दक्षिण चीन सागर में ड्रैगन की आक्रामकता इस समय चरम पर है। चीन अपने कोस्ट गार्ड जहाजों के माध्यम से पड़ोसी छोटे देशों को धमका रहा है और जलक्षेत्र पर अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन भारत ने हिंद महासागर में इस दादागिरी का एक ठोस समाधान निकाल लिया है। बीजिंग की चिंता बढ़ाते हुए, भारत सरकार ने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के सुदूर दक्षिण में एक ऐसी रणनीतिक बिसात बिछाई है, जो चीन की सबसे कमजोर नस यानी ‘मलक्का जलडमरूमध्य’ को नियंत्रित करेगी। ग्रेट निकोबार में भारत की इस नई तैयारी ने जिनपिंग सरकार को गहरी चिंता में डाल दिया है।
साउथ चाइना सी में बढ़ता तनाव
लगातार ऐसी रिपोर्टें सामने आ रही हैं कि चीनी कोस्ट गार्ड के जहाज दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस और अन्य देशों के जहाजों को टक्कर मार रहे हैं। वे वाटर कैनन और मिलिट्री ग्रेड लेजर का उपयोग कर अंतरराष्ट्रीय नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। ड्रैगन की यह विस्तारवादी नीति वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा बनती जा रही है। कभी वह ताइवान को घेरता है, तो कभी छोटे देशों की नौकाओं का रास्ता रोकता है।
हालांकि, भारत ने अब यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी समुद्री सीमाओं के पास चीन के किसी भी दुस्साहस को बर्दाश्त नहीं करेगा। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत ने अपनी समुद्री रणनीति को नई धार दी है।
₹81,000 करोड़ की महा-योजना
भारत सरकार ने ग्रेट निकोबार के विकास के लिए ₹81,000 करोड़ के एक विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को स्वीकृति दी है। यह मेगा प्रोजेक्ट न केवल द्वीपों का कायाकल्प करेगा, बल्कि चीन के लिए एक अभेद्य चक्रव्यूह भी तैयार करेगा।
इस मास्टर प्लान के तहत, ₹13,000 करोड़ की लागत से ग्रेट निकोबार में एक आधुनिक ‘ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट’ बनाया जाएगा। यह एयरपोर्ट ‘ड्यूल यूज़’ (दोहरे उपयोग) वाला होगा, जिसका अर्थ है कि यहाँ से यात्री विमानों के साथ-साथ भारतीय वायुसेना और नौसेना के लड़ाकू विमान भी उड़ान भर सकेंगे। एक ही रनवे से नागरिक उड़ानें और सैन्य ऑपरेशंस संचालित किए जाएंगे।
इस हवाई अड्डे का निर्माण ग्रेट निकोबार के गैलाथिया बे के पास स्थित ‘चिंगेन’ नामक स्थान पर किया जाएगा। यह स्थान रणनीतिक रूप से इतना महत्वपूर्ण है कि यहाँ से समूचे समुद्री क्षेत्र पर चौबीसों घंटे निगरानी रखी जा सकती है।
क्यों बदला गया आईएनएस बाज का प्लान?
एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कैंपबेल बे स्थित नौसैनिक एयर स्टेशन ‘आईएनएस बाज’ (INS Baaz) के विस्तार की योजना को सरकार ने क्यों रद्द किया? इसके पीछे गहरे रणनीतिक और पर्यावरणीय कारण हैं।
आईएनएस बाज का रनवे वर्तमान में 4,500 फीट का है। पहले इसे बढ़ाकर 10,000 फीट करने का प्रस्ताव था ताकि सुखोई-30 एमकेआई और पी-8आई पोसाइडन जैसे भारी विमान यहाँ से ऑपरेट हो सकें।
लेकिन विस्तृत सर्वे के बाद रक्षा मंत्रालय ने पाया कि इस विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई और समुद्र के भीतर गहरी खुदाई (Dredging) करनी पड़ती। भौगोलिक चुनौतियों के कारण यह भविष्य में सैन्य गतिविधियों के लिए भी सीमित साबित हो सकता था।
इसके अतिरिक्त, इस विस्तार का प्रतिकूल प्रभाव स्थानीय आदिवासी समुदायों और दुर्लभ जैव-विविधता पर पड़ता। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि पारिस्थितिकी को होने वाला नुकसान अपरिवर्तनीय होगा।
यही कारण है कि भारत सरकार ने पर्यावरण और सैन्य जरूरतों के बीच संतुलन बनाते हुए चिंगेन में एक नया, बड़ा और अत्याधुनिक एयरपोर्ट बनाने का साहसिक फैसला लिया।
सरकार के इस कदम ने उन राजनीतिक विरोधों को भी शांत कर दिया है जो आईएनएस बाज के विस्तार में देरी पर सवाल उठा रहे थे। रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि नौसेना की जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया गया है, बल्कि उन्हें एक बेहतर और अधिक सक्षम विकल्प प्रदान किया गया है।
भारत की समुद्री शक्ति का नया केंद्र
ग्रेट निकोबार का यह प्रोजेक्ट केवल एक हवाई अड्डे तक सीमित नहीं है। इसमें चार मुख्य स्तंभ शामिल हैं जो भारत को ‘इंडो-पैसिफिक’ का नया पावरहाउस बनाएंगे।
पहला- चिंगेन का ड्यूल यूज़ एयरपोर्ट। दूसरा- एक ‘इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट’, जो वैश्विक व्यापार का केंद्र बनेगा। तीसरा- निर्बाध बिजली के लिए गैस और सोलर पावर प्लांट। और चौथा- एक पूरी तरह से आधुनिक टाउनशिप।
इन परियोजनाओं के पूरा होते ही ग्रेट निकोबार हिंद महासागर में भारत की शक्ति का मुख्य आधार बन जाएगा। यह ‘ड्यूल यूज़’ मॉडल सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक विकास को भी नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।
चीन की सबसे कमजोर नस: मलक्का स्ट्रेट
चीन की सबसे बड़ी सामरिक कमजोरी ‘मलक्का स्ट्रेट’ है, जो एक अत्यंत संकरा समुद्री रास्ता है। चीन का अधिकांश व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति इसी मार्ग से होकर गुजरती है।
चीन अपनी तेल जरूरतों का 80% और एलएनजी का 70% इसी रास्ते से आयात करता है। वैश्विक व्यापार का एक बड़ा हिस्सा मलक्का के बिना ठप हो सकता है।
ग्रेट निकोबार में बन रहा भारत का नया आधार बिल्कुल इसी मलक्का स्ट्रेट के मुहाने पर है। यदि चीन दक्षिण चीन सागर में हिमाकत करता है, तो भारत कुछ ही घंटों में मलक्का के रास्ते उसकी ‘सांस की नली’ को चोक कर सकता है।
यह स्थान भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण मिलिट्री और लॉजिस्टिक हब बनने जा रहा है, जिससे चीन की घेराबंदी करना आसान हो जाएगा।
हिंद महासागर का नया रक्षक
चिंगेन में 10,000 फीट का रनवे तैयार होने के बाद, भारतीय नौसेना वहां अपने पी-8आई पोसाइडन निगरानी विमान और लड़ाकू बेड़े को तैनात करेगी।
इन आधुनिक उपकरणों की मदद से समुद्र की गहराइयों में छिपी चीनी परमाणु पनडुब्बियों की हर गतिविधि पर रीयल-टाइम नजर रखी जा सकेगी। दुश्मन के लिए अब छिपना मुमकिन नहीं होगा।
युद्ध जैसी स्थिति में भारत यहीं से मलक्का स्ट्रेट की नाकेबंदी कर सकता है, जिससे चीन की नौसेना हिंद महासागर में प्रवेश नहीं कर पाएगी। इसी सामरिक विवशता को ‘मलक्का डिलेमा’ कहा जाता है।
भारत का ₹81,000 करोड़ का यह निवेश चीन के इस डर को हकीकत में बदल देगा। यह बिल्कुल वैसा ही रणनीतिक दबाव है जैसा कभी होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के दौरान देखा गया था।
इसके अलावा, यहाँ बन रहा नया बंदरगाह सिंगापुर और कोलंबो जैसे बंदरगाहों के विकल्प के रूप में उभरेगा, जिससे भारत को बड़ा आर्थिक लाभ होगा और चीन की आर्थिक निर्भरता पर चोट लगेगी।
इंडो-पैसिफिक में भारत का दबदबा
यह पूरी तैयारी ड्रैगन को एक स्पष्ट संदेश है कि हिंद महासागर में उसकी घुसपैठ अब और सफल नहीं होगी। भारत ने क्वाड भागीदारों (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) के साथ मिलकर अपनी स्थिति बेहद मजबूत कर ली है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की समुद्री सुरक्षा नीति में एक ‘गेम चेंजर’ साबित होगा। भविष्य में जब भारत अपनी सर्विलांस और सैन्य तैनाती बढ़ाएगा, तो चीन को अपनी हर साजिश से पहले दस बार सोचना होगा।
यह ₹13,000 करोड़ का नया एयरपोर्ट भारत की रक्षा का एक ऐसा अभेद्य किला होगा जिसे कोई भी शत्रु चुनौती नहीं दे पाएगा। भारत ने चीन को उसकी सीमाएं समझाने का पूरा पुख्ता इंतजाम कर लिया है।
ग्रेट निकोबार में भारत की इस जबरदस्त तैयारी के बारे में आपका क्या सोचना है? क्या यह प्रोजेक्ट वास्तव में चीन की दादागिरी को खत्म कर पाएगा? कमेंट में अपनी राय जरूर दें।

