मिडिल ईस्ट में शांति की नई किरण: हिजबुल्लाह के खंडहर बने गढ़ों में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना ने संभाला मोर्चा

मिडिल ईस्ट के सबसे अशांत क्षेत्र में आखिरकार बारूद का काला धुआं छंटने लगा है, जहां पिछले कई महीनों से भीषण तबाही का मंजर था। दक्षिण लेबनान, जो कभी हिजबुल्लाह जैसे खूंखार संगठन का अजेय दुर्ग माना जाता था, वहां आज एक अजीब सी खामोशी है। यह शांति डर की नहीं, बल्कि आतंक के सफाए के बाद आई सुकून की दस्तक है। इजरायल और अमेरिका के विनाशकारी प्रहारों ने हिजबुल्लाह के उस अहंकार को चकनाचूर कर दिया है, जिसके दम पर वह पूरे क्षेत्र को अस्थिर करना चाहता था। अब इस नेटवर्क के ध्वस्त होने के बाद संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना (UNIFIL) ने अग्रिम मोर्चों पर कमान संभाल ली है। जिन लेबनानी नागरिकों को अपनी जान बचाने के लिए घर छोड़कर भागना पड़ा था, वे अब अपनी मिट्टी की ओर लौट रहे हैं। यह दुनिया के लिए संदेश है कि जब आतंक का जवाब उसकी भाषा में दिया जाता है, तभी स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।

आतंक का अंत और जीवन की वापसी

जून के महीने से दक्षिण लेबनान की तस्वीर तेजी से बदल रही है। आसमान से बरसती आग और सायरन का शोर अब थम गया है। जिन गलियों में कभी हिजबुल्लाह के रॉकेट लॉन्चर तैनात रहते थे, वहां अब यूएन पीसकीपर्स की गाड़ियां सुरक्षा दे रही हैं। लौटते हुए परिवारों को उनके घर मलबे में तब्दील मिल रहे हैं। यह तबाही दरअसल उस कायरता का परिणाम है जिसमें आतंकी आम नागरिकों के घरों और स्कूलों को अपनी ढाल बनाते थे। अब आतंकियों के हटने के बाद, यूनिफिल के जवान जनजीवन को पटरी पर लाने में जुटे हैं। मानवीय सहायता पहुंचाई जा रही है और बमबारी में क्षतिग्रस्त हुई पानी की लाइनों को फिर से जोड़ा जा रहा है।

प्रस्ताव 1701 की हकीकत और यूएन की सक्रियता

इस स्थिति को समझने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1701 को जानना जरूरी है। 2006 में इजरायल-हिजबुल्लाह युद्ध रोकने के लिए इसे लाया गया था, जिसका उद्देश्य हिजबुल्लाह को निहत्था करना और लेबनानी सेना को मजबूत करना था। हालांकि, वर्षों तक हिजबुल्लाह ने ईरान की मदद से हथियारों का विशाल भंडार जमा किया। 8 अक्टूबर 2023 के बाद तो यह प्रस्ताव महज कागजी बनकर रह गया था। हिजबुल्लाह के लगातार रॉकेट हमलों के जवाब में इजरायल ने अपनी सुरक्षा के लिए जो जवाबी कार्रवाई की, उसने समीकरण बदल दिए।

अब जबकि हिजबुल्लाह की ताकत कमजोर पड़ चुकी है, यूनिफिल अपनी वास्तविक भूमिका निभा पा रहा है। शांति सैनिक अब केवल निगरानी नहीं कर रहे, बल्कि लेबनानी सेना के साथ मिलकर ‘ब्लू लाइन’ की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं।

मार्च का वो निर्णायक युद्ध जिसने खेल बदल दिया

इसी साल मार्च में अमेरिका और इजरायल ने मिलकर आतंक के पोषक ईरान पर जो प्रत्यक्ष प्रहार किया, उसने पूरे क्षेत्र की राजनीति हिला दी। अपने आका को संकट में देख हिजबुल्लाह भी युद्ध में कूद पड़ा, लेकिन यह उसकी बड़ी सामरिक भूल साबित हुई। इजरायली सेना ने लेबनान के भीतर घुसकर उन गुप्त बंकरों और कमांड सेंटर्स को नष्ट कर दिया, जिनकी जानकारी लेबनान सरकार तक को नहीं थी। उस भीषण संघर्ष के बाद अब शांति वार्ता का दौर शुरू हुआ है, जो साबित करता है कि कूटनीति तभी सफल होती है जब आतंक का ढांचा बेअसर हो जाए।

जमीनी चुनौतियां और यूएन का एक्शन मोड

युद्ध रुकने का मतलब यह नहीं कि खतरा टल गया है। वापस लौट रहे परिवारों के लिए जमीन में दबे बारूदी सुरंग और बिना फटे रॉकेट सबसे बड़ी चुनौती हैं। यूनिफिल के जवान अपनी जान जोखिम में डालकर इन बमों को निष्क्रिय कर रहे हैं। हाल ही में लेबनानी सेना और यूएन के दस्ते ने दर्जनों घातक ड्रोन्स और आईईडी को सफलतापूर्वक नष्ट किया है, जो किसी भी समय बड़ी जान-माल की हानि कर सकते थे।

साथ ही, यूएन ने टिबनिन सरकारी अस्पताल जैसे महत्वपूर्ण केंद्रों को फिर से क्रियाशील करने के लिए पूरी ताकत लगा दी है। चिकित्सा उपकरण और बिजली-पानी जैसी बुनियादी सेवाओं की बहाली के लिए टेक्निकल टीमें लगातार काम कर रही हैं ताकि गांवों में फिर से जीवन सामान्य हो सके।

आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक दृष्टिकोण

लेबनान के हालात यह स्पष्ट करते हैं कि आतंकवाद कभी किसी समाज का भला नहीं कर सकता। जिस संगठन ने मसीहा बनने का दावा किया था, उसी की वजह से दक्षिण लेबनान खंडहर बन गया। भारत का हमेशा से मानना रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ ही एकमात्र समाधान है। बातचीत और आतंक साथ-साथ नहीं चल सकते।

इजरायल की कार्रवाई ने लेबनान की जनता को एक नई सुबह का अवसर दिया है। अब यह वैश्विक शक्तियों और संयुक्त राष्ट्र की जिम्मेदारी है कि हिजबुल्लाह जैसे तत्वों को दोबारा पनपने न दिया जाए। यदि प्रस्ताव 1701 को इस बार कड़ाई से लागू किया गया, तो यह मिडिल ईस्ट के इतिहास का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट होगा। भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या यह शांति स्थायी रहती है या फिर किसी नई साजिश की भेंट चढ़ जाती है।

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