कराची की सड़कों पर अब बेबसी का मंजर साफ दिखाई दे रहा है! वह शहर, जो कभी पाकिस्तान का आर्थिक केंद्र था, आज भीषण गर्मी में पानी की एक-एक बूंद के लिए मोहताज है। यह कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि उस दोहरी नीति का नतीजा है जो पाकिस्तान भारत के खिलाफ अपनाता आया है। एक तरफ इस्लामाबाद भारत में अशांति फैलाने के लिए आतंकियों को पनाह देता है, और दूसरी तरफ भारत से सिंधु जल संधि के तहत लगातार पानी की उम्मीद रखता है। लेकिन भारत ने अब अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि आतंक और पानी का प्रवाह एक साथ मुमकिन नहीं है। भारत ने सिंधु जल संधि (IWT) की समीक्षा के लिए पाकिस्तान को जो कड़ा नोटिस भेजा है, उसने पाकिस्तानी हुकूमत की नींव हिला दी है। भारत की इस कूटनीतिक सक्रियता ने पाकिस्तान को आईना दिखा दिया है, और कराची की प्यासी जनता आज अपनी ही सरकार की नाकामियों का फल भुगत रही है।
कराची में कोहराम: आधे से ज्यादा शहर पानी के लिए परेशान
पाकिस्तान की अपनी मीडिया वहां के भयावह हालात की गवाही दे रही है। पाकिस्तानी समाचार चैनल ARY न्यूज के अनुसार, कराची के 70 प्रतिशत से अधिक इलाकों में जल आपूर्ति पूरी तरह से ठप पड़ी है। भीषण गर्मी के बीच लोग पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। गुलिस्तान-ए-जौहर, गुलशन-ए-इकबाल, नाजिमाबाद और उत्तरी कराची जैसे प्रमुख क्षेत्रों में पिछले दो हफ्तों से नलों में पानी नहीं आया है, जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है।
40 डिग्री के चिलचिलाते तापमान और ईद के मौके पर पानी न होना वहां के लोगों के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं है। कराची की जनता अब निजी टैंकर माफियाओं के शोषण का शिकार हो रही है। पानी की कीमतें आसमान छू रही हैं और मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट बिगड़ चुका है। यह संकट पाकिस्तान की चरमराती आर्थिक स्थिति और प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। भारत के सख्त तेवरों ने पाकिस्तान को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उसकी जल सुरक्षा अब पहले जैसी सुरक्षित नहीं है।
IWT पर भारत का मास्टरस्ट्रोक, पाक में मची खलबली
यह जल संकट उस समय गहराया है जब भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर अपनी रणनीति बदल दी है। पाकिस्तान सालों तक इस संधि का दुरुपयोग कर भारत के विकास कार्यों में बाधा डालता रहा। लेकिन अब भारत ने इस ‘एकतरफा’ व्यवस्था को चुनौती देते हुए संशोधन का नोटिस जारी किया है। यह भारत की तरफ से एक स्पष्ट सामरिक चेतावनी है कि वह अपनी नदियों के जल पर अपने अधिकारों का पूर्ण उपयोग करेगा।
भारत अब जम्मू-कश्मीर में सिंधु, झेलम और चेनाब पर अपनी जलविद्युत परियोजनाओं को तेजी से बढ़ा रहा है। किशनगंगा और रतले जैसे प्रोजेक्ट्स, जिन्हें पाकिस्तान ने लटकाए रखा था, अब प्राथमिकता पर हैं। जब भारत अपने हिस्से के पानी का सही प्रबंधन करेगा, तो पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ना तय है। कराची की प्यास इसी कूटनीतिक बदलाव का शुरुआती असर है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहा है, लेकिन भारत अपने कानूनी अधिकारों के तहत कदम उठा रहा है।
पाकिस्तान के भीतर छिड़ा सियासी युद्ध
इस संकट ने पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में भी आग लगा दी है। जमात-ए-इस्लामी के नेता हाफिज नईम-उर-रहमान ने सिंध की पीपीपी सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि कराची की इस बदहाली के लिए पीपीपी का कुप्रबंधन जिम्मेदार है। पिछले 18 वर्षों से सत्ता में रहने के बावजूद सरकार बुनियादी सुविधाएं देने में फेल रही है।
नईम ने आरोप लगाया कि सरकार ने जानबूझकर कराची को टैंकर माफियाओं के हवाले कर दिया है। यह स्थिति दिखाती है कि पाकिस्तान न केवल बाहरी बल्कि आंतरिक रूप से भी खोखला हो चुका है। जब तक वह अपनी भारत विरोधी नीतियों को नहीं त्यागेगा, तब तक उसकी जनता ऐसे ही संकटों में घिरी रहेगी।
निष्कर्ष: भारत का बदलता रुख
कराची का जल संकट ‘नए भारत’ की उस कूटनीति का परिणाम है जहां अब रियायतें नहीं, बल्कि अधिकार सर्वोपरि हैं। भारत ने साफ कर दिया है कि वह अपने हितों और सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। पाकिस्तान के लिए संदेश साफ है: यदि वह आतंक का दामन नहीं छोड़ता, तो उसे पानी और विकास जैसी बुनियादी चीजों के लिए तरसना पड़ेगा। सिंधु जल संधि की समीक्षा भारत के कड़े रुख की एक बानगी मात्र है।

