मनीला में हुई उस बंद कमरे की मुलाकात में ऐसा क्या हुआ कि चीन को अपनी सफाई पेश करनी पड़ी? क्या भारत ने गुपचुप तरीके से ताइवान और तिब्बत के जरिए चीन की दुखती रग पर हाथ रख दिया है, या फिर यह ड्रैगन का कोई मनोवैज्ञानिक खेल है? उस गुप्त रणनीति का सच क्या है जिसने वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों को सोचने पर मजबूर कर दिया है? 1962 से हमारी जमीन हड़पने वाले चीन को आखिर दिल्ली तिब्बत और ताइवान के मुद्दे पर कोई छूट क्यों नहीं दे रही? साउथ ब्लॉक की इस रहस्यमयी खामोशी के पीछे छिपे भारत के ‘चाणक्य मास्टरप्लान’ को आज विस्तार से डिकोड करते हैं।
हाल ही में मनीला में आसियान देशों की उच्च स्तरीय बैठक के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच द्विपक्षीय बातचीत हुई। गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते ठंडे बस्ते में थे, लेकिन इस बैठक के बाद बीजिंग ने एक चौंकाने वाला बयान जारी किया। चीन का दावा था कि जयशंकर ने उन्हें आश्वासन दिया है कि ताइवान और तिब्बत पर भारत का पुराना रुख नहीं बदला है और वह चीन की संप्रभुता का सम्मान करता है।
इस खबर के आते ही सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने तीखे सवाल उठाए। उनका तर्क सीधा था: जब चीन 1963 से लद्दाख और कश्मीर के भारतीय हिस्सों पर अवैध कब्जा जमाए हुए है, जब वह अरुणाचल प्रदेश पर अपना बेतुका दावा करता है और CPEC के जरिए भारत की क्षेत्रीय अखंडता को चुनौती देता है, तो भारत को तिब्बत या ताइवान के मुद्दे पर चीन को कोई भी दिलासा देने की क्या जरूरत है?
जब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से इस पर सवाल हुआ, तो उन्होंने बेहद सधा हुआ और आक्रामक जवाब दिया। उन्होंने याद दिलाया कि संप्रभुता का सम्मान एकतरफा नहीं हो सकता। भारत ने अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन किया है, लेकिन सीमा पर चीन की हरकतों ने इन नियमों की धज्जियां उड़ाई हैं। अक्साई चिन और शक्सगाम घाटी पर चीन का अवैध कब्जा आज भी सबसे बड़ा मुद्दा है। यह बयान केवल स्पष्टीकरण नहीं, बल्कि आने वाले कूटनीतिक बदलाव का संकेत था।
महत्वपूर्ण बात यह है कि 2010 के बाद से भारत ने चीन के साथ किसी भी संयुक्त बयान में ‘वन चाइना पॉलिसी’ का उल्लेख करना बंद कर दिया है। यह भारतीय कूटनीति का एक बड़ा स्ट्रैटेजिक शिफ्ट था। हालांकि 1954 और 2003 में भारत ने कुछ समझौतों के तहत तिब्बत को चीन का हिस्सा माना था, लेकिन वह इस शर्त पर था कि चीन भारत की सीमाओं का सम्मान करेगा। आज चीन उन सभी वादों को तोड़ चुका है। ऐसे में भारत का ताइवान को लेकर कोई भी बड़ा फैसला दुनिया की जियोपॉलिटिक्स को बदलकर रख सकता है।
यदि भारत ताइवान और तिब्बत के मोर्चे पर खुलकर आक्रामक रुख अपनाता है, तो चीन के भीतर कई संकट एक साथ खड़े हो जाएंगे। तिब्बत कार्ड चीन की सबसे कमजोर नस है। 14वें दलाई लामा की विरासत का सवाल चीन के लिए बड़ी सिरदर्दी है। चीन चाहता है कि वह अपना कोई कठपुतली नेता तिब्बत पर थोप दे, लेकिन अगर भारत यह कह दे कि उत्तराधिकारी चुनने का हक केवल तिब्बतियों का है, तो चीन का दशकों का कब्जा अवैध घोषित हो जाएगा।
यह विवाद केवल जमीन का नहीं, बल्कि पानी का भी है। ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत से ही आती है, जहाँ चीन बड़े बांध बनाकर पानी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। तिब्बत पर भारत का सख्त स्टैंड चीन के इस ‘वॉटर वेपनाइजेशन’ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेनकाब कर देगा और साबित करेगा कि चीन LAC पर शांति नहीं चाहता।
दूसरा बड़ा हथियार है ‘ताइवान कार्ड’। शी जिनपिंग का सपना ताइवान पर कब्जा करना है, लेकिन ताइवान दुनिया की आधुनिक अर्थव्यवस्था का इंजन है। यहाँ की कंपनी TSMC दुनिया के सबसे एडवांस सेमीकंडक्टर बनाती है। यदि भारत ताइवान के साथ कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते बढ़ाता है, तो चीन की घेराबंदी मजबूत होगी। ताइवान के तकनीकी सहयोग से भारत न केवल चिप निर्माण में आगे बढ़ेगा, बल्कि चीन के आर्थिक घमंड को भी करारा जवाब मिलेगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चीन शांति की बातें केवल 2035 तक भारत के खिलाफ ‘टू-फ्रंट वॉर’ की तैयारी के लिए कर रहा है? रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की योजना पहले ताइवान को निबटाने और फिर भारत पर ध्यान केंद्रित करने की है। यही वजह है कि एस. जयशंकर ने मनीला में साफ कह दिया कि सीमा पर शांति के बिना रिश्तों में सामान्य स्थिति नहीं लौट सकती। व्यापार और तनाव साथ-साथ नहीं चल सकते।
भारत सरकार सीधे टकराव के बजाय ‘कैलकुलेटेड गेम’ खेल रही है। अचानक ‘वन चाइना पॉलिसी’ को खारिज करने से चीन सीमा पर घुसपैठ बढ़ा सकता है या पूर्वोत्तर में उग्रवाद को हवा दे सकता है। इसलिए भारत ‘रणनीतिक अस्पष्टता’ (Strategic Ambiguity) की नीति अपना रहा है, जहाँ कथनी से ज्यादा करनी पर जोर है।
भारत ने ‘इंडिया-ताइपे एसोसिएशन’ के माध्यम से ताइवान के साथ आर्थिक और तकनीकी सहयोग को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया है। गुजरात और तमिलनाडु में ताइवान की कंपनियां निवेश कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत अब चीन की कर्ज-जाल वाली कूटनीति की पोल खोल रहा है, जिससे छोटे देश भी अब चीन के खिलाफ बोलने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं।
अगर भारत इस रुख को जारी रखता है, तो क्वाड (QUAD) केवल एक चर्चा का मंच नहीं बल्कि एक मजबूत सैन्य और आर्थिक ब्लॉक बन जाएगा। इससे यूरोप के उन देशों को भी नैतिक बल मिलेगा जो ताइवान का समर्थन करना चाहते हैं। भारत का एक कड़ा कदम शी जिनपिंग के वैश्विक प्रभाव को धराशायी कर सकता है।
चीन की अपनी अर्थव्यवस्था इस समय संकट में है। रियल एस्टेट बाजार गिर रहा है और विदेशी निवेशक बाहर जा रहे हैं। ऐसे में भारत का बाजार चीन के लिए ऑक्सीजन जैसा है। लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि व्यापारिक रियायतें तभी मिलेंगी जब सीमा विवाद सुलझेगा। सितंबर में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन यह तय करेगा कि चीन झुकने को तैयार है या नहीं।
भारत अब ‘जैसे को तैसा’ की कूटनीति पर चल रहा है। अगर चीन अरुणाचल पर दावा करेगा, तो भारत भी वन चाइना को मान्यता नहीं देगा। भारत ताइवान और तिब्बत के मुद्दों को एक सोची-समझी रणनीति के तहत धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहा है, ताकि चीन पर निरंतर दबाव बना रहे।
क्या यह दिल्ली का वह मास्टरस्ट्रोक है जो चीन के 2035 के खतरनाक इरादों को नाकाम कर देगा? भारत की यह खामोश कूटनीति चीन को LAC पर पीछे हटने को मजबूर कर सकती है। आज का भारत अपनी संप्रभुता को लेकर पहले से कहीं अधिक अडिग है और ड्रैगन को उसी की भाषा में जवाब दे रहा है।

