भारत ने जैसे ही सिंधु नदी के अपने हिस्से के पानी का पूर्ण उपयोग करने की दिशा में कदम बढ़ाया है, पाकिस्तान का पूरा प्रशासनिक तंत्र चरमराने लगा है। रावलपिंडी से लेकर इस्लामाबाद तक ऐसा डर व्याप्त है कि पाकिस्तानी सेना और वहां के शासक अब सार्वजनिक रूप से अपनी घबराहट व्यक्त कर रहे हैं। एक ओर भारत के रणनीतिक जल प्रबंधन ने पाकिस्तान की नींद उड़ा दी है, तो दूसरी ओर पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में एक ऐसा जनांदोलन खड़ा हो गया है जिसने पाकिस्तानी जनरलों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। स्थिति इस कदर गंभीर हो चुकी है कि पीओके की जनता ने पाकिस्तानी सेना को वहां से हटने के लिए 24 घंटे का अंतिम अल्टीमेटम दे दिया है। क्या पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में अब आजादी का नया सवेरा होने वाला है? क्या भारत का यह ठोस कदम और पीओके की बगावत मिलकर पाकिस्तान के भूगोल को बदल देंगे? आज हम इसी भू-राजनीतिक उथल-पुथल की पूरी कहानी का विश्लेषण करेंगे।
दशकों तक भारत ने उदारता दिखाते हुए अपने हिस्से का पानी भी पाकिस्तान की ओर जाने दिया, लेकिन अब वह युग समाप्त हो चुका है। ‘नया भारत’ अब अपने राष्ट्रीय हितों के साथ कोई समझौता नहीं करता। पाकिस्तान के वे नेता, जो वैश्विक मंचों पर अपनी बेइज्जती के लिए जाने जाते हैं, अब पानी के लिए तरस रहे हैं। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक भड़काऊ बयान में कहा है कि जल सुरक्षा उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न अंग है। उन्होंने धमकी दी है कि यदि भारत सिंधु नदी के प्रवाह को रोकता है, तो पाकिस्तान इसे सीधा हमला मानेगा और सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा।
ये वही ख्वाजा आसिफ हैं जो अक्सर टीवी पर बड़ी बातें करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत का सामना करने में असमर्थ रहते हैं। आज वे अपनी जनता को यह झूठा भरोसा दिला रहे हैं कि वे भारत जैसी महाशक्ति का मुकाबला कर सकते हैं। वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान के पास न तो युद्ध की क्षमता है और न ही भारत के जल अधिकारों पर सवाल उठाने का कोई कानूनी आधार। भारत ने सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) पर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है—जब तक सीमा पार से आतंकवाद पूरी तरह समाप्त नहीं होता, तब तक इस मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं होगी। नई दिल्ली का संदेश साफ है कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।
इस विवाद की जड़ में 1960 की सिंधु जल संधि है। इस समझौते के तहत छह नदियों का बंटवारा किया गया था। रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों पर भारत का पूर्ण अधिकार है, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब का पानी पाकिस्तान को उपयोग के लिए दिया गया। हालांकि, संधि में यह स्पष्ट है कि भारत कृषि, सिंचाई और पनबिजली परियोजनाओं के लिए इन पश्चिमी नदियों का भी सीमित उपयोग कर सकता है। भारत अब अपने इसी कानूनी अधिकार को पूरी क्षमता के साथ लागू कर रहा है।
भारत ने जम्मू-कश्मीर में बड़े स्तर पर हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स शुरू किए हैं। इन नदियों के पानी को चतुराई से डाइवर्ट और मैनेज किया जा रहा है ताकि जम्मू-कश्मीर के किसानों और नागरिकों को पर्याप्त पानी मिल सके। स्थानीय लोगों में इस विकास को लेकर उत्साह है, लेकिन पाकिस्तान में इसे लेकर हड़कंप मचा है। पाकिस्तान की कृषि और बिजली व्यवस्था इन्हीं नदियों पर निर्भर है। पानी पर नियंत्रण की सुगबुगाहट मात्र से पाकिस्तानी शासक घबराकर इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन पहुंच गए हैं।
लेकिन भारत ने इस बार आक्रामक रुख अपनाते हुए पाकिस्तान को उसकी असलियत दिखा दी है। भारत ने उस अंतरराष्ट्रीय अदालत के अधिकार क्षेत्र को ही खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि वह किसी भी अवैध न्यायालय के आदेश को मानने के लिए बाध्य नहीं है। पाकिस्तान की पुरानी आदत रही है कि वह हर मुद्दे पर वैश्विक मंचों पर ‘विक्टिम कार्ड’ खेलता है, लेकिन आज के मजबूत भारत ने पाकिस्तान के हर एजेंडे को विफल कर दिया है।
पाकिस्तानी रक्षा मंत्री की खोखली धमकियों का भारतीय विदेश मंत्रालय ने करारा जवाब दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि ऐसे बयान केवल पाकिस्तान की अपनी आंतरिक विफलताओं को छिपाने का एक सस्ता हथकंडा हैं। पाकिस्तान की सरकार और उसकी फौज अपनी जनता पर जो अत्याचार कर रही है, उससे दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए वह जानबूझकर भारत का नाम ले रहे हैं। भारत ने उनके सभी झूठे दावों को सिरे से खारिज कर दिया है।
इसके विपरीत, भारत ने पूरी दुनिया का ध्यान पीओके की उस अशांति की ओर खींचा है जिसे पाकिस्तान छिपाने की कोशिश कर रहा था। भारत ने स्पष्ट कहा है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हो रहे प्रदर्शन पाकिस्तान की दशकों पुरानी तानाशाही और शोषण का नतीजा हैं। वहां के नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचला गया है और प्रशासन ने क्रूरता की सभी सीमाएं पार कर दी हैं। जब पीओके की जनता अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरी, तो पाकिस्तानी हुक्मरानों ने उन पर पुलिस और रेंजर्स के जरिए लाठियां चलवायीं।
पीओके के हालात अब पाकिस्तानी सेना के नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं। वहां राशन और दवाओं जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ठप है। पूरे क्षेत्र में इंटरनेट बंद कर दिया गया है ताकि पुलिसिया बर्बरता की तस्वीरें बाहर न आ सकें। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आगाह किया है कि पाकिस्तान को मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। यह केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि पाकिस्तान के लिए एक बड़ी चेतावनी है।
पीओके के जमीनी हालात ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख से लेकर प्रधानमंत्री तक की नींद उड़ा दी है। रावलकोट से मुजफ्फराबाद तक लाखों लोग सड़कों पर हैं और सीधे तौर पर पाकिस्तानी व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। इस जनआंदोलन का नेतृत्व ‘जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (JAAC) कर रही है। जेएएसी ने पाकिस्तानी हुक्मरानों को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो यह आंदोलन और भी उग्र रूप धारण करेगा जिसे संभालना सेना के बस में नहीं होगा।
रावलकोट में एक विशाल जनसभा के दौरान जेएएसी के नेता सरदार अमान कश्मीरी ने पाकिस्तानी रेंजर्स को ललकारते हुए कहा कि प्रदर्शनकारी अब तक शांत हैं, लेकिन उन्हें मजबूर न किया जाए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का हवाला देते हुए पीओके में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की भारी तैनाती पर सवाल उठाए और उनकी तत्काल वापसी की मांग की है।
पाकिस्तान के लिए यह स्थिति किसी दुःस्वप्न जैसी है कि जिस क्षेत्र पर उसने कब्जा किया था, वहां के लोग अब उसकी सेना को बाहर जाने को कह रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का एक ही नारा है—’यह वतन हमारा है’। यह नारा पाकिस्तान की ‘डीप स्टेट’ को सीधी चुनौती है। पीओके की जनता अब पाकिस्तानी सेना के डर से झुकने वाली नहीं है।
पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों की बर्बरता ने आग में घी डालने का काम किया है। आरोप है कि पिछले कुछ दिनों में 1500 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है। जेएएसी नेता शौकत नवाज मीर के घर पर छापेमारी और तोड़फोड़ के बाद आंदोलन और भड़क गया है। उन्होंने मुजफ्फराबाद में पूर्ण बंद का आह्वान किया है और अब महिलाएं भी इस विरोध में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं।
पीओके का यह असंतोष रातों-रात पैदा नहीं हुआ है। यह दशकों के शोषण का परिणाम है। जेएएसी महंगाई, बिजली की कटौती और पानी की कमी के खिलाफ लड़ रही है। विडंबना यह है कि पीओके की नदियों से बनने वाली बिजली पाकिस्तान के शहरों को रोशन करती है, लेकिन वहां के स्थानीय लोग अंधेरे में रहने को मजबूर हैं। उनके संसाधनों का उपयोग पाकिस्तानी जनरल अपनी तिजोरियां भरने के लिए कर रहे हैं।
पाकिस्तानी शासक पीओके की जनसांख्यिकी (Demography) को बदलने की साजिश रच रहे हैं, जिसके तहत विधानसभा में शरणार्थियों के नाम पर सीटें आरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है। जेएएसी ने इस साजिश को पहचान लिया है और इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। हजारों लोग रावलकोट के आसपास तैनात हैं और किसी भी कार्रवाई का जवाब देने के लिए तैयार हैं।
पाकिस्तान इस समय एक ऐसी दुविधा में फंसा है जिससे निकलने का कोई रास्ता नहीं है। एक ओर भारत की जल नीति से पाकिस्तान के कृषि क्षेत्रों में सूखे का खतरा है, क्योंकि भारत अपने कानूनी अधिकार के तहत पानी के प्रवाह को नियंत्रित कर रहा है। दूसरी ओर, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है और वह कर्ज के सहारे जी रहा है।
इन विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए पाकिस्तान जल विवाद को तूल दे रहा है, लेकिन यह प्रोपेगेंडा अब काम नहीं कर रहा। पाकिस्तान जो खुद को कश्मीर का हमदर्द बताता था, आज उसी के कब्जे वाले कश्मीर की जनता पाकिस्तानी सेना को अपना दुश्मन मान रही है। यदि पीओके में स्थिति अनियंत्रित होती है, तो पाकिस्तान के लिए यह रणनीतिक आत्महत्या जैसा होगा।
भारत बहुत ही शांत और नपे-तुले तरीके से अपने कदम उठा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को बेनकाब करने और जल संधियों पर कड़ा रुख अपनाने से इस्लामाबाद बैकफुट पर है। पाकिस्तान को पता है कि यदि उसने कोई दुस्साहस किया, तो भारतीय सेना उसे करारा जवाब देगी।
पीओके का यह आंदोलन अब रुकने वाला नहीं है। यदि 24 घंटे के अल्टीमेटम को नजरअंदाज किया गया, तो वहां भड़कने वाली अशांति को संभालना पाकिस्तान के लिए असंभव होगा। यह पाकिस्तान के पाखंड का अंत है। जल संकट का रोना रोने वाला पाकिस्तान अंदर से खोखला हो चुका है। अब दुनिया की नजरें पाकिस्तान की अगली चाल पर हैं, लेकिन समय की टिक-टिक पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी बजा रही है।

