‘भले फांसी दे दो, पर वतन लौटूंगी’—शेख हसीना के इस विस्फोटक बयान ने ढाका से वाशिंगटन तक मचाया हड़कंप!

“मुझे फांसी के फंदे पर लटका दो, लेकिन मैं अपने देश लौटकर रहूंगी।” ढाका की सरजमीं पर कदम रखने से पहले बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का यह ऐलान महज सियासी बयानबाजी नहीं है। यह एक ऐसा टाइम बम है, जिसकी टिक-टिक ने ढाका से लेकर वाशिंगटन और बीजिंग तक के सत्ता गलियारों की नींद उड़ा दी है। क्या सत्तर साल की उम्र पार कर चुकी एक नेता जानबूझकर आग के दरिया में उतरने की तैयारी कर रही हैं? या फिर इस वतन वापसी के पीछे भारत के रणनीतिकारों और एनएसए अजीत डोभाल का कोई ऐसा सीक्रेट मास्टर प्लान है, जिसने ढाका के नए हुक्मरानों के पसीने छुड़ा दिए हैं?

जुलाई और अगस्त 2024 के हिंसक विद्रोह के बाद भारत में शरण लेने वाली शेख हसीना ने अब स्पष्ट कर दिया है कि वे चुप बैठने वाली नहीं हैं। जापानी न्यूज एजेंसी ‘क्योडो’ को दिए अपने इंटरव्यू में उन्होंने सीधे तौर पर हुंकार भरी है। उन्हें बखूबी इल्म है कि बांग्लादेश की जमीन पर कदम रखते ही उन्हें जेल भेजा जा सकता है या ट्रिब्यूनल के नाम पर उन पर मुकदमे चलाए जा सकते हैं, लेकिन इसके बावजूद वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

अब जरा इस पूरी क्रोनोलॉजी और टाइमिंग पर गौर कीजिए। शेख हसीना ने यह दांव उस वक्त चला है जब ढाका में बैठा अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण उनके खिलाफ कानूनी जाल बुन चुका है। मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार ने हसीना को घेरने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। लेकिन हसीना के सिर्फ एक इंटरव्यू ने इस पूरे नैरेटिव को चुनौती दे दी है। उन्होंने साफ कह दिया है कि आंदोलन के दौरान हुई हिंसा से उनका कोई वास्ता नहीं था और उनके खिलाफ लगाए गए तमाम मामले पूरी तरह राजनीति से प्रेरित और निराधार हैं।

मगर सवाल यह उठता है कि क्या शेख हसीना जैसा मंझा हुआ राजनेता बिना किसी ठोस बैकअप के इतना बड़ा जोखिम ले सकता है? अगस्त 2024 से शेख हसीना भारत की कड़ी सुरक्षा में हैं। जब बांग्लादेश की सेना और भीड़ ने तख्तापलट के हालात पैदा किए, तब नई दिल्ली ने उन्हें सुरक्षित ठिकाना दिया। भारतीय विदेश नीति और सुरक्षा एजेंसियां कभी भी बिना लंबी प्लानिंग के कोई कदम नहीं उठातीं। भारत की धरती से हसीना का यह बड़ा बयान आना इस बात का संकेत है कि पर्दे के पीछे एक बड़ा जियोपॉलिटिकल गेम चल रहा है।

इस पूरे मामले की गहराई समझने के लिए आपको भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के ‘डिफेंसिव-ऑफेंसिव’ सिद्धांत को समझना होगा। इस डॉक्ट्रिन का नियम सीधा है: यदि कोई आपके हितों पर चोट करे, तो उसे उसके ही घर में ऐसा उलझा दें कि वह बैकफुट पर आ जाए। भारत के लिए एक स्थिर और मित्र देश के रूप में बांग्लादेश का होना केवल पड़ोस का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हमारे पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा, सिलीगुड़ी कॉरिडोअर (चिकन नेक) की हिफाजत और बंगाल की खाड़ी में चीन की घेराबंदी को नाकाम करने के लिए अनिवार्य है।

जब से ढाका में मोहम्मद यूनुस की सरकार आई है और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के तारिक रहमान का असर बढ़ा है, वहां भारत-विरोधी तत्वों और कट्टरपंथियों को खुली छूट मिलने की खबरें आई हैं। भारत जानता है कि अगर बांग्लादेश पूरी तरह पाकिस्तान की आईएसआई या चीन के पाले में चला गया, तो भारत की पूर्वी सीमा पर बड़ा सुरक्षा संकट खड़ा हो जाएगा। इसीलिए, शेख हसीना की वापसी की खबर से ढाका के नए हुक्मरानों पर जबरदस्त मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा रहा है। यह एक सीधा मैसेज है कि अवामी लीग का अध्याय अभी समाप्त नहीं हुआ है।

ढाका की अंतरिम सरकार लगातार भारत से शेख हसीना के प्रत्यर्पण (Extradition) की मांग कर रही है। भारत सरकार ने भी आधिकारिक रूप से माना है कि उन्हें यह अनुरोध मिला है और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत इसकी समीक्षा की जा रही है। लेकिन कूटनीति के जानकार जानते हैं कि यह एक सोची-समझी रणनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

अंतर्राष्ट्रीय कानून कहते हैं कि किसी व्यक्ति को ऐसे देश में नहीं सौंपा जा सकता जहां उसकी जान को सीधा खतरा हो या जहां राजनीतिक द्वेष के कारण मुकदमे चल रहे हों। भारत इस कानूनी प्रक्रिया को लंबे समय तक खींच सकता है। भारत ने न केवल हसीना को सुरक्षा दी है, बल्कि उन्हें एक ‘पॉलिटिकल डिटरेंस’ के रूप में बनाए रखा है—एक ऐसा हथियार जिसकी मौजूदगी ही विरोधी खेमे की बेचैनी का कारण है।

बीएनपी नेता तारिक रहमान और अंतरिम सरकार के लिए शेख हसीना की वापसी किसी दुःस्वप्न जैसी है। इसका मुख्य कारण है—हसीना का राजनीतिक रूप से ‘शहीद’ बन जाना। अगर शेख हसीना ढाका एयरपोर्ट पर उतरती हैं, तो सरकार के पास उन्हें गिरफ्तार करने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। लेकिन असली संकट गिरफ्तारी के बाद ही पैदा होगा।

शेख हसीना ‘बंगबंधु’ शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं। भले ही उनके शासन के अंत में असंतोष रहा हो, लेकिन बांग्लादेश के ग्रामीण क्षेत्रों और अवामी लीग के काडर में उनकी जड़ें आज भी गहरी हैं। अगर सत्तर साल से अधिक उम्र की इस नेता को अदालत में घसीटा जाता है या कठोर सजा दी जाती है, तो अवामी लीग का कैडर सड़कों पर उतर सकता है, जिससे ढाका में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त होने का डर है।

इसके अतिरिक्त, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इस कदम का कड़ा विरोध हो सकता है। अमेरिका और मानवाधिकार संगठन किसी भी पूर्व लोकतांत्रिक प्रमुख के खिलाफ एकतरफा कार्रवाई को आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे। अगर ऐसे में बांग्लादेश पर आर्थिक प्रतिबंध लगते हैं, तो वहां की गारमेंट एक्सपोर्ट पर टिकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी।

मौजूदा परिस्थितियों में ढाका सरकार के पास विकल्प बेहद सीमित हैं:

पहला विकल्प: हसीना के उतरते ही उन्हें जेल भेज दिया जाए, जिससे वे अपनी पार्टी के लिए और भी बड़ा प्रतीक (Icon) बन जाएंगी।

दूसरा विकल्प: उन पर त्वरित मुकदमा चलाकर सजा दी जाए, जिससे देश में गृहयुद्ध की स्थिति बन सकती है और भारत के साथ संबंध हमेशा के लिए खत्म हो सकते हैं।

तीसरा विकल्प: मुकदमे की प्रक्रिया को वर्षों तक लटकाए रखना, जिससे जनता की सहानुभूति उनके साथ जुड़ सकती है और वे अदालत को ही अपना राजनीतिक मंच बना लेंगी।

चौथा और कूटनीतिक विकल्प: ढाका की सरकार बैक-चैनल से नई दिल्ली से गुहार लगाए कि हसीना को फिलहाल आने से रोका जाए। लेकिन इसके बदले भारत अपनी रणनीतिक शर्तें—जैसे पूर्वोत्तर के विद्रोहियों पर पाबंदी और बॉर्डर सिक्योरिटी की गारंटी—पूरी करवाएगा।

इस पूरे घटनाक्रम में बांग्लादेशी सेना की भूमिका महत्वपूर्ण है। सेना प्रमुख कभी नहीं चाहेंगे कि सड़कों पर खूनी संघर्ष हो और अर्थव्यवस्था डूब जाए। अगर राजनीतिक अस्थिरता सीमा पार करती है, तो सेना खुद नियंत्रण के लिए कड़े कदम उठा सकती है।

दूसरी तरफ, वाशिंगटन और बीजिंग भी इस क्षेत्र पर नजरें गड़ाए हुए हैं। अमेरिका बंगाल की खाड़ी में अपनी पैठ चाहता है, जबकि चीन अपने निवेश को सुरक्षित रखना चाहता है। लेकिन कोई भी सुपरपावर बांग्लादेश में पूर्ण अराजकता नहीं चाहेगी, क्योंकि इससे दक्षिण एशिया का सुरक्षा संतुलन बिगड़ सकता है।

भारत ने इस घटनाक्रम से सिद्ध कर दिया है कि उसकी विदेश नीति अत्यंत सुदृढ़ है। शेख हसीना का कार्ड भारत के हाथ में वह ‘ट्रम्प कार्ड’ है, जो आने वाले दिनों में दक्षिण एशिया की राजनीति का रुख तय करेगा। ढाका में सत्ता किसी की भी हो, नई दिल्ली के सामरिक हितों को नजरअंदाज करना अब नामुमकिन होगा।

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