तिब्बत का नाम ही बीजिंग के तानाशाहों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है। तिब्बत पर दुनिया के किसी भी कोने से आने वाला एक छोटा सा बयान भी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की नींद उड़ा देता है। लेकिन इस बार भारत ने सिर्फ बयानबाजी नहीं की है, बल्कि सीधे तिब्बत की धरती पर कदम रखकर चीन को हैरान कर दिया है। ल्हासा में भारतीय दूत की मौजूदगी ने चीन के शीर्ष राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है। यह कोई सामान्य कूटनीतिक यात्रा नहीं थी, बल्कि नई दिल्ली के ‘वॉर रूम’ में तैयार की गई एक ऐसी रणनीतिक चाल थी जिसने सीधे ड्रैगन की दुखती रग को दबा दिया है।
चीन हमेशा से तिब्बत को लेकर एक अज्ञात डर में रहता है। ऐसे में भारत के नए राजदूत विक्रम दोरईस्वामी का यह दौरा बीजिंग के लिए किसी झटके से कम नहीं है। दोरईस्वामी मंदारिन भाषा के गहरे जानकार हैं और चीन की कूटनीतिक चालबाजियों को बखूबी समझते हैं। पद संभालते ही उन्होंने सबसे पहले तिब्बत का रुख किया, जिससे यह साफ हो गया है कि भारत अब तिब्बत के मुद्दे पर बैकफुट पर रहने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
गलवान हिंसा के बाद भारत का सबसे कड़ा कूटनीतिक संदेश
यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब एलएसी पर तनाव पूरी तरह शांत नहीं हुआ है और चीन लगातार उकसावे वाली कार्रवाई कर रहा है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में चीन की बढ़ती दखलंदाजी का जवाब अब भारत ने तिब्बत कार्ड खेलकर दिया है। जानकारों की मानें तो 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत का यह अब तक का सबसे साहसी और प्रभावी कूटनीतिक कदम है।
गलवान की घटना ने दोनों देशों के बीच भरोसे को खत्म कर दिया था। अब भारत ने अपनी रणनीति को ‘रक्षात्मक’ से बदलकर ‘आक्रामक’ कर लिया है। विक्रम दोरईस्वामी का ल्हासा जाना केवल एक आधिकारिक दौरा नहीं, बल्कि भारत-चीन संबंधों में ‘सॉफ्ट डिप्लोमेसी’ के जरिए एक बड़ा रणनीतिक संकेत देना है।
इस कूटनीति को समझना सरल है। यदि आपका पड़ोसी आपको परेशान करे, तो आप उसके घर के सबसे संवेदनशील आयोजन में शामिल होकर अपनी ताकत का एहसास कराते हैं। भारत ने ठीक यही माइंडगेम तिब्बत में खेला है, जिससे चीन भारी मानसिक दबाव में है।
मंदारिन के मास्टर और चीन की घबराहट
विक्रम दोरईस्वामी जैसे चीन मामलों के विशेषज्ञ को राजदूत बनाना भारत की स्पष्ट विदेश नीति को दर्शाता है। वे चीनी भाषा में निपुण हैं, जिसका अर्थ है कि उन्हें बीजिंग के प्रोपेगेंडा को समझने के लिए किसी अनुवादक की जरूरत नहीं है। जब वे ल्हासा की सड़कों पर उतरकर वहां के प्रशासन से सीधे बात करते हैं, तो चीन का पूरा तंत्र असुरक्षा महसूस करने लगता है।
तिब्बत चीन के लिए एक ऐसा डार्क रूम है जिसे वह दुनिया से छिपाकर रखना चाहता है। भारत ने वहां अपनी सक्रियता बढ़ाकर चीन के इस बंद दरवाजे को दुनिया के सामने खोल दिया है।
तिब्बत: ड्रैगन की सबसे कमजोर कड़ी
चीन के लिए तिब्बत केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे नाजुक हिस्सा है। तिब्बत की संस्कृति और भूगोल चीन के मुख्य भूभाग से बिल्कुल अलग है, और वहां के लोग आज भी कम्युनिस्ट शासन को स्वीकार नहीं कर पाए हैं। ऐसे में भारत जैसी वैश्विक शक्ति की वहां सीधी उपस्थिति चीन को अंदर तक हिला देती है।
भारत ने अब स्पष्ट संदेश दे दिया है कि यदि चीन भारतीय सीमाओं या पीओके जैसे मुद्दों पर टांग अड़ाएगा, तो भारत भी चीन की दुखती रग यानी तिब्बत को दबाने से पीछे नहीं हटेगा।
कैलाश मानसरोवर के बहाने रणनीतिक घेराबंदी
आधिकारिक तौर पर इस दौरे का उद्देश्य कैलाश मानसरोवर यात्रा की तैयारियों का जायजा लेना बताया गया। कोविड और सीमा विवाद के कारण यह यात्रा पिछले पांच वर्षों से बंद थी। अब चीन ने भारी दबाव के बाद इसे फिर से शुरू करने की अनुमति दी है।
लेकिन कूटनीति में जो दिखता है, वह हमेशा सच नहीं होता। इस धार्मिक यात्रा की आड़ में भारत तिब्बत के भीतरी इलाकों तक अपनी पहुंच और निगरानी मजबूत कर रहा है। तिब्बत के प्रशासन के साथ भारतीय प्रतिनिधिमंडल की उच्च स्तरीय बैठकें इस बात का प्रमाण हैं कि भारत अब वहां अपनी पकड़ बना रहा है।
दलाई लामा और उत्तराधिकार पर भारत का कड़ा रुख
दलाई लामा का उत्तराधिकारी कौन होगा, यह सवाल चीन के गले की फांस बना हुआ है। भारत ने हमेशा दलाई लामा को सम्मान दिया है, जो चीन को खटकता है। इस दौरे के जरिए भारत ने संकेत दिया है कि भविष्य में तिब्बती धार्मिक नेतृत्व के मुद्दे पर भारत एक निर्णायक और सक्रिय भूमिका निभाएगा।
चीन की ‘वन चाइना पॉलिसी’ को अब भारत की आक्रामक कूटनीति से कड़ी चुनौती मिल रही है। आने वाले समय में यह टकराव और बढ़ सकता है।
सीमा पर बुनियादी ढांचे का निर्माण और जोजिला टनल
भारत ने अपनी रक्षात्मक नीति को त्याग दिया है। सीमा पर जिस गति से सड़कों और पुलों का निर्माण हो रहा है, वह भारत की ‘डबल-एज्ड स्ट्रैटेजी’ का हिस्सा है। एक तरफ कूटनीतिक बातचीत और दूसरी तरफ सैन्य रसद को मजबूत करना।
सोनमर्ग और द्रास को जोड़ने वाली जोजिला टनल चीन के लिए बड़ी चिंता का विषय है। यह सुरंग भारतीय सेना को हर मौसम में लद्दाख और एलएसी तक तेजी से पहुंचने की सुविधा देगी। भारत अब चीन की धमकियों की परवाह किए बिना सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास कर रहा है।
POK और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को चुनौती
पीओके में चीन के सीपीईसी प्रोजेक्ट का करारा जवाब भारत ने तिब्बत में दखल देकर दिया है। जब चीन भारत की संप्रभुता का सम्मान नहीं करता, तो भारत भी अब उसी की भाषा में जवाब दे रहा है।
यह रणनीति केवल तिब्बत तक सीमित नहीं है, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की एक बड़ी वैश्विक योजना का हिस्सा है। भारत ने दिखा दिया है कि चीन को उसके ही माइंडगेम में कैसे मात दी जा सकती है।
आज का भारत 1962 वाला भारत नहीं है। विक्रम दोरईस्वामी का ल्हासा दौरा तो महज एक शुरुआत है। भारतीय कूटनीति अब पूरी तरह अटैकिंग मोड में है और चीन की घेराबंदी का जो जाल बिछाया गया है, उसका काट ढूंढना बीजिंग के बस की बात नहीं रही।

