म्यांमार में अजीत डोभाल का मास्टरस्ट्रोक: भारत ने चीन के अरबों के ‘बेल्ट एंड रोड’ प्रोजेक्ट की हवा निकाली!

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और म्यांमार के एनएसए के बीच हुई उस गुप्त बैठक के पीछे क्या राज है, जिसने बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक हड़कंप मचा दिया है? आखिर वह कौन सी कूटनीतिक बिसात थी, जिसके कारण पिछले 6 सालों से अपनी शर्तों पर अड़ा म्यांमार रातों-रात सीमाएं खोलने और भारत की सामरिक शर्तें मानने पर राजी हो गया? क्या यह मुमकिन है कि बिना किसी शोर-शराबे के चीन के महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट को म्यांमार में पूरी तरह ठप कर दिया जाए? एक तरफ म्यांमार की सैन्य सरकार से गहरे राजनयिक संबंध और दूसरी तरफ पर्दे के पीछे स्थानीय गुटों के साथ सटीक रणनीति—आखिर म्यांमार के दुर्गम इलाकों में भारतीय एजेंसियां वह कौन सा खेल खेल रही हैं, जिसकी भनक ड्रैगन के जासूसों को भी नहीं लगी? भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को शेष भारत से काटने के चीन के पुराने सपने को ‘कलादान प्रोजेक्ट’ के जरिए कैसे नाकाम किया गया है? दशकों से चीनी हथियारों पर निर्भर रहने वाली म्यांमार की सेना अब भारतीय कोस्टल सर्विलांस रडार और मिसाइलों की मांग क्यों कर रही है? अगर आप इसे केवल व्यापार की शुरुआत मान रहे हैं, तो आप जियोपॉलिटिक्स के असली मास्टरस्ट्रोक को नहीं देख पा रहे हैं। भारत ने म्यांमार में वो चाल चली है, जो बंगाल की खाड़ी से चीन के प्रभुत्व को हमेशा के लिए समाप्त करने वाली है।

बिम्सटेक बैठक के दौरान की गई चर्चा महज एक औपचारिक भेंट नहीं थी, बल्कि यह भारत द्वारा पिछले एक दशक में तैयार की गई रणनीतिक बिसात का निर्णायक मोड़ था। भारत ने म्यांमार को चीन के कर्ज जाल से निकालकर अपने सुरक्षा तंत्र का हिस्सा बना लिया है। चीन, जो म्यांमार को अपना एक ‘क्लाइंट स्टेट’ मानता था, उसके लिए भारत की यह आक्रामक कूटनीति एक गहरा सदमा है। भारत ने बिना किसी वैश्विक शोर के म्यांमार के भीतर अपनी पकड़ मजबूत की है, 2020 से बंद पड़े सीमा व्यापार को बहाल किया है और रणनीतिक परियोजनाओं को गति दी है, जो सीधे तौर पर चीन को इस क्षेत्र से बाहर करने का एक फुल-प्रूफ ब्लूप्रिंट है।

इस पूरे परिदृश्य को समझने के लिए फ्लैशबैक में जाना जरूरी है। म्यांमार भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी का प्रवेश द्वार है। हमारे पूर्वोत्तर राज्यों—अरुणाचल, नगालैंड, मणिपुर और मिजोरम की 1,643 किमी लंबी सीमा म्यांमार से जुड़ी है। चीन इसी कमजोरी का फायदा उठाना चाहता था। वह एक तरफ म्यांमार सरकार को कर्ज और हथियार देता था, तो दूसरी तरफ वहां के विद्रोही गुटों को उकसाता था ताकि देश अस्थिर रहे और सिर्फ चीन पर निर्भर रहे। चीन का मुख्य लक्ष्य अपने ‘चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे’ के जरिए बंगाल की खाड़ी तक पहुंचना था ताकि ‘मलक्का डिलेमा’ (मलक्का जलडमरूमध्य का डर) से बचा जा सके। लेकिन भारत ने रक्षात्मक होने के बजाय ऑफेंसिव मोड अपनाकर चीन के इस समीकरण को बिगाड़ दिया है।

भारत की यह सफलता रातों-रात नहीं मिली। इसकी शुरुआत 2015 में हुई थी जब एनएसए अजीत डोभाल के नेतृत्व में भारतीय सेना ने म्यांमार सीमा के अंदर घुसकर उग्रवादी कैंपों को नष्ट किया था। यह म्यांमार की धरती पर नए भारत का शक्ति प्रदर्शन था। इसके बाद 2019 में ‘ऑपरेशन सनराइज’ के जरिए दोनों देशों की सेनाओं ने साझा कार्रवाई की। भारत ने म्यांमार को सैटेलाइट डेटा और इंटेलिजेंस सपोर्ट देकर यह साबित कर दिया कि वह एक भरोसेमंद सुरक्षा भागीदार है।

2021 के तख्तापलट के बाद जब पश्चिमी देशों ने म्यांमार पर प्रतिबंध लगाए, तब चीन को लगा कि अब वह म्यांमार का एकमात्र मालिक है। लेकिन भारत ने अपनी ‘प्रैग्मैटिक डिप्लोमेसी’ के तहत मानवीय और सामरिक संबंधों को जारी रखा। भारत ने म्यांमार सरकार के साथ-साथ सीमावर्ती विद्रोही गुटों के साथ भी संवाद के रास्ते खुले रखे ताकि कलादान और सितवे जैसे मेगा-प्रोजेक्ट्स सुरक्षित रहें। यही कारण है कि भारी आंतरिक संघर्ष के बावजूद भारतीय परियोजनाओं का काम नहीं रुका।

कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट प्रोजेक्ट केवल एक सड़क नहीं, बल्कि चीन के ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ का जवाब है। यह कोलकाता बंदरगाह को म्यांमार के सितवे पोर्ट और फिर मिजोरम से जोड़ता है। यह ‘चिकन नेक’ (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) पर भारत की निर्भरता कम करता है, जिसे चीन युद्ध की स्थिति में ब्लॉक करने की धमकी देता रहा है। इस नए मार्ग से कोलकाता से मिजोरम की दूरी 1000 किमी कम हो गई है, जो सामरिक दृष्टि से भारत की बहुत बड़ी बढ़त है।

सितवे डीप सी पोर्ट का नियंत्रण भारत के पास होना चीन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। चीन ने बंगाल की खाड़ी में दबाव बनाने के लिए क्याउकफ्यू पोर्ट बनाया था, लेकिन भारत ने ठीक बगल में सितवे पोर्ट पर अपना नियंत्रण और सर्विलांस सिस्टम स्थापित कर लिया है। अब भारतीय एजेंसियां वहां से चीनी नौसेना की हर हरकत पर पैनी नजर रखती हैं।

इसके साथ ही, भारत-म्यांमार-थाईलैंड ट्राइलेटरल हाईवे चीन के व्यापारिक एकाधिकार को सीधी चुनौती दे रहा है। जब दक्षिण-पूर्वी एशिया का माल सड़क मार्ग से सीधे भारत आने लगेगा, तो आसियान देशों की चीन पर निर्भरता कम होगी। ऊर्जा क्षेत्र में भी, श्वे गैस फील्ड में भारत की ओएनजीसी और गेल का भारी निवेश चीन के प्रभुत्व को चुनौती दे रहा है।

डिफेंस डिप्लोमेसी ने म्यांमार का झुकाव भारत की ओर पूरी तरह मोड़ दिया है। चीनी हथियारों की खराब गुणवत्ता से तंग आकर म्यांमार अब भारतीय सोनार सिस्टम, रडार, आर्टिलरी गन और टॉरपीडो को अपना रहा है। अजीत डोभाल ने म्यांमार को स्पष्ट कर दिया है कि 1600 किमी की बॉर्डर फेंसिंग का उद्देश्य अलगाव नहीं, बल्कि सुरक्षा और अवैध घुसपैठ रोकना है।

6 साल बाद सीमा व्यापार का फिर से शुरू होना इस बात का प्रमाण है कि म्यांमार में अब भारत का प्रभाव चीन से कहीं अधिक विश्वसनीय है। अजीत डोभाल की कूटनीति ने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखकर एक ऐसा संतुलन बनाया है जिसने चीन को बैकफुट पर धकेल दिया है। आज का भारत सीमाओं पर केवल सुरक्षा ही नहीं करता, बल्कि अपनी शर्तों पर वैश्विक बिसात बिछाता है। म्यांमार में यह जीत तो बस एक शुरुआत है।

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