UNSC चुनाव: जयशंकर की वो ‘चाणक्य नीति’ जिसने चीन और कॉफी क्लब के होश उड़ा दिए!

क्या दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और एक घोषित परमाणु शक्ति को रोकने के लिए किसी छोटे राष्ट्र को मोहरा बनाया जा सकता है? आखिर 57 देशों वाले एक शक्तिशाली इस्लामिक गुट ने अचानक भारत के खिलाफ एकजुट होने की गुप्त कसम क्यों खाई? यदि संयुक्त राष्ट्र के गलियारों में सक्रिय एक सीक्रेट ‘कॉफी क्लब’ पिछले तीस सालों से भारत, जापान और जर्मनी की राह रोक रहा है, तो विदेश मंत्री एस. जयशंकर खाड़ी देशों के बंद कमरों में कौन सी बिसात बिछा रहे हैं? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल, क्या भारत ने पश्चिमी देशों और चीन के लिए कोई ऐसा जाल बुना है कि यदि हमें वीटो पावर नहीं मिली, तो वैश्विक सप्लाई चेन संकट में पड़ जाएगी? आज हम उस कूटनीतिक चक्रव्यूह का विश्लेषण करेंगे, जो 2028-29 के सुरक्षा परिषद चुनाव के माध्यम से दुनिया का शक्ति संतुलन बदलने वाला है।

न्यूयॉर्क से दिल्ली: एक उभरती महाशक्ति का शंखनाद

न्यूयॉर्क में जब एस. जयशंकर ने आधिकारिक तौर पर भारत का अभियान शुरू किया, तो दुनिया ने इसे एक सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया माना। लेकिन भू-राजनीति के जानकार जानते हैं कि यह कोई साधारण दावेदारी नहीं है। यह एक उभरती महाशक्ति की वह दहाड़ है, जिसने स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब केवल ‘नियम मानने वाला’ (Rule Taker) नहीं, बल्कि ‘नियम बनाने वाला’ (Rule Maker) बनेगा। भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में 2028-29 के कार्यकाल के लिए अस्थाई सदस्यता के मैदान में है। प्रश्न यह है कि जो देश स्थाई सीट और वीटो की मांग कर रहा है, वह दो साल की अस्थाई सीट के लिए इतनी ऊर्जा क्यों लगा रहा है?

इसका उत्तर उस मास्टरप्लान में है जिसे भारत ने अत्यंत शांति से लागू करना शुरू किया है। यह अस्थाई सदस्यता भारत के लिए एक ‘ड्रेस रिहर्सल’ और ‘प्रेशर टैक्टिक’ दोनों है। भारत पहले भी आठ बार अस्थाई सदस्य रह चुका है, लेकिन इस नौवीं बार का चुनाव ऐतिहासिक है। जब दुनिया दो बड़े युद्धों की आग में झुलस रही है और यूएन मूकदर्शक बना है, तब भारत खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज के रूप में पेश कर रहा है। भारत यह सिद्ध करना चाहता है कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और जल्द ही तीसरी सबसे बड़ी इकॉनमी को बाहर रखकर कोई भी वैश्विक निर्णय सफल नहीं हो सकता।

ताजिकिस्तान का दांव और 57 देशों की चुनौती

इस बार की राह सरल नहीं है। जून 2027 में होने वाले चुनाव में एशिया-पैसिफिक ग्रुप की एक सीट के लिए भारत का सीधा मुकाबला ताजिकिस्तान से है। ताजिकिस्तान पहली बार यह चुनाव लड़ रहा है। कूटनीतिक अनुभव के आधार पर भारत का पलड़ा भारी है, लेकिन खेल तब पेचीदा हो गया जब ‘ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन’ (OIC) के 57 देशों ने ताजिकिस्तान को एकमुश्त समर्थन दे दिया।

वोटिंग के गणित को समझें तो यूएन महासभा में 193 देश हैं और जीत के लिए 129 वोटों (दो-तिहाई बहुमत) की आवश्यकता है। ताजिकिस्तान की रणनीति ओआईसी के 57 वोटों और पहली बार चुनाव लड़ने की सहानुभूति पर टिकी है। इसके पीछे पाकिस्तान की सक्रिय लॉबिंग है, जिसका एकमात्र उद्देश्य भारत को वैश्विक मंच पर रोकना है। यह एक ऐसा सुरक्षा खतरा और सीमा पार दबाव है जिसे भारत गंभीरता से ले रहा है।

यदि 57 देश एक साथ वोट करेंगे, तो भारत 129 का आंकड़ा कैसे छुएगा? यहीं से जयशंकर की ‘चाणक्य नीति’ शुरू होती है, जो इस मजबूत गुट को भीतर से ही प्रभावित कर रही है। भारत जानता है कि सीक्रेट बैलेट के दौरान कई इस्लामिक देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देंगे।

खाड़ी देशों में जयशंकर का मास्टरस्ट्रोक

यही कारण है कि जयशंकर ने द्विपक्षीय स्तर पर कतर, कुवैत, बहरीन, ओमान और यूएई जैसे देशों के साथ संपर्क तेज कर दिया है। भारत ने खाड़ी देशों को स्पष्ट कर दिया है कि उनकी आर्थिक प्रगति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा भारत के बिना संभव नहीं है। लाल सागर और अदन की खाड़ी के मौजूदा संकट ने इन अरब देशों को समझा दिया है कि उनकी सुरक्षा के लिए भारत एक अनिवार्य शक्ति है।

यहाँ भारत ने ‘मैरीटाइम सिक्योरिटी’ का सबसे बड़ा कार्ड खेला है। जयशंकर ने न्यूयॉर्क से दुनिया और पश्चिमी देशों को एक कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने ‘यूएनक्लॉस’ (UNCLOS) का उल्लेख करते हुए याद दिलाया कि दुनिया की सप्लाई चेन होर्मुज और मलक्का जलडमरूमध्य पर निर्भर है। जब मिडिल ईस्ट संकट के कारण वैश्विक ईंधन की कीमतें बढ़ने लगीं, तब भारतीय नौसेना ने ही अरब सागर में मोर्चा संभाला था।

भारत ने याद दिलाया कि हमारी नौसेना ने कई विदेशी जहाजों और नाविकों को बचाया है। यह संदेश था कि यदि आप भारत को निर्णय लेने वाली मेज पर नहीं बिठाएंगे, तो इंडो-पैसिफिक और अरब सागर में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आपकी होगी। भारत ने हकीकत दिखाई कि ताजिकिस्तान जैसा ‘लैंडलॉक्ड’ देश समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता। भारत की ‘ब्लू वाटर नेवी’ आज एक ऐसा रणनीतिक हथियार है जिसके सामने बड़ी शक्तियों को भी झुकना पड़ रहा है।

‘कॉफी क्लब’ का रहस्य और चीन का दोहरा खेल

भारत को स्थाई सीट न मिलने का एक बड़ा कारण यूएन का वो समूह है जिसे ‘कॉफी क्लब’ (यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस) कहा जाता है। 1990 के दशक में इटली के नेतृत्व में बना यह गुट भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील (G4) को स्थाई सदस्य बनने से रोकना चाहता है।

इस क्लब की जड़ें क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता में हैं। इटली नहीं चाहता कि जर्मनी आगे बढ़े, दक्षिण कोरिया जापान का विरोधी है, और पाकिस्तान का तो वजूद ही भारत के विरोध पर टिका है। इनका तर्क है कि स्थाई सीटें बढ़ने से तानाशाही बढ़ेगी, इसलिए केवल अस्थाई सीटें बढ़नी चाहिए। यह गुट यूएन सुधारों में सबसे बड़ा अवरोध है।

लेकिन असली खिलाड़ी चीन है। वह प्रत्यक्ष विरोध के बजाय ‘सर्वसम्मति’ जैसे मीठे शब्दों का प्रयोग करता है। चीन का कहना है कि सुधारों पर सबकी सहमति होनी चाहिए, जिसका अर्थ है कि जब तक पाकिस्तान या कॉफी क्लब सहमत नहीं होंगे, चीन वीटो का उपयोग कर किसी भी प्रस्ताव को रोके रखेगा। वह भारत को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने के लिए जापान का साथ छोड़ने का दबाव भी बनाता है।

वीटो पावर का त्याग और P5 की बेचैनी

इस गतिरोध को तोड़ने के लिए भारत और G4 देशों ने एक बड़ा प्रस्ताव रखा है: हमें स्थाई सीट दे दो, हम अगले 15 वर्षों तक वीटो पावर का उपयोग नहीं करेंगे। इस मास्टरस्ट्रोक ने चीन और पश्चिमी देशों के उस तर्क को खत्म कर दिया है कि वीटो पावर बांटने से फैसले लेना कठिन हो जाएगा।

इस प्रस्ताव के बाद फिनलैंड और मलेशिया जैसे देशों ने वीटो पावर की व्यवस्था को ही अनुचित बताना शुरू कर दिया है। फिनलैंड के राष्ट्रपति के अनुसार, 1945 की व्यवस्था आज की दुनिया पर नहीं थोपी जा सकती। अब अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के पास भारत को रोकने का कोई नैतिक आधार नहीं बचा है।

आज ब्रिटेन और फ्रांस की आर्थिक और सैन्य शक्ति भारत से कमतर होती जा रही है। वे भारत का समर्थन केवल इसलिए करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि चीन इसे रोक देगा, जिससे उनकी अपनी कुर्सी सुरक्षित रहेगी। यदि आज नए सिरे से सुरक्षा परिषद बने, तो शायद इन देशों को स्थाई सीट न मिले।

क्या भारत यूएन को ठप कर सकता है?

एक बड़ा प्रश्न उठता है: क्या होगा यदि भारत, जापान और जर्मनी अपनी शांति सेनाएं और फंडिंग वापस ले लें? क्या 80 साल पुराना यह ढांचा ढह जाएगा? यह एक ऐसा ‘न्यूक्लियर ऑप्शन’ है जिसकी चर्चा कूटनीतिक हलकों में होती है।

संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों की फंडिंग और सैनिकों पर चलता है। भारत दुनिया में सबसे अधिक शांति सैनिक भेजने वाले देशों में से एक है। यदि ये देश अपना समर्थन खींच लें, तो यूएन रातों-रात दिवालिया और पंगु हो जाएगा। P5 देश अकेले दुनिया के संघर्ष क्षेत्रों को नहीं संभाल पाएंगे और संस्था की साख समाप्त हो जाएगी।

हालांकि, भारत की रणनीति इतनी अपरिपक्व नहीं है। भारत जानता है कि मैदान छोड़ने पर चीन और पाकिस्तान उस स्थान को भर देंगे। भारत की छवि एक ‘विश्वमित्र’ की है, और भागना हमारी रणनीतिक सोच का हिस्सा नहीं है।

इंस्टीट्यूशनल बाईपास: नया विश्व क्रम

इसलिए भारत ने ‘इंस्टीट्यूशनल बाईपास’ का रास्ता चुना है। भारत अब यूएन को खत्म करने के बजाय उसे ‘अप्रासंगिक’ (Irrelevant) बना रहा है। जब ब्रिक्स+, क्वाड और जी20 जैसे मंचों पर दुनिया के महत्वपूर्ण फैसले होने लगेंगे, तो यूएन केवल एक चर्चा करने वाला क्लब बनकर रह जाएगा।

मोदी सरकार द्वारा ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करना इसी का हिस्सा है। जी20 में अफ्रीकी संघ को शामिल कराकर भारत ने 54 देशों का जो समर्थन प्राप्त किया है, वह यूएन में दो-तिहाई बहुमत दिलाने में सहायक होगा। भारत अब पी5 के सामने याचना नहीं कर रहा, बल्कि अपनी ‘हार्ड पावर’ का उपयोग कर रहा है।

कोई भी बड़ी डिफेंस डील या इकोनॉमिक कॉरिडोर भारत के विशाल बाजार के बिना अधूरा है। भारत का संदेश स्पष्ट है: हमारा बाजार आपके लिए तभी खुलेगा जब आप कूटनीतिक रूप से हमारे साथ खड़े होंगे। सप्लाई चेन, एआई और आतंकवाद जैसे वैश्विक मुद्दों पर भारत के बिना कोई नियम नहीं बन सकता।

जयशंकर का ‘SHANTI’ विजन इसी आक्रामक कूटनीति का भाग है। इसमें एआई खतरों और समुद्री रास्तों की सुरक्षा का जो एजेंडा है, वह सीधे तौर पर पश्चिमी देशों की जरूरतों से जुड़ा है। भारत कह रहा है कि हम आपकी समस्याएं सुलझा सकते हैं, लेकिन हमें फैसले लेने वाली टेबल पर जगह चाहिए।

2028-29 का चुनाव भारत के वैश्विक प्रभुत्व का नया अध्याय है। 129 वोट हासिल करके भारत उस पूरे इकोसिस्टम को ध्वस्त कर देगा जो उसे एक क्षेत्रीय शक्ति तक सीमित रखना चाहता है। दुनिया को अब यह तय करना है कि वे पुरानी व्यवस्था के साथ डूबना चाहते हैं या नए भारत के साथ नया विश्व क्रम बनाना चाहते हैं।

आपको क्या लगता है, क्या भारत का यह ‘इंस्टीट्यूशनल बाईपास’ वैश्विक गेम चेंजर साबित होगा? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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