समंदर में भारत की नई चाल! IMEC के चक्रव्यूह में फंसा चीन, इटली बना टीम इंडिया का सबसे बड़ा मददगार

यूरोप की धरती पर भारत ने एक ऐसी कूटनीतिक और आर्थिक बिसात बिछाई है, जिसने बीजिंग की सत्ता को गहरी चिंता में डाल दिया है। जिस चीन ने अपने ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के जरिए एशिया, अफ्रीका और यूरोप को कर्ज के जाल में फंसाने का सपना देखा था, उसे अब भारत ने ऐसा करारा जवाब दिया है कि ड्रैगन के रणनीतिकार नए सिरे से नक्शे पलटने पर मजबूर हो गए हैं। जरा सोचिए, जो इटली कभी चीन के BRI का एकमात्र G7 मोहरा था, वही इटली अब चीन का साथ छोड़कर भारत के साथ मजबूती से खड़ा हो गया है। इटली न सिर्फ भारत का साथी बना है, बल्कि वह यूरोप के लिए भारत का सबसे बड़ा ‘एंट्री गेट’ बनने की तैयारी में है। अब भूमध्य सागर की लहरों के जरिए भारत का माल सीधे यूरोप के बाजारों में पहुंचेगा, जिससे चीन के पुराने व्यापारिक रास्तों का वर्चस्व खत्म हो जाएगा।

आखिरकार ऐसी क्या स्थिति बनी कि इटली ने चीन का साथ पूरी तरह छोड़ दिया? भारत, अमेरिका और यूरोप ने मिलकर IMEC नाम का जो आर्थिक चक्रव्यूह रचा है, उसने चीन की नींद क्यों उड़ा दी है? और क्या भारत अब वैश्विक व्यापार का नया किंगमेकर बनने जा रहा है? इन सभी सवालों के जवाब में दुनिया का वह सबसे बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव छिपा है, जो भारत की बढ़ती शक्ति का प्रतीक है।

जी20 शिखर सम्मेलन: वह ऐतिहासिक पल जिसने बदल दी वैश्विक राजनीति

इस पूरी घटना को विस्तार से समझने के लिए 9 सितंबर 2023 की तारीख बेहद अहम है। नई दिल्ली में जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान भारत की दमदार लीडरशिप में एक बड़े समझौते पर हस्ताक्षर हुए। भारत, अमेरिका, सऊदी अरब, यूएई, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय संघ ने मिलकर ‘इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर’ (IMEC) की नींव रखी, जिसने चीन के रणनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी।

जब नई दिल्ली में इस प्रोजेक्ट का ऐलान हो रहा था, तब चीन को यह स्पष्ट हो गया था कि भारत ने बिना किसी सैन्य टकराव के, केवल अपनी आर्थिक और कूटनीतिक सूझबूझ से उसके खरबों डॉलर के BRI प्रोजेक्ट को चुनौती दे दी है। भारत ने पश्चिम एशिया से यूरोप तक एक ऐसा आधुनिक व्यापारिक मार्ग तैयार करने का खाका खींचा है, जिसका मुकाबला करना चीन के लिए लगभग असंभव है।

IMEC की शक्ति और ड्रैगन की बेचैनी

IMEC की असली ताकत इसके विजन और बुनियादी ढांचे में छिपी है। यह केवल एक सड़क या समुद्री मार्ग नहीं है, बल्कि एक हाई-टेक नेटवर्क है। इसमें विशाल मालवाहक जहाज, सुपरफास्ट रेलवे नेटवर्क, अत्याधुनिक लॉजिस्टिक्स हब, हाइड्रोजन पाइपलाइन्स और समुद्र के नीचे बिछने वाली डिजिटल कनेक्टिविटी केबल्स का एक जाल शामिल है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस कॉरिडोर के शुरू होने से भारत और यूरोप के बीच माल भेजने के समय में 40 प्रतिशत की कमी आएगी। इसके साथ ही, माल ढुलाई की लागत (Logistics Cost) में भी 30 प्रतिशत की भारी गिरावट होने की उम्मीद है। वैश्विक व्यापार में लागत की यह बचत किसी भी देश के लिए गेमचेंजर हो सकती है। यही वजह है कि आज यूरोपीय देश चीन के विवादास्पद रास्तों के बजाय भारत के इस पारदर्शी और तेज मार्ग पर भरोसा कर रहे हैं। इसका लक्ष्य दुनिया की आर्थिक ताकत को किसी एक देश की तानाशाही से बचाकर न्यायपूर्ण तरीके से सभी के बीच साझा करना है।

BRI का पर्दाफाश और चीन का कर्ज जाल

साल 2013 में चीन ने बीआरआई (BRI) को सदी के सबसे बड़े प्रोजेक्ट के तौर पर पेश किया था, लेकिन समय के साथ इसकी कड़वी सच्चाई दुनिया के सामने आ गई। चीन का मॉडल बहुत चालाकी भरा था; वह गरीब देशों को आलीशान बुनियादी ढांचे के सपने दिखाकर भारी कर्ज देता था, जिसकी ब्याज दरें बहुत ऊंची होती थीं।

जब ये देश कर्ज चुकाने में असमर्थ हो जाते थे, तो चीन उनके रणनीतिक बंदरगाहों और जमीन पर कब्जा कर लेता था। श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसे कर्ज न चुका पाने की वजह से 99 साल के लिए चीन को सौंपना पड़ा। अफ्रीका के कई देश भी इसी आर्थिक और राजनीतिक गुलामी के शिकार हुए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि BRI में पारदर्शिता का अभाव था और यह देशों की संप्रभुता के लिए खतरा बन गया था। इसके विपरीत, भारत का IMEC मॉडल पूरी तरह पारदर्शी, बहुपक्षीय और विकास में साझेदारी पर आधारित है। इसी विश्वास ने दुनिया का ध्यान चीन से हटाकर भारत की ओर केंद्रित कर दिया है।

इटली का विद्रोह: चीन की आर्थिक तानाशाही को जवाब

2019 में इटली BRI में शामिल होने वाला पहला G7 देश बना था, जिसने तब सबको हैरान कर दिया था। चीन ने वादा किया था कि इससे इटली में भारी निवेश आएगा और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन चार साल के भीतर ही हकीकत सामने आ गई—इटली को कोई खास आर्थिक लाभ नहीं हुआ, बल्कि चीन के साथ उसका व्यापार घाटा बढ़ गया।

इटली को समझ आ गया कि चीन केवल अपने सस्ते माल को डंप करने के लिए उसके बाजारों का इस्तेमाल कर रहा है। आखिरकार, दिसंबर 2023 में इटली ने साहसिक फैसला लेते हुए चीन के BRI से खुद को अलग कर लिया। यह चीन के लिए एक बड़ा कूटनीतिक झटका था और दुनिया को एक संदेश था कि आर्थिक गुलामी अब स्वीकार्य नहीं है।

इटली का यह कदम भारत के लिए नए अवसरों के द्वार खोलने जैसा था।

इटली: भारत के लिए यूरोप का नया व्यापारिक प्रवेश द्वार

चीन का साथ छोड़ने के बाद इटली ने भारत के IMEC प्रोजेक्ट को अपना समर्थन दिया है। अब इटली यूरोप के मुख्य प्रवेश द्वार के रूप में खुद को स्थापित कर रहा है। इससे भारत के कारखानों में बना माल अरब सागर और भूमध्य सागर के रास्ते सीधे इटली के बंदरगाहों पर उतरेगा और वहां से तेजी के साथ पूरे यूरोप के बाजारों में वितरित किया जाएगा।

इटली के ट्रिएस्टे, जेनोआ और वेनिस जैसे बंदरगाह इस कॉरिडोर के मुख्य केंद्र होंगे। ट्रिएस्टे बंदरगाह अपनी गहराई और बेहतरीन रेल नेटवर्क की वजह से बड़े जहाजों के लिए आदर्श है। यहाँ से माल उतरने के कुछ ही घंटों के भीतर जर्मनी और ऑस्ट्रिया जैसे देशों तक पहुँच सकेगा।

इटली की यह रणनीति उसे यूरोप का सबसे बड़ा लॉजिस्टिक हब बना सकती है। चीन इसी बात से परेशान है कि उसका पुराना व्यापारिक नेटवर्क अब अप्रासंगिक होने की कगार पर है।

जब ‘मेक इन इंडिया’ और ‘पीएलआई स्कीम’ के तहत बने भारतीय उत्पाद बिना किसी बाधा के यूरोप पहुंचेंगे, तो भारतीय अर्थव्यवस्था एक नई ऊंचाई को छुएगी। भारत का बढ़ता कद यह साबित करता है कि वह एक ऐसा ग्लोबल लीडर है जो अपने साथ-साथ अपने सहयोगियों की प्रगति में भी विश्वास रखता है।

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