नेपाल में भारत का बड़ा कूटनीतिक दांव: रबी लामिछाने के भव्य स्वागत से ‘एंटी-इंडिया’ खेमे में खलबली!

नेपाल की राजनीति और हिमालय की वादियों में इस समय एक ऐसी खामोश कूटनीतिक हलचल मची है, जिसने उन शक्तियों की नींद हराम कर दी है जो भारत विरोध के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकते आए हैं। काठमांडू से लेकर नई दिल्ली तक के गलियारों में भारत के उस अचूक ‘डिप्लोमैटिक मास्टरस्ट्रोक’ की चर्चा है, जिसने बिना किसी शोर-शराबे के नेपाल की राजनीतिक बिसात को पलट दिया है। एक ओर जहां बालेन शाह जैसे कुछ नेता भारत के खिलाफ लगातार भड़काऊ बयानबाजी कर रहे थे, वहीं भारत ने एक ऐसा गंभीर कदम उठाया है जिसका गहरा असर दिखने लगा है। नई दिल्ली ने नेपाल के उस उभरते हुए व्यावहारिक नेता के लिए रेड कार्पेट बिछा दिया है, जो वर्तमान में नेपाल की युवा पीढ़ी के बीच बेहद लोकप्रिय है।

यहाँ बात हो रही है नेपाल की तेजी से बढ़ती ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ के अध्यक्ष रबी लामिछाने की। हाल ही में उनके भारत दौरे के दौरान जिस तरह से भारत सरकार, भाजपा और स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया, उसने वैश्विक कूटनीतिक हलकों को चकित कर दिया है। इसे ही ‘हाई-लेवल डिप्लोमेसी’ कहते हैं। जब आपका पड़ोसी देश का कोई नेता केवल घरेलू राजनीति चमकाने के लिए आपके विरुद्ध जहर उगले, तो आपको उसी के स्तर पर गिरने की जरूरत नहीं होती। आपको बस अपना विजन बड़ा रखना होता है और एक ऐसा दांव चलना होता है जो सीधे लक्ष्य पर लगे। भारत ने ठीक यही किया है।

लंबे समय से नेपाल की राजनीति का एक हिस्सा पुराने और घिसे-पिटे फार्मूले पर चल रहा था—जब भी घरेलू मोर्चे पर विफल हो, तो अपनी कुर्सी बचाने के लिए भारत को ‘विलेन’ बना दो। राष्ट्रवाद का यह फर्जी चोला पहनकर दशकों तक नेताओं ने जनता को गुमराह किया। हाल के सीमा विवाद और भारतीय भूमि पर दावों की बयानबाजी इसी सस्ती राजनीति का हिस्सा थी। लेकिन आज का दौर बदल चुका है। नेपाल का आधुनिक युवा अब इन पुरानी चालों को अच्छी तरह समझने लगा है।

नेपाल के युवाओं को अब अहसास हो गया है कि भारत विरोध से रोजगार नहीं मिलेगा। उन्हें नौकरियां, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, हाई-स्पीड इंटरनेट और ग्लोबल कनेक्टिविटी चाहिए। वे जानते हैं कि नेपाल का विकास भारत के मजबूत सहयोग के बिना संभव नहीं है। रबी लामिछाने की पार्टी इसी प्रगतिशील सोच का प्रतिनिधित्व करती है और भारत ने इसी आधुनिक सोच को वह सम्मान दिया है, जिसकी वह हकदार है।

भारत के इस कदम को नेपाल के अनुभवी विशेषज्ञ भी बहुत बारीकी से देख रहे हैं। भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत डॉ. शंकर शर्मा ने कहा है कि पीएम मोदी द्वारा रबी लामिछाने का गर्मजोशी से स्वागत करना नेपाल-भारत संबंधों में विश्वास की एक नई और मजबूत नींव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लामिछाने और उनके प्रतिनिधिमंडल के प्रति भारत का व्यवहार गहरे सहयोग और खुलेपन का एक बड़ा संकेत है।

डॉ. शर्मा का यह बयान उन नेताओं के लिए एक करारा जवाब है जो हर बात पर भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। पूर्व राजदूत ने नेपाल सरकार को सलाह दी है कि वह इसे कूटनीति के माध्यम से राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के अवसर के रूप में देखें। काठमांडू को चाहिए कि वह उन अटके हुए प्रोजेक्ट्स को गति दे, जिन्हें पिछली सरकारें अपनी विफलताओं के कारण पूरा नहीं कर पाई थीं।

इस पूरे घटनाक्रम से सबसे बड़ी बात यह निकलकर आती है कि संवेदनशील मुद्दों को कैसे सुलझाया जाए। सीमा विवाद या अन्य द्विपक्षीय चिंताओं को सड़कों पर चिल्लाकर या सोशल मीडिया स्टंट से हल नहीं किया जा सकता। डॉ. शर्मा का तर्क सही है कि ऐसे मामलों पर कूटनीतिक मेज पर चर्चा होनी चाहिए। कूटनीति का अर्थ ही यही है कि बंद कमरों में आधिकारिक चैनलों के जरिए बड़े से बड़े विवादों का समाधान निकाला जाए, न कि सार्वजनिक विवाद पैदा कर देश का अहित किया जाए।

रबी लामिछाने का यह दौरा भले ही पार्टी स्तर पर था, लेकिन दिल्ली में मिले सम्मान ने साबित कर दिया कि भारत नेपाल के नए नेतृत्व और वहां की जनता के साथ सीधा संवाद करना चाहता है। भारत किसी एक परिवार या पुरानी लीक पर चलने वाली राजनीति का मोहताज नहीं है। भारत हमेशा नेपाल का सबसे बड़ा शुभचिंतक रहा है।

आज समय आ गया है कि नेपाल खुद को ‘लैंड-लॉक्ड’ (भूमि से घिरा) देश की हीन भावना से निकालकर एक ‘लैंड-लिंक्ड’ देश के रूप में देखे। यह रास्ता भारत के विशाल आर्थिक इंजन से होकर जाता है। सच्चाई यह है कि नेपाल में सबसे अधिक निवेश भारतीय कंपनियों का है। जलविद्युत परियोजनाओं से लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर तक, भारतीय विशेषज्ञता नेपाल के काम आ रही है। भारत चाहता है कि नेपाल एक विकसित राष्ट्र बने और वहां के युवाओं को बेहतर अवसर मिलें।

भारत की इस कूटनीति ने स्पष्ट कर दिया है कि नई दिल्ली अब किसी की ब्लैकमेलिंग स्वीकार नहीं करेगी, लेकिन दोस्ती का हाथ बढ़ाने वालों के लिए उसके दरवाजे सदैव खुले हैं। बालेन शाह जैसे बड़बोले नेताओं को नजरअंदाज कर रबी लामिछाने जैसे विजनरी नेता को महत्व देना यह दर्शाता है कि भारत नेपाल के उज्जवल भविष्य के साथ खड़ा है।

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या भारत ने एंटी-इंडिया एजेंडा चलाने वालों को उन्हीं के घर में मात दे दी है? क्या रबी लामिछाने के जरिए नेपाल एक नए और बेहतर भविष्य की ओर बढ़ रहा है? अपनी राय हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं।

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