कल्पना कीजिए, क्या होगा यदि रातों-रात 1.4 अरब की आबादी वाले देश के आठ राज्य अपनी मुख्य भूमि से पूरी तरह कट जाएं? एक विशाल राष्ट्र की सबसे बड़ी कमजोरी मात्र 22 किलोमीटर चौड़ी जमीन की पट्टी कैसे हो सकती है? यह संकरा रास्ता, जिसे अगर दुश्मन अवरुद्ध कर दे, तो भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा शेष देश से अलग हो जाएगा। दशकों से चीन इसी ‘चिकन नेक’ यानी सिलीगुड़ी कॉरिडोर को बंधक बनाने के मंसूबे पाल रहा है। हाल ही में बांग्लादेश के तीस्ता प्रोजेक्ट और मोंगला पोर्ट के जरिए चीन इस संवेदनशील इलाके के बेहद करीब पहुंच गया है। ड्रैगन का इरादा स्पष्ट है—भारत की गर्दन पर अपनी पकड़ बनाना। लेकिन भारत अब मूकदर्शक नहीं है। भारत ने जमीन के भीतर एक ऐसी सामरिक घेराबंदी शुरू की है, जिसने बीजिंग से ढाका तक हड़कंप मचा दिया है। आज हम भारत के उस ‘मास्टरस्ट्रोक’ का विश्लेषण करेंगे जिसने चीन की हर चाल को नाकाम कर दिया है।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर की भौगोलिक जटिलता
यह संघर्ष सिलीगुड़ी कॉरिडोर की भौगोलिक विवशता से उपजा है। पश्चिम बंगाल में स्थित यह 22 से 25 किलोमीटर चौड़ा गलियारा भारत को पूर्वोत्तर के सात राज्यों से जोड़ता है। इसके एक ओर नेपाल, दूसरी ओर बांग्लादेश, उत्तर में भूटान और ठीक ऊपर चीन की चुम्बी घाटी है। सैन्य दृष्टि से यह दुनिया के सबसे खतरनाक ‘चोकप्वाइंट्स’ में से एक है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) का मानना था कि युद्ध की स्थिति में वे डोकलाम और चुम्बी घाटी के रास्ते हमला कर भारत की रसद और सैन्य आपूर्ति को हमेशा के लिए काट सकते हैं। उनका उद्देश्य भारत को मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक रूप से घुटनों पर लाना था।
ड्रैगन का ‘मलक्का डिलेमा’ और काउंटर रणनीति
इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता का मुख्य कारण उसका अपना डर है, जिसे ‘मलक्का डिलेमा’ कहा जाता है। चीन का 80% तेल व्यापार मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरता है, जिसे भारतीय नौसेना अंडमान-निकोबार से आसानी से ब्लॉक कर सकती है। इसी डर के कारण चीन भारत के ‘चिकन नेक’ को अपना निशाना बना रहा है ताकि वह काउंटर प्रेशर बना सके। जैसे भारत समुद्र में चीन की गर्दन पकड़ सकता है, वैसे ही चीन जमीन पर भारत के कॉरिडोर को दबाना चाहता है।
जब डोकलाम में भारतीय सेना ने चीन को पीछे हटने पर मजबूर किया, तो उसने सीधे टकराव के बजाय ‘प्रॉक्सी गेम’ शुरू किया। इसके लिए उसने बांग्लादेश को मोहरा बनाया। निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर चीन ने बांग्लादेश के तीस्ता प्रोजेक्ट और मोंगला पोर्ट में घुसपैठ की, जो सीधे तौर पर भारत की सुरक्षा के लिए खतरा है।
मोंगला पोर्ट और तीस्ता प्रोजेक्ट के पीछे का षड्यंत्र
खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, चीन ने मोंगला पोर्ट के पास एक बड़ा आर्थिक क्षेत्र प्राप्त कर लिया है। यहाँ चीन का इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर (ESM) सिस्टम तैनात करने का अर्थ है कि वह बंगाल की खाड़ी में भारतीय नौसेना की हर हलचल और सुकना स्थित 33 कॉर्प्स के संचार को इंटरसेप्ट कर सकेगा। इसके माध्यम से चीन बिना युद्ध किए हमारे रडार सिग्नल और सैन्य डेटा को रियल-टाइम में ट्रैक कर सकता है।
वहीं तीस्ता नदी प्रोजेक्ट के बहाने चीन ने अपने सैन्य विशेषज्ञों को नागरिक इंजीनियरों के रूप में सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास तैनात करने की योजना बनाई। यह भारत की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती थी, जिसका जवाब देना अनिवार्य हो गया था।
पाताल में भारत का अभेद्य रक्षा कवच
जब दुनिया को लगा कि भारत घिर गया है, तब दिल्ली ने अपनी रक्षात्मक नीति बदलकर ‘ऑफेंसिव डिफेंस’ अपनाया। भारत ने जमीन के ऊपर के बजाय जमीन के नीचे अपनी ताकत बढ़ाने का फैसला किया। सिलीगुड़ी कॉरिडोर में एक गुप्त अंडरग्राउंड रेलवे टनल की योजना पर काम शुरू हो चुका है। उत्तर दिनाजपुर से रांगापानी तक 36 किलोमीटर लंबी यह सुरंग अत्याधुनिक मशीनों से बनाई जा रही है।
यह सुरंग कोई साधारण ढांचा नहीं है। इसकी दीवारें इतनी अभेद्य होंगी कि इन पर मिसाइल हमलों का भी असर नहीं होगा। इसके जरिए भारतीय सेना बिना दुश्मन की नजर में आए टैंक, मिसाइल और सैनिकों को सीमा तक पहुंचा सकेगी। यदि चीन ऊपर से रास्ता बंद भी कर दे, तो पाताल से हमारी सप्लाई लाइन बेरोकटोक जारी रहेगी।
इसके अलावा, असम में ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे 18 हजार करोड़ की लागत से 33.7 किलोमीटर लंबी ‘ट्विन-ट्यूब’ टनल बनाई जा रही है। इसका 15 किलोमीटर से ज्यादा हिस्सा नदी के तल के नीचे होगा। यह गोहपुर को नुमालीगढ़ से जोड़ेगी, जिससे तेजपुर एयरबेस से अरुणाचल बॉर्डर तक सैन्य आवाजाही पूरी तरह सुरक्षित हो जाएगी। यह टनल परमाणु हमले को भी झेलने में सक्षम होगी।
सिक्किम को जोड़ने वाली सेवोक-रंगपो रेलवे लाइन का 86% हिस्सा भी सुरंगों के अंदर होगा, और तीस्ता बाजार स्टेशन पूरी तरह जमीन के नीचे होगा। यह ढांचा सुनिश्चित करता है कि चीन के किसी भी दबाव के बावजूद भारतीय सेना प्रभावी बनी रहे।
भूगोल से भूगोल को काटने का मास्टरप्लान
भारत का दूसरा बड़ा कदम अपनी निर्भरता को बांटना है। हम अब सिर्फ सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भर नहीं हैं। भारत ने बांग्लादेश के साथ मिलकर ‘ट्रांस-नेशनल ट्रांजिट’ पॉलिसी के तहत 8 नए रेल रूट विकसित करने का निर्णय लिया है। अब कोलकाता से त्रिपुरा या असम जाने के लिए सेना को लंबा चक्कर लगाने की जरूरत नहीं होगी; वे सीधे बांग्लादेश के रास्ते कम समय में पहुंच सकेंगे।
वैकल्पिक मार्ग और आक्रामक कूटनीति
किसी भी आकस्मिक स्थिति के लिए भारत ने म्यांमार के रास्ते ‘कलादान मल्टी-मोडल प्रोजेक्ट’ को बैकअप के रूप में तैयार रखा है। साथ ही, पूर्वोत्तर के दुर्गम इलाकों में ‘उड़ान योजना’ के तहत एडवांस लैंडिंग ग्राउंड्स (ALGs) बनाए गए हैं, जहाँ सी-17 ग्लोबमास्टर और चिनूक हेलीकॉप्टर्स किसी भी समय भारी तोपें और रसद पहुंचा सकते हैं।
भारत की 17वीं माउंटेन स्ट्राइक कॉर्प्स अब केवल बचाव के लिए नहीं, बल्कि दुश्मन के इलाके में घुसकर हमला करने के लिए प्रशिक्षित है। पूर्वोत्तर की पहाड़ियों में ब्रह्मोस मिसाइलों और पिनाका रॉकेट सिस्टम की तैनाती ने चीन के रणनीतिकारों को फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है।
भारत ने अपनी पुरानी रक्षात्मक मानसिकता को त्यागकर एक ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया है जो न केवल सुरक्षित है बल्कि भविष्य की वैश्विक सप्लाई चेन का केंद्र भी है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर भारत का यह अंडरग्राउंड प्रहार चीन के विस्तारवादी सपनों पर एक बड़ा विराम है।

