मिडिल ईस्ट के रेगिस्तानों से इस वक्त एक ऐसी सनसनीखेज और झकझोर देने वाली खबर आ रही है, जिसने पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों और कूटनीतिज्ञों की रातों की नींद उड़ा दी है। एक ऐसी गुप्त योजना का पर्दाफाश हुआ है जो यदि हकीकत बनी, तो खाड़ी के देशों में एक ऐसा विनाशकारी बारूदी तूफान आएगा जिसे शांत करना नामुमकिन होगा। वाशिंगटन से अबू धाबी और तेहरान से तेल अवीव तक, इस वक्त युद्ध की गंध फैल चुकी है। ब्रिटिश अखबार ‘द टेलीग्राफ’ ने एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा किया है जिसने स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया के इस सबसे संवेदनशील क्षेत्र में पर्दे के पीछे एक बहुत ही खतरनाक खेल चल रहा है।
सुपरपावर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को एक ऐसी सलाह दे दी है, जो ईरान को सीधे तौर पर उकसाने और महायुद्ध की आग को भड़काने के समान है। ट्रंप प्रशासन के करीबी और पूर्व वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों के हवाले से जो जानकारी आई है, वह रोंगटे खड़े करने वाली है। वाशिंगटन ने अबू धाबी से स्पष्ट कहा है कि वे ईरान के रणनीतिक और आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण ‘लवान द्वीप’ पर कब्जा कर लें। अमेरिकी अधिकारियों की रणनीति यह है कि वे अपने सैनिकों को जमीन पर उतारने के बजाय यूएई की सेना का उपयोग करें। अमेरिकी हुक्मरानों का तर्क है कि ‘वहाँ जाकर कब्जा करो, मैदान में हमारे सैनिकों की जगह यूएई के योद्धा होने चाहिए।’ यह केवल एक बयान नहीं, बल्कि मिडिल ईस्ट का नक्शा बदलने की एक खतरनाक साजिश है।
लवान द्वीप की रणनीतिक अहमियत और अमेरिकी चाल
अब प्रश्न यह है कि आखिर यह लवान द्वीप क्या है और अमेरिका की नजरें इस पर क्यों टिकी हैं? लवान द्वीप फारस की खाड़ी में स्थित ईरान का एक प्रमुख एनर्जी हब है। यहाँ से ईरान का तेल और गैस का बड़ा कारोबार संचालित होता है। यदि इस द्वीप पर यूएई का कब्जा हो जाता है, तो ईरान की आर्थिक कमर पूरी तरह टूट जाएगी। अमेरिका स्वयं ईरान से सीधे टकराने के बजाय यूएई को मोहरे की तरह इस्तेमाल कर तेहरान को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम में मोड़ तब आया जब यह खबर सामने आई कि पिछले महीने के भीषण संघर्ष के दौरान सऊदी अरब और यूएई ने भी ईरान के महत्वपूर्ण ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया था। फरवरी के अंत में जब इजरायल और अमेरिका ने ईरान के विरुद्ध मोर्चा खोला, तब से यूएई सीधे तौर पर ईरान के निशाने पर आ गया है। ईरान ने इसे अपने विरुद्ध एक बड़ी साजिश करार दिया है।
यूएई पर ईरान के 2800 मिसाइल और ड्रोन हमले
ईरान ने यूएई को अमेरिकी और इजरायली खेमे का हिस्सा मानते हुए उस पर अब तक का सबसे भीषण हवाई हमला कर दिया है। आंकड़ों के अनुसार, ईरान ने यूएई की धरती पर 2800 से अधिक ड्रोन और मिसाइलें दागी हैं। इन हमलों ने अबू धाबी और दुबई जैसे आधुनिक शहरों की सुरक्षा को हिलाकर रख दिया है। ईरान का आरोप है कि यूएई उसके खिलाफ होने वाले हर हमले में सक्रिय भागीदारी निभा रहा है। हालाँकि, यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के प्रशासन ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि वह अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए किसी भी खतरे का माकूल जवाब देने का अधिकार रखता है।
इस स्थिति ने खाड़ी देशों के बीच के समीकरण बदल दिए हैं। जहाँ ईरान के साथ तनाव के कारण यूएई के संबंध अमेरिका और इजरायल से मजबूत हुए हैं, वहीं सऊदी अरब और कतर जैसे पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते नाजुक मोड़ पर हैं। ‘द टेलीग्राफ’ के अनुसार, यूएई ने सऊदी अरब और कतर से मदद मांगी थी, लेकिन उन्होंने इस लड़ाई में सीधे कूदने से साफ इनकार कर दिया, जिससे यूएई क्षेत्र में अकेला पड़ता दिख रहा है।
नेतन्याहू का सीक्रेट मिशन और ‘आयरन डोम’ की एंट्री
असली हलचल तब मची जब पता चला कि मार्च में ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ के दौरान इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने गोपनीय तरीके से यूएई का दौरा किया था। इस गुप्त बैठक में रक्षा और सुरक्षा को लेकर बड़े समझौते हुए। हालाँकि अबू धाबी ने इस दौरे से इनकार किया है, लेकिन विशेषज्ञ इसे सच मान रहे हैं।
इस डील का प्रमाण तब मिला जब अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी ने पुष्टि की कि इजरायल ने ईरानी हमलों से बचाने के लिए अपनी आधुनिक ‘आयरन डोम’ मिसाइल डिफेंस बैटरी अबू धाबी भेजी है। यह मिडिल ईस्ट के इतिहास में पहली बार है जब एक यहूदी राष्ट्र किसी अरब देश की सुरक्षा के लिए अपनी सर्वश्रेष्ठ सैन्य तकनीक तैनात कर रहा है।
रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट की शोधकर्ता डॉ. बर्कु ओज़सेलिक का मानना है कि इस जंग ने अमेरिका, इजरायल और यूएई के बीच त्रिकोणीय सैन्य तालमेल को तेज कर दिया है, लेकिन इससे एक बड़ा खतरा भी पैदा हुआ है। इजरायल के साथ इस खुले सैन्य सहयोग के कारण अन्य अरब देश यूएई को संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं।
खुफिया रिपोर्टों का दावा है कि यूएई ने अप्रैल की शुरुआत में लवान द्वीप सहित ईरान के कई ठिकानों को निशाना बनाया था। हालाँकि आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन तेहरान के तेवर बता रहे हैं कि चिंगारी भड़क चुकी है। अमेरिका की ‘अपने सैनिक बचाओ और सहयोगियों को आगे करो’ की नीति मिडिल ईस्ट को एक ऐसे मोड़ पर ले आई है जहाँ से वापसी कठिन है। अब देखना होगा कि क्या यूएई अमेरिकी उकसावे में आकर लवान द्वीप पर पूर्ण नियंत्रण का प्रयास करता है या शांति का कोई मार्ग निकलता है।

