मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण का प्रयास किया है। विडंबना देखिए, जो चीन ताइवान और हांगकांग के मसले पर दुनिया को हस्तक्षेप न करने की धमकी देता है, वही आज भारत को कश्मीर पर उपदेश दे रहा है।

बयान में धूर्ततापूर्वक कहा गया कि कश्मीर विवाद का समाधान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के आधार पर होना चाहिए। चीन का यह रुख नया नहीं है, लेकिन इसकी टाइमिंग महत्वपूर्ण है। जब भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का केंद्र बन रहा है, तब चीन ऐसी साजिशों से भारत को उलझाना चाहता है।

CPEC की विफलता और हिंद महासागर की चुनौती

चीन-पाकिस्तान का यह गठबंधन केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है। इस मुलाकात का एक बड़ा एजेंडा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) को पुनर्जीवित करना भी था, जो फिलहाल वेंटिलेटर पर है। पूरी दुनिया देख रही है कि सीपीईसी पाकिस्तान में एक विफल प्रोजेक्ट साबित हुआ है। चीनी निवेश डूब रहा है और वहां के लोग चीनी नागरिकों का हिंसक विरोध कर रहे हैं। बलूचिस्तान में असंतोष की आग भड़क रही है, क्योंकि वहां के लोग चीन को अपने संसाधनों का लुटेरा मानते हैं।

शहबाज शरीफ ने ग्वादर पोर्ट की सुरक्षा बढ़ाने का आश्वासन दिया है, ताकि अरब सागर तक चीन की पहुंच सुरक्षित रहे। यह भारत को समुद्र में घेरने की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति का हिस्सा है। हालांकि, हिंद महासागर में भारतीय नौसेना की आक्रामक मौजूदगी ने चीन की नींद उड़ा रखी है। एक तरफ पाकिस्तान ग्वादर को बचाने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारत का विझिंजम पोर्ट वैश्विक समुद्री व्यापार का नया हब बनने के लिए तैयार है। भारतीय पनडुब्बियों और युद्धपोतों की सक्रियता ने चीन के मंसूबों पर पानी फेर रखा है।

मानवाधिकारों पर दोहरा मापदंड और ताइवान पर गुलामी

साझा बयान में दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता की बात की गई, जो किसी मजाक से कम नहीं है। जो देश अपनी विस्तारवादी नीति से पूरे एशिया में अशांति फैला रहा है और दक्षिण चीन सागर में पड़ोसियों को धमकाता है, वह शांति का उपदेश दे रहा है।

चीन खुद को यूएन चार्टर का रक्षक बताता है, जबकि उसने दक्षिण चीन सागर पर अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण के फैसले को मानने से इनकार कर दिया था। इनका यह दोहरा चरित्र अब दुनिया के सामने बेनकाब हो चुका है।

वहीं पाकिस्तान ने अपने आका को खुश करने के लिए ‘वन-चाइना पॉलिसी’ पर पूरी तरह समर्पण कर दिया है। खुद को उम्माह का रक्षक बताने वाला पाकिस्तान, शिनजियांग में उइगरों पर हो रहे अत्याचारों पर चुप्पी साधे हुए है। यह उसकी कूटनीतिक विवशता और गुलामी को दर्शाता है।

आतंकवाद और कूटनीतिक पाखंड

बयान में अफगानिस्तान के साथ संवाद और आतंकवाद (TTP और ETIM) के विरोध की बात की गई। यह चीन और पाकिस्तान का शुद्ध पाखंड है। चीन को ETIM से डर लगता है क्योंकि वह शिनजियांग में सक्रिय है, और पाकिस्तान को TTP से खतरा है क्योंकि वह अब उसी को निशाना बना रहा है।

लेकिन जब भारत के खिलाफ आतंकवाद की बात आती है, तो यही दोनों देश आतंकवादियों के संरक्षक बन जाते हैं। आज वही आतंकी सांप इन्हें ही डस रहे हैं। चीन अब SCO की अध्यक्षता के जरिए पाकिस्तान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है।

भारत का बदलता मिजाज और चीन का डर

चीन ब्रिक्स में भारत के साथ बैठकर बहु-ध्रुवीय विश्व की बात करता है, लेकिन वह चाहता है कि पूरी दुनिया केवल बीजिंग के आदेशों पर चले। वह भारत को अपनी राह का सबसे बड़ा अवरोध मानता है, क्योंकि भारत ही एकमात्र शक्ति है जो उसे चुनौती देने का माद्दा रखती है। चाहे डोकलाम हो या गलवान, भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी सीमाओं की रक्षा करना जानता है।

आज दुनिया भर की कंपनियां चीन छोड़कर भारत आ रही हैं। चीन की वर्तमान बौखलाहट का असली कारण भारत की आर्थिक तरक्की है। वह जानता है कि वह भारत को युद्ध में नहीं हरा सकता, इसलिए वह पाकिस्तान के जरिए छद्म युद्ध और कूटनीतिक बाधाएं उत्पन्न कर रहा है।

तिब्बत: भारत का अंतिम कूटनीतिक प्रहार

चीन और पाकिस्तान को यह समझ लेना चाहिए कि यह बदलता हुआ भारत है। भारतीय विदेश मंत्रालय अब रक्षात्मक मुद्रा छोड़कर आक्रामक हो गया है। हमारी सेनाएं सीमाओं पर अत्याधुनिक हथियारों के साथ तैनात हैं और बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर का काम तेजी से पूरा हो रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है जब भारत को चीन की सबसे कमजोर नस—तिब्बत—पर वार करना चाहिए। तिब्बत के लोग दशकों से चीन के अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं और अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाना चाहते हैं।

यदि चीन कश्मीर का मुद्दा उठा सकता है, तो भारत को भी तिब्बत में मानवाधिकारों और वहां की स्वायत्तता का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना चाहिए। ‘वन-चाइना पॉलिसी’ की समीक्षा करना अब अनिवार्य हो गया है। अगर चीन हमारे सम्मान को ठेस पहुंचाएगा, तो हम भी कूटनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक के लिए तैयार हैं।

यह साझा बयान भारत के खिलाफ एक कूटनीतिक युद्ध की घोषणा है। चीन ने अपना दांव चल दिया है, अब भारत के प्रत्युत्तर की बारी है। पूरी दुनिया की नजरें भारत के अगले कदम पर हैं। क्या कश्मीर पर चीन की यह टिप्पणी उसके पतन की शुरुआत होगी? अगले विश्लेषण में हम तिब्बत के मुद्दे की गहराई में जाएंगे। तब तक, आप हमें बताएं कि क्या भारत को अब चीन के खिलाफ तिब्बत कार्ड का उपयोग कर देना चाहिए?

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