दुनिया भर में तीन दशकों तक सत्ता परिवर्तन और खुफिया अभियानों का नेतृत्व करने वाला सीआईए (CIA) का एक खूंखार रिटायर्ड मास्टरमाइंड, अचानक ढाका के एक आलीशान फाइव-स्टार होटल में क्यों छिपा है? क्या बांग्लादेश में शेख हसीना के जाने के बाद कोई ऐसी गुप्त योजना बनाई जा रही है जिसका मुख्य लक्ष्य भारत को अस्थिर करना है? एक तरफ भारतीय सीमा के नजदीक अमेरिकी सेना रहस्यमयी युद्धाभ्यास कर रही है, तो दूसरी तरफ बांग्लादेशी सेना प्रमुख तुर्की के साथ घातक ‘बायराक्तार ड्रोन’ की गुप्त डील फाइनल कर रहे हैं। आखिर तारिक रहमान की नई सरकार किस बड़े टकराव की तैयारी में है? इसी बीच, सुंदरबन के उन दुर्गम इलाकों में, जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता, भारत की बीएसएफ (BSF) रातों-रात 12 फुट ऊंची अभेद्य दीवार क्यों बना रही है? क्या ‘रॉ’ (R&AW) को सीमा पार से किसी बड़े घुसपैठ का इनपुट मिला है जिसने दिल्ली के गलियारों में हलचल तेज कर दी है?
ढाका के गुलशन इलाके के द वेस्टिन होटल में 25 जुलाई की सुबह एक हाई-प्रोफाइल एंट्री होती है। नाम है—जेराल्ड पी. हैमिल्टन। यह नाम खुफिया दुनिया में खौफ का दूसरा नाम है। हैमिल्टन ने सीआईए के ‘डायरेक्टरेट ऑफ ऑपरेशन्स’ में 35 साल बिताए हैं—यह वही विंग है जो विदेशी सरकारों को गिराने और अपने एजेंट प्लांट करने के लिए जानी जाती है। हैमिल्टन का ढाका आना और उनके आने की जानकारी का गुप्त रखा जाना कई बड़े सवाल खड़े करता है। सीआईए के पूर्व डायरेक्टर लियोन पैनेटा के करीबी रहे हैमिल्टन आखिर तारिक रहमान के कार्यकाल में बांग्लादेश में क्या खिचड़ी पका रहे हैं? क्या यह किसी नए ‘रीजनल गेम’ की शुरुआत है?
इस घटनाक्रम को समझने के लिए आपको शेख हसीना के उन आरोपों को याद करना होगा, जिसमें उन्होंने अमेरिका पर सेंट मार्टिन आइलैंड हथियाने का आरोप लगाया था। अगस्त 2024 में उनकी विदाई के बाद, अब लगता है कि अमेरिका बंगाल की खाड़ी में एक स्थाई सैन्य अड्डा बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। इसका मकसद एक साथ दो मोर्चों को साधना है—पहला चीन की घुसपैठ को रोकना और दूसरा भारत की ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ पर लगाम लगाना। हैमिल्टन का काम बांग्लादेशी प्रशासन और सेना के भीतर ऐसे वफादार तैयार करना है जो वाशिंगटन के इशारों पर चलें। सीमा के पास अमेरिकी सैन्य अभ्यास इसी व्यापक रणनीति का एक हिस्सा है, जो भारत की मध्यस्थता के बिना सीधे दक्षिण एशिया में दखल देने की कोशिश है।
लेकिन खतरा सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है; इस खेल में अब तुर्की की भी एंट्री हो चुकी है। बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमां का हालिया पांच दिवसीय तुर्की दौरा महज एक शिष्टाचार भेंट नहीं थी। वहां उन्होंने तुर्की की चोटी की आठ रक्षा कंपनियों के साथ गहन बैठकें कीं। यह दौरा पूरी तरह से ‘मिलिट्री हार्डवेयर’ की खरीदारी के लिए था, जिसमें दुनिया के सबसे घातक ड्रोन और मिसाइल सिस्टम शामिल थे।
तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान खुद को इस्लामिक जगत का नेता साबित करना चाहते हैं और कश्मीर मुद्दे पर हमेशा भारत के खिलाफ रहे हैं। अब तुर्की, पाकिस्तान के बाद बांग्लादेश को अपना नया सैन्य ठिकाना बनाने की कोशिश में है। ‘बायराक्तार टीबी-2’ (Bayraktar TB2) और ‘अकिंची’ जैसे ड्रोन्स की डील भारत के पूर्वी सेक्टर के लिए एक गंभीर सुरक्षा चुनौती बन सकती है। ये वही ड्रोन हैं जिन्होंने यूक्रेन और अजरबैजान की जंग में अपनी ताकत साबित की है। अगर ये ड्रोन भारतीय सीमा के पास तैनात होते हैं, तो यह भारत की चौकसी के लिए बड़ा खतरा होगा।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) मिलकर बांग्लादेश को एक ‘किलर बेस’ में तब्दील करना चाहते हैं। भारत का सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ चीन की नजर में पहले से ही है, और अब बांग्लादेश की तरफ से बढ़ता यह नया दबाव भारत के लिए ‘थ्री-फ्रंट वॉर’ जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। ढाका में पाकिस्तानी उच्चायोग की बढ़ती सक्रियता और आईएसआई के स्लीपर सेल्स का दोबारा जागना इस बात का संकेत है कि बारूद के ढेर पर चिंगारी सुलगा दी गई है।
हालांकि, भारत सरकार और खुफिया एजेंसियां इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए हैं। भारत ने इस चक्रव्यूह को काटने के लिए जमीनी और कूटनीतिक स्तर पर जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है, जिसका सबसे सटीक उदाहरण सुंदरबन में देखने को मिल रहा है।
सुंदरबन का दलदली इलाका और घने जंगल हमेशा से घुसपैठियों और तस्करों के लिए सुरक्षित रास्ता रहे हैं। भारत-बांग्लादेश की 4096 किलोमीटर लंबी सीमा का करीब 79% हिस्सा सील किया जा चुका है, लेकिन सुंदरबन के 174 किलोमीटर के इलाके में बाड़ लगाना नामुमकिन माना जाता था। इसी भौगोलिक बाधा का फायदा उठाकर सालों से अवैध घुसपैठ का खेल चल रहा था, जिसे अब मोदी सरकार ने जड़ से खत्म करने का फैसला लिया है।
भारत सरकार अब सुंदरबन के 90 किलोमीटर के दुर्गम क्षेत्र में 12 फुट ऊंची ‘स्मार्ट फेंसिंग’ लगा रही है। बीएसएफ के महानिदेशक प्रवीण कुमार ने खुद इस मेगा प्रोजेक्ट की समीक्षा की है। इस फेंसिंग में सिर्फ तार नहीं होंगे, बल्कि हाई-टेक सर्चलाइट, नाइट विजन कैमरे, लेजर वॉल और मरीन पेट्रोलिंग का एक ऐसा आधुनिक जाल होगा जिसे भेदना नामुमकिन होगा। पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों जैसे मुर्शिदाबाद और नादिया में यह काम युद्ध स्तर पर जारी है।
भारत के इस सख्त रुख का असर सीमा पर दिखने लगा है। हाल ही में बीएसएफ और बांग्लादेशी बीजीबी (BGB) के बीच तनाव की खबरें भी आईं। भारत अब रक्षात्मक मुद्रा से बाहर आकर आक्रामक हो गया है। दशकों से भारत में अवैध रूप से रह रहे घुसपैठियों को वापस खदेड़ने का एक ‘साइलेंट ऑपरेशन’ शुरू हो चुका है। भारत का संदेश स्पष्ट है—देश की जनसांख्यिकी (Demography) के साथ अब कोई खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
बांग्लादेश के भीतर भी एक खौफनाक खेल चल रहा है। ‘बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद’ की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 के पहले छह महीनों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की 257 घटनाएं हुई हैं। सैकड़ों लोग मारे गए हैं और हजारों परिवार डर के साए में जी रहे हैं। यह सिर्फ कट्टरपंथ नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘डेमोग्राफिक ट्रैप’ है।
अल्पसंख्यकों पर हमले कर उन्हें भारत की ओर भागने पर मजबूर करना एक युद्ध नीति का हिस्सा है। इससे भारत के सीमावर्ती राज्यों की अर्थव्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा पर दबाव पड़ता है। विदेशी ताकतें जानती हैं कि वे भारत को सीधे युद्ध में नहीं हरा सकतीं, इसलिए वे इस तरह के ‘इंटरनल अनरेस्ट’ पैदा करने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन भारत की नई बॉर्डर पॉलिसी इस साजिश को नाकाम करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
सीमा पर सख्ती के साथ-साथ मोदी सरकार ने कूटनीतिक मोर्चे पर भी एक बड़ा दांव खेला है। जब तारिक रहमान की सरकार ने भारत को नजरअंदाज कर चीन और मलेशिया का रुख किया, तो भारत ने कोई आक्रामक बयान देने के बजाय एक बेहद नपी-तुली चाल चली।
भारत ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान को ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में ‘विशेष अतिथि’ के तौर पर आमंत्रित किया है। यह निमंत्रण ढाका के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उलझन बन गया है। जो देश चीन और तुर्की के साथ मिलकर भारत विरोधी खेमे में खड़ा दिख रहा था, उसे भारत ने इतना बड़ा मंच देकर गेंद उसके पाले में डाल दी है।
इसे ‘स्टिक एंड कैरट’ (Stick and Carrot) की नीति कहा जाता है। बॉर्डर पर सख्ती ‘स्टिक’ है और ब्रिक्स का सम्मान ‘कैरट’। अगर तारिक रहमान दिल्ली आते हैं, तो उन्हें प्रधानमंत्री मोदी के साथ बैठकर भारत की चिंताओं पर चर्चा करनी होगी। यहीं भारत अपने सबसे बड़े कूटनीतिक हथियार का उपयोग करेगा।
यह हथियार है—1996 की ‘गंगा जल संधि’। इस संधि की अवधि दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है। गंगा का पानी बांग्लादेश की कृषि और अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन है। अगर बांग्लादेश भारत विरोधी गतिविधियों और अल्पसंख्यकों पर हमलों को नहीं रोकता, तो भारत इस संधि के नवीनीकरण पर कड़े फैसले ले सकता है। पानी का नियंत्रण एक ऐसा दबाव है जिसका मुकाबला न तो सीआईए कर सकती है और न ही तुर्की के ड्रोन।
भारत ने ढाका में अपने उच्चायोग की कमान अनुभवी दिनेश त्रिवेदी को सौंपी है, जो यह संकेत है कि अब बातचीत सिर्फ नौकरशाही के स्तर पर नहीं बल्कि राजनीतिक स्तर पर होगी। दोनों देशों के बीच पर्दे के पीछे बड़े समझौते की तैयारी चल रही है।
पूरी तस्वीर साफ है: सीआईए, तुर्की और पाकिस्तान मिलकर बांग्लादेश को भारत के खिलाफ एक नया मोर्चा बनाना चाहते हैं। उनका लक्ष्य भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक साख को चोट पहुंचाना है। बांग्लादेश इस ‘ग्रेट गेम’ में महज एक मोहरा बनकर रह गया है।
लेकिन भारत का जवाब भी उतना ही ठोस है। सुंदरबन की स्मार्ट फेंसिंग, घुसपैठ पर जीरो टॉलरेंस और गंगा जल संधि जैसे कूटनीतिक ब्रह्मास्त्र यह सुनिश्चित करेंगे कि भारत के राष्ट्रीय हितों के साथ कोई समझौता न हो। कोई भी महाशक्ति हमारे पड़ोस में आकर कितनी भी साजिशें क्यों न रच ले, भारत का रक्षा तंत्र हर चुनौती का जवाब देने में सक्षम है।
दिसंबर 2026 तक का समय दक्षिण एशिया की राजनीति के लिए निर्णायक होगा। क्या तारिक रहमान चीन-तुर्की के चंगुल से निकलकर भारत के साथ एक व्यावहारिक रिश्ता बनाएंगे, या फिर वे भी पाकिस्तान की तरह बर्बादी के रास्ते पर चलेंगे? यह वक्त ही बताएगा।
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