खाड़ी में महासंग्राम: होर्मुज जलडमरूमध्य पर कब्जे की जंग और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ता तनाव

दुनिया के सबसे संवेदनशील और नीले समंदर वाले खाड़ी क्षेत्र में चल रहे वर्तमान संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक भीषण संकट की कगार पर खड़ा कर दिया है। एक तरफ दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति अमेरिका है, तो दूसरी तरफ मध्य पूर्व का प्रभावशाली देश ईरान, जिसने पश्चिमी देशों के सामने झुकने से साफ इनकार कर दिया है। ओमान और ईरान के बीच स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य, जिसे विश्व का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्ग माना जाता है, वहां फिलहाल मालवाहक जहाजों का आवागमन ठप हो गया है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि संयुक्त राष्ट्र को भी अब अपनी चुप्पी तोड़नी पड़ी है। हालांकि, सवाल यही बना हुआ है कि क्या अमेरिका और ईरान कूटनीतिक रास्तों को अपनाएंगे या सैन्य टकराव जारी रहेगा?

आज हम आपको खाड़ी क्षेत्र में जारी इस भू-राजनीतिक संघर्ष की वह आंतरिक कहानी बताने जा रहे हैं, जिसने दुनिया भर के विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया है। यह विवाद सिर्फ दो देशों के बीच का नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर वैश्विक पेट्रोल, डीजल और गैस की आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ रहा है। यदि यह तनाव कम नहीं हुआ, तो दुनिया को ऐसी महंगाई का सामना करना पड़ सकता है, जिसे नियंत्रित करना नामुमकिन होगा।

फरवरी की सैन्य कार्रवाई और विफल समझौता

इस विवाद की जड़ें फरवरी के अंत में हुए घटनाक्रमों से जुड़ी हैं, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के सैन्य और परमाणु बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने के लिए एक व्यापक बमबारी अभियान चलाया था। तेहरान ने इसका कड़ा जवाब देते हुए गल्फ रीजन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले शुरू कर दिए। इन हमलों ने पूरे क्षेत्र की स्थिरता को हिलाकर रख दिया।

जब वैश्विक शेयर बाजार इस तनाव के कारण गिरने लगे, तब करीब एक महीने पहले वाशिंगटन और तेहरान के बीच एक समझौता (MoU) हुआ था। दुनिया को उम्मीद थी कि इस युद्धविराम से होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही सामान्य हो जाएगी। लेकिन यह शांति केवल कुछ दिनों की ही रही और अब यह स्थिति एक बड़े विनाशकारी मोड़ पर पहुंच गई है।

होर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की नस

होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि दुनिया के कुल तेल और गैस निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे मार्ग से होकर गुजरता है। यदि यह मार्ग अवरुद्ध होता है, तो दुनिया भर के पावर प्लांट और परिवहन सेवाएं ठप हो सकती हैं।

ईरान का दावा है कि इस जलडमरूमध्य पर उसका संप्रभु अधिकार है, इसलिए उसने यहां से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों पर ‘टोल टैक्स’ लगाने की घोषणा की। अमेरिका ने इसे ‘नौवहन की स्वतंत्रता’ (Freedom of Navigation) का उल्लंघन बताते हुए इसे मानने से इनकार कर दिया। अमेरिका किसी भी सूरत में ईरान को वैश्विक तेल व्यापार को नियंत्रित करने का अवसर नहीं देना चाहता, जिसके कारण दोनों देशों के बीच मिसाइल युद्ध का खतरा फिर से मंडराने लगा है।

नागरिक ठिकानों पर प्रहार और खाड़ी देशों का संकट

पिछले दो सप्ताहों में यह संघर्ष सैन्य ठिकानों से निकलकर नागरिक बुनियादी ढांचे तक पहुंच गया है। अमेरिकी हमलों में ईरान के प्रमुख पुलों और परिवहन सेवाओं को निशाना बनाया गया है ताकि उनकी रसद आपूर्ति रोकी जा सके। इसके जवाब में ईरान ने भी समुद्री मार्ग में अपनी आक्रामक गतिविधियां बढ़ा दी हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों ने इस मार्ग का उपयोग करना बंद कर दिया है।

इस युद्ध का सबसे दुखद पहलू उन देशों पर पड़ रहा है जो सीधे तौर पर इस लड़ाई का हिस्सा नहीं हैं। कुवैत में एक प्रमुख डिसेलिनेशन प्लांट (खारे पानी को मीठा बनाने वाला संयंत्र) के क्षतिग्रस्त होने की सूचना है। रेगिस्तानी देशों के लिए ये प्लांट जीवन रेखा के समान हैं। यदि पेयजल आपूर्ति के इन स्रोतों को नुकसान पहुंचता है, तो यह एक मानवीय आपदा का रूप ले सकता है।

संयुक्त राष्ट्र की अपील और भू-राजनीतिक वास्तविकता

संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने नागरिक बुनियादी ढांचे पर हो रहे इन हमलों को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया है। यूएन का कहना है कि इस संकट का कोई सैन्य समाधान नहीं है और केवल कूटनीतिक बातचीत के जरिए ही शांति बहाल की जा सकती है।

हालांकि, वर्तमान वैश्विक परिवेश में संयुक्त राष्ट्र की इन अपीलों का प्रभाव कम होता दिख रहा है। जब बात राष्ट्रीय हितों और वर्चस्व की आती है, तो शक्तिशाली राष्ट्र अक्सर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सुझावों को दरकिनार कर देते हैं। होर्मुज में नेविगेशन की आजादी बहाल करना तभी संभव है जब अमेरिका और ईरान अपनी जिद छोड़कर बातचीत की मेज पर आएं, लेकिन फिलहाल दोनों ही पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

भारत के लिए रणनीतिक सबक

इस संकट से भारत जैसे विकासशील देशों के लिए एक महत्वपूर्ण सबक मिलता है। ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी एक क्षेत्र या मार्ग पर निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है। भारत द्वारा अपनी ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों का विविधीकरण करना और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को बनाए रखना, भविष्य में ऐसे संकटों से बचने का एकमात्र तरीका है।

आज मध्य पूर्व बारूद के ढेर पर खड़ा है। छोटी सी भी चूक इस क्षेत्र को पूर्ण विकसित युद्ध में धकेल सकती है। यदि कूटनीति सफल नहीं होती है, तो विश्व को एक ऐसे आर्थिक संकट का सामना करना पड़ेगा जिसकी भरपाई करने में दशकों लग सकते हैं। अब यह वाशिंगटन और तेहरान के नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वे युद्ध का रास्ता चुनते हैं या शांति का।

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