कंगाली, कर्ज और बर्बादी का नया अध्याय
रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय (GHQ) से लेकर रियाद के शाही दरबार और तेहरान के सत्ता गलियारों तक एक ऐसी इनसाइडर रिपोर्ट आई है, जिसने वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। एक तरफ सऊदी अरब के पेट्रो-डॉलर की चमक है, तो दूसरी तरफ ईरान के बारूद की तपिश। इस खतरनाक त्रिकोण के बीच फंसा है पाकिस्तान, जिसने आर्थिक मदद की खातिर अपनी सेना को अरब शेखों के ‘किराये का बॉडीगार्ड’ बनाने का जोखिम भरा समझौता किया है। यह महज एक सामान्य रक्षा सौदा नहीं है, बल्कि एक मुल्क के उस गहरे दलदल में धंसने की कहानी है, जहाँ हर कदम तबाही की ओर जाता है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और जनरल असीम मुनीर ने बंद कमरों में सऊदी अरब के साथ उस गुप्त डील पर हस्ताक्षर किए हैं, जो पाकिस्तान का भू-राजनीतिक भविष्य बदल सकती है। स्थिति यह है कि यदि पाकिस्तान ईरान के विरुद्ध उतरा तो मुल्क जल उठेगा, और यदि सऊदी को इनकार किया तो देश कंगाल हो जाएगा।
मोदी डॉक्ट्रिन और डोभाल के चक्रव्यूह में उलझा पाकिस्तान
इस घटनाक्रम को समझने के लिए भारत की उस मौन मगर मारक रणनीति को समझना होगा, जिसने पाकिस्तान को पंगु बना दिया है। साल 2024 के चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कहा था कि भारत अब पाकिस्तान पर अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करेगा। वह दौर बीत गया जब पाकिस्तान आतंक की धमकी देता था; आज वहां की जनता एक बोरी आटे के लिए संघर्ष कर रही है। पीएम मोदी का यह बयान केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि भारत की ‘स्टेट पॉलिसी’ का स्पष्ट उद्घोष था। भारत ने विश्व पटल पर खुद को सेमीकंडक्टर, स्पेस और ग्लोबल सप्लाई चेन के केंद्र में स्थापित कर लिया है, जबकि पाकिस्तान अपनी ही कट्टरपंथी और आतंकी नीतियों के बोझ तले आंतरिक रूप से बिखर रहा है।
रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा है राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की ‘डिफेंसिव ऑफेंस’ (रक्षात्मक आक्रामकता) की नीति। डोभाल डॉक्ट्रिन का मूल मंत्र है कि शत्रु को युद्ध के बिना ही उसके अंतर्विरोधों में उलझा दो। डोभाल की वह चेतावनी आज भी रावलपिंडी के जनरल याद रखते हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘एक और मुंबई हमला हुआ, तो तुम बलूचिस्तान खो दोगे’। सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट के बाद भारत ने जो लक्ष्मण रेखा खींची, उसने पाकिस्तान के दुस्साहस को खौफ में बदल दिया। आज विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की आतंकी नीतियों की कलई खोल रहे हैं। भारत जहाँ अमेरिका और रूस के साथ भविष्य की तकनीक पर चर्चा कर रहा है, वहीं पाकिस्तान आईएमएफ की शर्तों के सामने नाक रगड़ने को मजबूर है।
सीक्रेट डील और हूतियों को सीधी चुनौती
भारत की सफल कूटनीति से अलग-थलग पड़ा पाकिस्तान अब अस्तित्व बचाने के लिए आत्मघाती दांव चल रहा है। शहबाज शरीफ और जनरल मुनीर की हालिया सऊदी यात्रा के दौरान एक गुप्त रक्षा समझौते पर सहमति बनी। इसके तुरंत बाद पाकिस्तान ने अचानक तेवर बदलते हुए ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों को चेतावनी दे दी कि सऊदी अरब पर कोई भी हमला पाकिस्तान के लिए ‘रेड लाइन’ होगा। यह बयान किसी संप्रभु देश की ताकत नहीं, बल्कि सऊदी के भारी-भरकम कर्ज के तले दबे एक लाचार मुल्क की मजबूरी को दर्शाता है।
मध्य-पूर्व के शक्ति संघर्ष में सऊदी अरब और ईरान एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं। यमन के हूती विद्रोही सीधे तौर पर ईरान के प्रभाव में हैं। पाकिस्तान ने हूतियों को ललकार कर सीधे ईरान से शत्रुता मोल ले ली है, ताकि रियाद से डॉलरों की आवक बनी रहे।
नजम सेठी का खुलासा: गृहयुद्ध की दस्तक
पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार नजम सेठी ने इस समझौते की सच्चाइयों को उजागर कर सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व को कटघरे में खड़ा किया है। सेठी के अनुसार, सऊदी अरब ने जो अरबों डॉलर की सहायता दी है, उसकी कीमत पाकिस्तानी सैनिकों के खून से चुकाई जानी है। सऊदी चाहता है कि यदि युद्ध छिड़ता है, तो पाकिस्तानी फौज उसके लिए ‘ऑन-ग्राउंड मर्सिनरी’ का काम करे और सीधे ईरान समर्थित बलों से मुकाबला करे। यहीं से पाकिस्तान के वजूद का सबसे बड़ा संकट शुरू होता है।
वर्तमान में पाकिस्तान की आम अवाम और हुकूमत के बीच गहरी खाई है। पाकिस्तान की जनता में अमेरिका विरोधी लहर तेज है और वे मध्य-पूर्व के संकट में ईरान के रुख के प्रति सहानुभूति रखते हैं। दूसरी ओर, शहबाज-मुनीर की जोड़ी का एकमात्र लक्ष्य सऊदी का पेट्रो-डॉलर और अमेरिका का समर्थन पाना है। देश दिवालिया होने की कगार पर है और जनता महंगाई से त्रस्त है। ऐसे में सेना को विदेशी युद्ध में झोंकना आग से खेलने जैसा है।
यदि पाकिस्तानी सेना सऊदी के आदेश पर ईरान या हूतियों के खिलाफ मोर्चा खोलती है, तो पाकिस्तान के भीतर भीषण गृहयुद्ध छिड़ सकता है। मुल्क की बड़ी शिया आबादी और सरकार विरोधी सुन्नी गुट सड़कों पर उतर आएंगे। महंगाई और बिजली के बिलों से परेशान जनता अपनी ही फौज के खिलाफ खड़ी हो जाएगी, जिससे देश को संभालना असंभव हो जाएगा।
नीलाम होती ‘भाड़े की फौज’
पाकिस्तानी सेना का यह इतिहास रहा है कि उसने खुद को एक ‘मर्सिनरी आर्मी’ (भाड़े की फौज) के रूप में इस्तेमाल होने दिया है। 1970 के ‘ब्लैक सितंबर’ से लेकर अफगान जिहाद और अमेरिका के ‘वॉर ऑन टेरर’ तक, पाकिस्तान ने चंद डॉलरों के लिए अपनी संप्रभुता का सौदा किया है। नजम सेठी ने कड़वी सच्चाई बयां की है कि पाकिस्तान की फौज और हथियार आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में नीलामी के लिए उपलब्ध हैं।
सऊदी अरब के साथ-साथ कुवैत भी अब पाकिस्तानी सुरक्षाबलों को भाड़े पर लेने की तैयारी में है। विडंबना देखिए, 2019 में जब भारत ने बालाकोट में आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया था, तब किसी भी इस्लामिक देश ने पाकिस्तान का साथ नहीं दिया। लेकिन आज जब सऊदी अरब के तेल के कुओं पर हूतियों का खतरा मंडरा रहा है, तो उन्हें पाकिस्तान की सेना एक ‘ढाल’ के रूप में याद आ रही है। इस सीक्रेट डील के साथ ही पाकिस्तान ने शायद अपने ही विनाश के वारंट पर दस्तखत कर दिए हैं।

