वैश्विक भू-राजनीति के मंच पर भारत ने एक ऐसी चाल चली है जिसने बीजिंग के सत्ता के गलियारों में खलबली मचा दी है। जहाँ अमेरिका, रूस और यूरोप अपने-अपने दांव-पेच में उलझे रहे, वहीं नई दिल्ली ने एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला है जिसने सीधे ड्रैगन की सबसे कमजोर रग पर चोट की है। वर्तमान में बीजिंग के सैन्य और राजनीतिक हलकों में गहरी चिंता का माहौल है। इसका मुख्य कारण यह है कि फिलीपींस को अपनी सबसे घातक मिसाइल सौंपने के बाद, भारत अब वियतनाम को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। चीनी सेना के आला अधिकारी इस विकासक्रम से आशंकित हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि एक बार ब्रह्मोस फायर हो गई, तो समुद्र में किसी भी लक्ष्य का बचना लगभग असंभव है। आखिर भारत ने फिलीपींस के बाद इतनी तत्परता से वियतनाम को ही क्यों चुना? क्या मलक्का डिलेमा के बीच भारत ने चीन के खिलाफ अपना असली चक्रव्यूह बुनना शुरू कर दिया है? आइए, इस वैश्विक खेल के हर पहलू का विश्लेषण करते हैं।
वर्षों तक चीन ने ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ यानी मोतियों की माला की रणनीति के जरिए भारत को समुद्री सीमाओं पर घेरने का प्रयास किया। उसका उद्देश्य हिंद महासागर में म्यांमार, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों में सैन्य ठिकाने बनाकर भारत की घेराबंदी करना था। लेकिन 2026 के इस दौर में समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। भारत ने अपनी पुरानी रक्षात्मक शैली को छोड़कर ‘ऑफेंसिव डिप्लोमेसी’ (आक्रामक कूटनीति) को अपना लिया है। नई दिल्ली का संदेश स्पष्ट है: यदि आप हमारे प्रभाव क्षेत्र में हस्तक्षेप करेंगे, तो हम आपके दरवाजे पर अपनी रणनीतिक शक्ति तैनात कर देंगे। चीन का ब्रह्मोस से डरना स्वाभाविक है, क्योंकि यह मिसाइल उसकी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक मार्गों को अवरुद्ध करने की क्षमता रखती है। यह खौफ उस मलक्का डिलेमा से जुड़ा है, जिसे चीन दुनिया से छिपाने की कोशिश करता रहा है।
चीन की सबसे बड़ी सामरिक कमजोरी को समझे बिना इस खेल को समझना मुश्किल है। कूटनीति की दुनिया में इसे ‘मलक्का डिलेमा’ कहा जाता है। दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थित मलक्का स्ट्रेट एक संकरा समुद्री मार्ग है, जो हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है। चीन के कच्चे तेल का 80% से अधिक हिस्सा और कुल वैश्विक व्यापार का दो-तिहाई इसी मार्ग से गुजरता है। सालाना 3.5 ट्रिलियन डॉलर का व्यापार इसी जलमार्ग पर निर्भर है। कुछ स्थानों पर यह रास्ता मात्र तीन किलोमीटर चौड़ा है। कल्पना कीजिए, यदि किसी संघर्ष की स्थिति में इस मार्ग को ब्लॉक कर दिया जाए, तो चीन की विशाल अर्थव्यवस्था हफ्तों में धराशायी हो सकती है। उसकी पूरी सप्लाई चेन और कारखाने ठप हो जाएंगे।
भारत ने इसी संवेदनशील मार्ग के मुहाने पर स्थित वियतनाम के साथ ब्रह्मोस मिसाइल सौदे को अंतिम रूप देना शुरू किया है। रणनीतिक दृष्टि से वियतनाम की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। वियतनाम के कैम रान और मुई-ने जैसे बेस सीधे दक्षिण चीन सागर के प्रवेश द्वार पर हैं। मलक्का स्ट्रेट से गुजरने वाले किसी भी चीनी व्यापारिक या सैन्य जहाज को वियतनाम के तटों के करीब से गुजरना पड़ता है। यदि इन तटों पर दुनिया की सबसे तेज मिसाइल ब्रह्मोस तैनात हो, तो क्या चीन अपनी मनमानी कर पाएगा? भारत अब हिंद महासागर की सीमाओं से बाहर निकलकर दक्षिण चीन सागर में ‘रिमोट प्रेशर स्ट्रैटेजी’ लागू कर रहा है, ताकि युद्ध की स्थिति में मोर्चा मुख्य भूमि से दूर रहे।
ब्रह्मोस की तकनीकी क्षमताएं इसे अद्वितीय बनाती हैं। यह मैक 2.8 से 3 की घातक गति से उड़ान भरती है, यानी लगभग 3600 किलोमीटर प्रति घंटा। इसकी सबसे बड़ी विशेषता ‘सी-स्किमिंग’ तकनीक है, जिसमें मिसाइल समुद्र की लहरों से सटकर चलती है। इससे दुश्मन के रडार इसे तब तक नहीं देख पाते जब तक कि हमला सफल न हो जाए। इसकी मारक क्षमता निर्यात मानकों के अनुसार 290 किलोमीटर तक है। चीन के पास भले ही दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना हो, लेकिन ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइल को बीच हवा में रोकना उसके सबसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए भी लगभग नामुमकिन है। यह सौदा केवल हथियारों की बिक्री नहीं है, बल्कि आसियान देशों का एक मजबूत सुरक्षा नेटवर्क तैयार करने की भारत की बड़ी योजना का हिस्सा है।
नई दिल्ली का दृष्टिकोण अब केवल द्विपक्षीय समझौतों तक सीमित नहीं है। फिलीपींस को ब्रह्मोस की सफल डिलीवरी के बाद अब वियतनाम की बारी है। दक्षिण चीन सागर में चीन अक्सर फिलीपींस और वियतनाम की समुद्री सीमाओं का उल्लंघन करता रहा है। वहां कृत्रिम द्वीप बनाकर मिलिट्री बेस स्थापित करना उसकी विस्तारवादी नीति का हिस्सा रहा है। लेकिन फिलीपींस में ब्रह्मोस की मौजूदगी ने चीनी नौसेना को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। यदि भारत, वियतनाम, फिलीपींस और जापान मिलकर एक रक्षा घेरा बना लेते हैं, तो मलक्का स्ट्रेट के आसपास चीन की अर्थव्यवस्था को घुटनों पर लाना मुमकिन होगा।
चीन की घेराबंदी का जवाब भारत ने ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ (हीरों का हार) रणनीति से दिया है। भारत ने ओमान के दुक्म, इंडोनेशिया के सबांग, सिंगापुर के चांगी बेस और अब वियतनाम के साथ रक्षा संबंधों के जरिए चीन को उसी के प्रभाव क्षेत्र में घेर लिया है। यह नई दिल्ली का वह कूटनीतिक पलटवार है जिसकी गूँज बीजिंग तक पहुँच रही है। भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह अपनी सीमाओं की रक्षा के साथ-साथ दूरस्थ क्षेत्रों में भी अपने हितों की सुरक्षा और दुश्मनों को प्रत्युत्तर देने में सक्षम है।
वियतनाम और चीन के बीच दक्षिण चीन सागर की ‘नाइन-डैश लाइन’ को लेकर पुराना विवाद है। अब तक वियतनाम के पास आधुनिक तटीय रक्षा प्रणालियों की कमी थी, जिससे चीनी युद्धपोत बेखौफ घूमते थे। लेकिन ब्रह्मोस के आते ही वियतनाम की तटीय सुरक्षा अभेद्य हो जाएगी। अब अगर चीन कोई आक्रामक कदम उठाता है, तो वियतनाम अपने तटों से ही उसके बड़े युद्धपोतों और एयरक्राफ्ट करियर को निशाना बना सकेगा। यह एक ‘रणनीतिक डिटरेंस’ है, जो दुश्मन के मन में मनोवैज्ञानिक खौफ पैदा करता है।
चीन की निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था मलक्का स्ट्रेट की सुरक्षा पर निर्भर है। यदि वियतनाम जैसे देशों का सैन्य प्रभुत्व बढ़ता है, तो चीन के व्यापारिक जहाजों के लिए जोखिम बढ़ जाएगा। शिपिंग कंपनियां ऐसे क्षेत्रों के लिए भारी बीमा प्रीमियम वसूलेंगी, जिससे चीनी उत्पाद महंगे हो जाएंगे और उसकी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होगी। भारत ने वियतनाम के जरिए चीन की इसी कमजोर कड़ी पर प्रहार किया है। आज के युग में युद्ध केवल सीमा पर नहीं, बल्कि आर्थिक दबाव और रणनीतिक चोकपॉइंट्स की घेराबंदी से जीते जाते हैं।
यद्यपि चीन इस रक्षा सौदे का आधिकारिक विरोध करने में हिचकिचाएगा क्योंकि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में उसकी बेचैनी साफ झलक रही है। इसके जवाब में चीन हिंद महासागर में अपनी जासूसी गतिविधियों को बढ़ा सकता है, परंतु भारत भी तैयार है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में भारत ने अपने सैन्य ढांचे को इतना सुदृढ़ कर लिया है कि मलक्का से निकलने वाला हर चीनी जहाज भारत की निगरानी में रहता है। भारत ने एक ओर अंडमान और दूसरी ओर वियतनाम-फिलीपींस के जरिए चीन पर ऐसा शिकंजा कसा है जिससे निकलना ड्रैगन के लिए अब आसान नहीं होगा।

