वैश्विक कूटनीतिक और सैन्य परिदृश्य में इस समय एक ऐसी हलचल मची है, जिसने दुनिया के शक्ति समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। कुछ साल पहले तक वैश्विक राजनीति केवल अमेरिका और चीन के इर्द-गिर्द केंद्रित थी, लेकिन अब एक नई शक्ति धुरी उभर रही है। भारत और फ्रांस के बीच एक ऐसी महा-साझेदारी को अंतिम रूप दिया जा रहा है, जिसे नजरअंदाज करना किसी भी महाशक्ति के लिए संभव नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति के बीच रक्षा से लेकर भविष्य की तकनीकों तक 12 प्रमुख समझौतों पर गहन चर्चा हो रही है। इन समझौतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर और अंतरिक्ष क्षेत्र जैसे क्रांतिकारी विषय शामिल हैं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा 114 राफेल लड़ाकू विमानों की मेगा डील और उनके ‘सोर्स कोड’ को भारत को सौंपने की तैयारी को लेकर हो रही है, जिसने बीजिंग से वाशिंगटन तक चिंता बढ़ा दी है।
यह महज हथियारों की सामान्य खरीद नहीं है, बल्कि रक्षा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक छलांग है। राफेल के सोर्स कोड को लेकर हो रही चर्चाओं के पीछे एक बड़ा कारण है। जब कोई देश किसी दूसरे देश से फाइटर जेट खरीदता है, तो वह एक ‘लॉक्ड सिस्टम’ की तरह आता है। इसमें आप अपनी मर्जी से कोई भी स्वदेशी हथियार या मिसाइल नहीं लगा सकते; इसके लिए मूल निर्माता देश की अनुमति और उन्हीं के बनाए हथियारों की जरूरत होती है। इसे आप स्मार्टफोन के ऑपरेटिंग सिस्टम की तरह समझ सकते हैं, जहाँ आपके पास रूट एक्सेस या सोर्स कोड न होने पर आप सिस्टम में बड़े बदलाव नहीं कर सकते।
आमतौर पर अमेरिका या रूस जैसे देश अपने सबसे उन्नत विमानों का नियंत्रण किसी दूसरे देश को नहीं देते। उनका मुख्य उद्देश्य यह होता है कि खरीदार देश हमेशा हथियारों और स्पेयर पार्ट्स के लिए उन पर निर्भर रहे। लेकिन भारत ने फ्रांस के सामने स्पष्ट कर दिया है कि उसे 114 राफेल जेट तभी चाहिए जब उनका पूर्ण नियंत्रण यानी ‘सोर्स कोड’ भारत के पास होगा।
फ्रांस का इस शर्त पर सहमत होना भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत है। सोर्स कोड मिलने का अर्थ है कि भारतीय वायुसेना राफेल में अपनी स्वदेशी मिसाइलों जैसे ‘अस्त्र’ और ‘ब्रह्मोस’ को आसानी से जोड़ सकेगी। इसके लिए बार-बार फ्रांस की अनुमति नहीं लेनी होगी। इससे हमारी वायुसेना न केवल स्वतंत्र होगी, बल्कि हम इसमें अपने खुद के इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम भी लगा सकेंगे। जब राफेल से भारत की अपनी मिसाइलें दुश्मन पर वार करेंगी, तो उनके रडार सिस्टम को यह समझने का मौका भी नहीं मिलेगा कि हमला कहाँ से हुआ।
फ्रांस द्वारा भारत पर इतना भरोसा करने के पीछे दशकों पुराने अटूट संबंध हैं। भारतीय वायुसेना में फ्रांसीसी विमानों का इतिहास 1950 के दशक के ‘तूफानी’ जेट्स से शुरू होकर जगुआर और मिराज 2000 तक जाता है। कारगिल युद्ध में मिराज 2000 ने जो पराक्रम दिखाया था, उसने इस भरोसे को और मजबूत किया।
इस मित्रता की असली परीक्षा 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण के दौरान हुई थी। जब अमेरिका और कई पश्चिमी देशों ने भारत पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे, तब फ्रांस एकमात्र ऐसा पश्चिमी देश था जिसने भारत का साथ दिया और प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया। फ्रांस ने स्पष्ट कहा कि भारत एक जिम्मेदार राष्ट्र है और उसे अपनी सुरक्षा का अधिकार है। उसी वर्ष फ्रांस भारत का पहला रणनीतिक साझेदार (Strategic Partner) बना।
भारत और फ्रांस दोनों ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) की विचारधारा में विश्वास रखते हैं, जिसका अर्थ है अपने फैसले स्वयं लेना। फ्रांस ने अक्सर नाटो के प्रभाव से खुद को स्वतंत्र रखा है, और भारत ने भी कभी किसी सैन्य गुट का हिस्सा बनना स्वीकार नहीं किया। फ्रांस ने कभी भी कश्मीर जैसे भारत के आंतरिक मुद्दों पर हस्तक्षेप नहीं किया, बल्कि हमेशा भारत के लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान किया है।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र और विशेष रूप से हिंद महासागर में चीन की बढ़ती घुसपैठ के खिलाफ फ्रांस भारत का सबसे मजबूत साथी है। चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति का मुकाबला करने के लिए फ्रांस के रीयूनियन आइलैंड और मयोट जैसे सैन्य ठिकाने भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। फ्रांस भली-भांति जानता है कि इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए भारत का मजबूत होना आवश्यक है।
2018 के लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट के बाद भारतीय नौसेना अब फ्रांस के सैन्य अड्डों का उपयोग कर सकती है। दोनों देशों की नौसेनाएं मिलकर गश्त कर रही हैं और खुफिया जानकारी साझा कर रही हैं, ताकि हिंद महासागर में किसी भी बाहरी शक्ति का एकाधिकार न हो सके।
कूटनीतिक स्तर पर भी फ्रांस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता और एनएसजी (NSG) में भारत के प्रवेश का मुखर समर्थक रहा है। चीन के विरोध के बावजूद फ्रांस हमेशा भारत के बेदाग परमाणु रिकॉर्ड की वकालत करता आया है।
पिछले तीन दशकों में जैतापुर परमाणु ऊर्जा प्लांट, स्कॉर्पीन क्लास की कलवरी पनडुब्बियां और 2016 की 36 राफेल विमानों की डील ने दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया है। इन पनडुब्बियों और विमानों ने भारत की सामरिक शक्ति को इतना बढ़ा दिया है कि पड़ोसी देश भी अब चुनौती देने से कतराते हैं।
अब 2026 को ‘भारत-फ्रांस नवाचार वर्ष’ के रूप में मनाया जा रहा है। एआई, सेमीकंडक्टर और स्पेस सेक्टर में दोनों देशों का सहयोग भारत को एक तकनीकी महाशक्ति बनाने की दिशा में अग्रसर है। इसरो और फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी (CNES) मिलकर तृष्णा सैटेलाइट और गगनयान मिशन पर काम कर रहे हैं।
‘हॉरिजन 2047’ रोडमैप अगले 25 वर्षों का एक विजन है, जहाँ फ्रांस केवल हथियार विक्रेता नहीं बल्कि तकनीक साझा करने वाला एक सच्चा साझेदार है। टाटा और एयरबस द्वारा भारत में सी-295 विमानों का निर्माण इस बात का प्रमाण है कि भारत अब रक्षा निर्यातक बनने की ओर बढ़ रहा है।
यह पूरी साझेदारी दर्शाती है कि भारत अब किसी के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर काम करता है। 114 राफेल जेट्स के साथ सोर्स कोड की मांग भारत की बढ़ती वैश्विक साख का प्रतीक है। आज भारत और फ्रांस का यह गठबंधन बहु-ध्रुवीय विश्व में स्थिरता और सुरक्षा का सबसे मजबूत स्तंभ बन चुका है।

