फर्नबोरो एयरशो का वह बंद कमरा एक ऐतिहासिक गवाह बना। एक तरफ वैश्विक एविएशन दिग्गज GE Aerospace का नेतृत्व था, तो दूसरी तरफ भारत के रक्षा अधिकारी। कमरे का तनाव साफ महसूस किया जा सकता था। महज 48 घंटों के भीतर, HAL प्रमुख ने GE के CEO को ऐसा अल्टीमेटम दिया कि सप्लाई चेन का बहाना बनाने वाली अमेरिकी कंपनी बैकफुट पर आ गई। आखिर क्या कारण था कि तेजस फाइटर जेट के इंजनों को रोककर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करने वाली लॉबी खुद ही फंस गई? क्या फ्रांस की Safran और ब्रिटेन की Rolls-Royce द्वारा इंजनों के 100% इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (IPR) देने के गुप्त प्रस्ताव ने GE के घमंड को तोड़ दिया? या फिर DRDO की प्रयोगशालाओं में तैयार हो रहा ‘कावेरी 2.0’ वह ब्रह्मास्त्र था जिसने वाशिंगटन की चिंता बढ़ा दी? आज हम ग्लोबल डिफेंस मार्केट के उस सच को उजागर करेंगे जिसे अक्सर दबाया जाता है। यह गाथा सिर्फ एक इंजन की नहीं, बल्कि एक सशक्त और आत्मनिर्भर भारत के उदय की है, जो अब अपनी शर्तों पर दुनिया से हाथ मिलाता है।
तेजस की उड़ान और अमेरिकी रणनीतिक चक्रव्यूह
इस भू-राजनीतिक खेल की पटकथा 2021 में लिखी गई थी, जब भारत ने 83 स्वदेशी तेजस Mk1A जेट्स के लिए 99 GE F404-IN20 इंजनों का सौदा किया। लगभग 5,375 करोड़ रुपये की यह डील कागजों पर शानदार थी, लेकिन जैसे ही तेजस ने वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बनानी शुरू की, अमेरिका की ओर से इंजनों की आपूर्ति ठप हो गई। हफ्तों और महीनों के इंतजार के बाद भी सिर्फ मुट्ठी भर इंजन ही भारत पहुंचे।
अमेरिका ने ‘सप्लाई चेन’ और ‘पार्ट्स की कमी’ जैसे रटे-रटाए बहाने बनाए, लेकिन भारतीय रणनीतिकारों को यह समझते देर नहीं लगी कि यह महज निर्माण में देरी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल थी।
तेजस Mk1A की क्षमता को समझना जरूरी है। 40-43 मिलियन डॉलर की कीमत वाला यह जेट रडार (AESA) और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम से लैस है। अमेरिकी वायुसेना के पूर्व प्रमुख जनरल डेविड गोल्डफेन ने भी इसकी प्रशंसा की थी। लेकिन यही तारीफ अमेरिकी रक्षा उद्योग के लिए खतरा बन गई।
यदि तेजस समय पर वैश्विक बाजार में उपलब्ध हो जाता, तो यह अर्जेन्टीना, मलेशिया और मिस्र जैसे देशों के लिए अमेरिका के महंगे F-16 या दक्षिण कोरिया के FA-50 का एक किफ़ायती विकल्प बन जाता। अमेरिकी मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स कभी नहीं चाहता था कि कोई गैर-पश्चिमी देश उनके रक्षा निर्यात के साम्राज्य को चुनौती दे।
यहीं से ‘स्लो पॉइजन’ की रणनीति शुरू हुई—इंजन सप्लाई इतनी धीमी कर दो कि तेजस प्रोग्राम पिछड़ जाए और भारत विदेशी जेट्स खरीदने के लिए मजबूर हो जाए। अमेरिका भारत को यह जताना चाहता था कि फाइटर जेट की ‘धड़कन’ यानी इंजन आज भी वाशिंगटन के नियंत्रण में है।
भारत का आक्रामक रुख और HAL का ‘मास्टरस्ट्रोक’
अमेरिका की सबसे बड़ी चूक यह रही कि उन्होंने इसे 90 के दशक का भारत समझ लिया। वर्तमान भारत का रक्षा दृष्टिकोण पूरी तरह बदल चुका है। जब GE ने देरी की, तो HAL ने ऐसा जवाब दिया जिसने पश्चिमी विशेषज्ञों को दंग कर दिया।
आमतौर पर इंजन न होने पर असेंबली लाइन रोक दी जाती है, लेकिन HAL ने उत्पादन की गति और बढ़ा दी। भारत ने बिना इंजनों के ही लगभग 30 तेजस Mk1A एयरफ्रेम तैयार कर स्टोरेज में सुरक्षित रख दिए।
बिना नए इंजन के टेस्टिंग के लिए भारत ने अपनी पुरानी ‘कैटेगरी-बी’ इंजनों की इन्वेंट्री का उपयोग किया और प्रारंभिक परीक्षण पूरे कर लिए। इसका अर्थ यह था कि जैसे ही नए इंजन आएंगे, उन्हें बस ‘प्लग एंड प्ले’ की तरह फिट करना होगा और जेट वायुसेना में शामिल होने के लिए तैयार होंगे। इस चाल ने अमेरिका के ‘प्रोग्राम डिले’ प्लान को ध्वस्त कर दिया।
इतना ही नहीं, भारत ने GE Aerospace पर भारी जुर्माना भी लगा दिया। वैश्विक बाजार में ऐसी पेनाल्टी किसी भी कंपनी की प्रतिष्ठा पर दाग की तरह होती है। GE के निवेशकों में हड़कंप मच गया और कंपनी को एहसास हुआ कि भारत जैसे बड़े बाजार को नजरअंदाज करना उसे महंगा पड़ेगा।
यूरोपीय देशों का प्रस्ताव और अमेरिका की घबराहट
अभी GE इस झटके से उबर ही रहा था कि भारत ने अपने भविष्य के 5th जनरेशन फाइटर (AMCA) के लिए रास्ते खोल दिए। AMCA के लिए भारत को अत्यधिक शक्तिशाली (110-130 kN) इंजनों की आवश्यकता है, और इसके लिए अरबों डॉलर का निवेश दांव पर है।
भारत ने संकेत दिया कि यदि अमेरिका पीछे हटता है, तो विकल्प मौजूद हैं। फ्रांस की Safran ने ‘फुल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर’ और इंजन के पूर्ण बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) देने की पेशकश कर दी। ब्रिटेन की Rolls-Royce ने भी इसी तरह का आकर्षक प्रस्ताव दिया।
इन प्रस्तावों ने वाशिंगटन में खतरे की घंटी बजा दी। अमेरिका को समझ आ गया कि अगर उसने अब लचीला रुख नहीं अपनाया, तो वह भारत के भविष्य के रक्षा बाजार से हमेशा के लिए बाहर हो सकता है।
कावेरी 2.0: भारत की आत्मनिर्भरता का प्रतीक
लेकिन असली कहानी भारत के अपने ‘कावेरी इंजन’ की है। जिस प्रोजेक्ट का कभी पश्चिमी मीडिया ने मजाक उड़ाया था, वह अब एक नई शक्ति के साथ वापस आया है।
1980 के दशक में शुरू हुए कावेरी प्रोजेक्ट को कई तकनीकी बाधाओं के बाद तेजस से अलग कर दिया गया था। लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी। 18 वर्षों के अथक प्रयास के बाद ‘कावेरी 2.0’ (ड्राय कावेरी) अब सफल परीक्षण के दौर में है।
इस इंजन ने 49-50 kN का थ्रस्ट हासिल कर लिया है और इसका वजन भी काफी कम किया गया है। इसका उपयोग भारत के घातक ‘UCAV’ (स्टेल्थ ड्रोन) में किया जाएगा, जो दुश्मन की सीमा में बिना रडार की पकड़ में आए हमला करने में सक्षम है।
अब लक्ष्य कावेरी 2.0 के आफ्टरबर्नर वेरिएंट के जरिए 90-100 kN का थ्रस्ट प्राप्त करना है। रक्षा मंत्रालय ने 2030 तक छठी पीढ़ी का इंजन तैयार करने का लक्ष्य रखा है।
निष्कर्ष यह है कि अमेरिका की देरी ने भारत को और अधिक आत्मनिर्भर बना दिया है। वह दिन दूर नहीं जब तेजस के हृदय में विदेशी GE इंजन की जगह भारत का अपना स्वदेशी ‘कावेरी’ धड़केगा। फर्नबोरो में GE की माफी इसी बदलते हुए वैश्विक शक्ति संतुलन का प्रमाण है।

