अमेरिका, रूस और चीन जैसे ताकतवर देशों ने दशकों से अंतरिक्ष पर अपना दबदबा बनाए रखा था। इन देशों का मानना था कि रॉकेट विज्ञान केवल उन्हीं के वश की बात है। दुनिया की सरकारी एजेंसियों और एलन मस्क जैसे अरबपतियों के सामने किसी भारतीय प्राइवेट कंपनी का टिकना तो दूर, वहां तक पहुँचने की कल्पना करना भी मज़ाक लगता था। लेकिन विदेशी शक्तियों के इस अहंकार को भारत के एक ऐसे युवा ने चुनौती दी है, जिसे स्कूल में गणित के पेपर में 100 में से केवल 51 नंबर मिले थे। जी हां, गणित में जैसे-तैसे पास होने वाला वह छात्र आज एक ऐसी एयरोस्पेस कंपनी का नेतृत्व कर रहा है, जिसने वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में हलचल पैदा कर दी है। आखिर गणित में कम अंक पाने वाले छात्र ने भारत की सबसे बड़ी निजी रॉकेट कंपनी कैसे खड़ी की? इसरो की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर इस ‘भारतीय एलन मस्क’ ने ऐसा क्या जोखिम लिया जिसने ग्लोबल स्पेस मार्केट का गणित ही बदल दिया? क्या स्काईरूट एयरोस्पेस भविष्य में स्पेसएक्स का सबसे सस्ता विकल्प बनेगी? आइए जानते हैं इसकी पूरी गाथा।
हमारे समाज की यह पुरानी सोच रही है कि विज्ञान और इंजीनियरिंग में सफलता के लिए गणित में अव्वल होना जरूरी है। बचपन से ही बच्चों को डराया जाता है कि यदि वे कठिन सूत्र हल नहीं कर सकते, तो वे जीवन में पिछड़ जाएंगे। लेकिन पवन कुमार चंदाना ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया। उनकी कहानी गवाह है कि किताबी ज्ञान से बड़ा इंसान का जुनून और जिद होती है। जब उनकी मार्कशीट पर 51 अंक दिखे, तो उनके करीबियों ने मान लिया होगा कि उनका करियर खत्म है। लेकिन वह कागज का टुकड़ा पवन के भीतर की आग को नहीं माप सका। उनकी आँखों में गणित के फार्मूले नहीं, बल्कि अंतरिक्ष को फतह करने वाले स्पेसक्राफ्ट के डिजाइन तैरते थे। अपनी कड़ी मेहनत के बल पर उन्होंने आईआईटी खड़गपुर में प्रवेश पाकर सभी आलोचकों का मुँह बंद कर दिया।
आईआईटी खड़गपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डबल डिग्री हासिल करना कोई साधारण बात नहीं है। यहीं पवन ने अपने सपनों को हकीकत में बदलने का आधार तैयार किया। हॉस्टल के कमरे में उन्होंने दुनिया के बड़े रॉकेट इंजनों का गहराई से अध्ययन किया। उनकी प्रतिभा का फल उन्हें 2012 में मिला जब वे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में वैज्ञानिक बने। इसरो में नौकरी पाना हर भारतीय इंजीनियर का सपना होता है। वहां उन्हें सम्मान, अच्छी सैलरी और सुरक्षा सब कुछ मिल रहा था, लेकिन पवन के लिए यह सिर्फ एक पड़ाव था, मंजिल नहीं।
इसरो के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में पवन ने जीएसएलवी मार्क-3 जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर काम किया, जिसे हम गर्व से ‘बाहुबली’ कहते हैं। उन्होंने एसएसएलवी (SSLV) के डिजाइन पर भी दिन-रात मेहनत की। वह देख रहे थे कि कैसे भारी-भरकम रॉकेट गुरुत्वाकर्षण को मात देते हैं। लेकिन इसी दौरान दुनिया के दूसरे हिस्से में एक क्रांति हो रही थी, जो अंतरिक्ष विज्ञान का भविष्य बदलने वाली थी।
अमेरिका में एलन मस्क की स्पेसएक्स ने यह साबित कर दिया था कि निजी कंपनियां सरकारी एजेंसियों से बेहतर और सस्ते में अंतरिक्ष मिशन पूरे कर सकती हैं। मस्क के दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेट्स ने लागत को आधा कर दिया था। पवन को समझ आ गया था कि इसरो का मुख्य ध्यान राष्ट्रीय मिशनों पर है, कमर्शियल बिजनेस पर नहीं। यदि भारत को वैश्विक स्पेस मार्केट पर कब्जा करना है, तो उसे निजी कंपनियों को आगे लाना होगा। यही वह विचार था जिसने उन्हें अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
2018 में पवन चंदाना और उनके साथी नागा भरत डाका ने इसरो से इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया। यह एक जोखिम भरा फैसला था क्योंकि उस समय भारत में निजी स्पेस सेक्टर का कोई वजूद नहीं था। सरकारी नियम बहुत कड़े थे और किसी को नहीं पता था कि एक प्राइवेट रॉकेट बनाने के लिए पैसा और परमिशन कहाँ से मिलेगी।
जब ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ की शुरुआत हुई, तो सबसे बड़ी चुनौती निवेशकों को राजी करना था। भारतीय निवेशक तब केवल फूड और कैब ऐप्स में रुचि रखते थे। जब पवन रॉकेट के ब्लूप्रिंट लेकर जाते, तो लोग उन्हें पागल समझकर मना कर देते थे। उन्हें बार-बार कहा गया कि हार्डवेयर में बहुत रिस्क है और पैसा डूब जाएगा। लेकिन वे दोनों हार मानने वालों में से नहीं थे।
अंततः अपनी तकनीकी सूझबूझ से उन्होंने कुछ दूरदर्शी निवेशकों का भरोसा जीता। उन्होंने तय किया कि वे पारंपरिक तरीके से नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीकों से रॉकेट बनाएंगे। यहीं से स्काईरूट में 3D प्रिंटिंग और कार्बन कंपोजिट जैसी आधुनिक तकनीकों का प्रवेश हुआ।
पुराने तरीकों से रॉकेट बनाने में महीनों लगते हैं, लेकिन स्काईरूट ने 3D प्रिंटिंग से जटिल पुर्जे कुछ ही घंटों में तैयार करना शुरू किया। उनका ‘रमन इंजन’ इसका बेहतरीन उदाहरण है। इससे न केवल समय बचा, बल्कि इंजन का वजन और लागत भी काफी कम हो गई।
रॉकेट के ढांचे को मजबूत और हल्का बनाने के लिए उन्होंने कार्बन कंपोजिट का इस्तेमाल किया, जो लड़ाकू विमानों में इस्तेमाल होता है। यह स्टील से हल्का और कई गुना अधिक मजबूत होता है। वजन कम होने का मतलब था कि रॉकेट अधिक सैटेलाइट्स ले जा सकता था। इन तकनीकों ने स्काईरूट को तकनीकी तौर पर स्पेसएक्स के समकक्ष खड़ा कर दिया।
18 नवंबर 2022 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से देश का पहला निजी रॉकेट ‘विक्रम-एस’ लॉन्च किया गया। इस मिशन का नाम ‘प्रारंभ’ रखा गया था, जो डॉ. विक्रम साराभाई को एक श्रद्धांजलि थी। पूरी दुनिया की नजरें इस लॉन्च पर थीं कि क्या ये दो युवा इतिहास रच पाएंगे।
जैसे ही काउंटडाउन खत्म हुआ, विक्रम-एस दहाड़ते हुए आसमान की ओर बढ़ा। यह 140 करोड़ भारतीयों के सपनों की उड़ान थी। रॉकेट ने आवाज की गति से 5 गुना तेज रफ्तार पकड़ी और 90 किलोमीटर की ऊँचाई तक पहुँचकर मिशन को 100% सफल बनाया। इस सफलता की गूँज वॉशिंगटन और बीजिंग तक सुनाई दी।
इस लॉन्च के बाद स्काईरूट की किस्मत बदल गई। जो निवेशक कल तक मना कर रहे थे, वे अब निवेश के लिए कतार में थे। कंपनी ने सीरीज-बी फंडिंग में 400 करोड़ रुपये से अधिक जुटाए, जो किसी भी भारतीय स्पेस स्टार्टअप के लिए एक रिकॉर्ड था।
इसके बाद हैदराबाद में देश की सबसे बड़ी निजी रॉकेट फैक्ट्री ‘MAX’ का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। आज यहाँ 1,000 से अधिक प्रतिभाशाली इंजीनियर काम कर रहे हैं, जो कल तक विदेश जाने का सपना देखते थे।
अब कंपनी का लक्ष्य ‘विक्रम-1’ है, जो एक पूर्ण ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल होगा। यह रॉकेट उपग्रहों को अंतरिक्ष की स्थाई कक्षा में स्थापित करने में सक्षम होगा। इसमें ‘मल्टी-ऑर्बिट इंसर्शन’ तकनीक होगी, जो किसी बस की तरह अलग-अलग सैटेलाइट्स को उनके निर्धारित पते पर छोड़ती जाएगी।
स्काईरूट का लक्ष्य अरबों डॉलर के छोटे सैटेलाइट मार्केट पर कब्जा करना है। जहाँ मस्क की स्पेसएक्स के लिए ग्राहकों को लंबा इंतजार करना पड़ता है, वहीं स्काईरूट ‘ऑन-डिमांड’ और सस्ता लॉन्च प्रदान करेगा।
यह कंपनी स्पेस सेक्टर की ‘उबर’ बनना चाहती है। ग्राहकों को अब सालों इंतजार करने की जरूरत नहीं होगी। स्काईरूट उन्हें कम खर्चे में और उनके तय समय पर सीधे अंतरिक्ष में भेजने का विकल्प दे रही है।
स्काईरूट के ‘कलाम’ और ‘धवन’ सीरीज के इंजन पूरी तरह स्वदेशी हैं। धवन-1 इंजन एलएनजी (LNG) और लिक्विड ऑक्सीजन पर चलता है, जो पर्यावरण के अनुकूल है। यह तकनीक भारत को वैश्विक स्तर पर एक जिम्मेदार और आधुनिक शक्ति के रूप में पेश करती है।
सरकार की ‘इन-स्पेस’ संस्था के माध्यम से अब निजी कंपनियों को इसरो की लैब्स का एक्सेस मिल रहा है। यह सरकारी विजन और निजी जोश का अनोखा संगम है, जिसने फ्रांस और जापान जैसे देशों को भी हैरान कर दिया है।
यह लड़ाई सिर्फ व्यापार की नहीं, बल्कि कूटनीति की भी है। चीन जो विकासशील देशों को अपने जाल में फँसा रहा था, अब भारत के सस्ते और सुरक्षित विकल्पों के कारण पीछे छूट रहा है। दुनिया अब चीन के बजाय लोकतांत्रिक भारत के भरोसेमंद रॉकेट्स को चुन रही है।
जो देश कभी साइकिल पर सैटेलाइट ले जाता था, आज वह दुनिया को अंतरिक्ष की सैर करा रहा है। पवन कुमार चंदाना की कहानी सिखाती है कि अगर आपके भीतर आग है, तो कोई भी मार्कशीट आपके सपनों की उड़ान नहीं रोक सकती। भारत के इन हीरोज को सलाम।

