INS Mahendragiri: समंदर का नया ‘बाहुबली’ जो रडार की नजरों से ओझल होकर उड़ा देगा दुश्मनों के होश

क्या आपने कभी यह सोचा है कि 6000 टन वजनी एक विशालकाय युद्धपोत समंदर की लहरों के बीच दुश्मन के आधुनिक रडार की नजरों से कैसे गायब हो सकता है? कल्पना कीजिए कि रडार की स्क्रीन पर यह विनाशकारी वॉरशिप किसी बड़ी जंग का हिस्सा दिखने के बजाय सिर्फ एक मामूली मछली पकड़ने वाली नाव जैसा नजर आए। 11 जुलाई की ऐतिहासिक घड़ी में जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस नए युद्धपोत को सक्रिय किया, तो मलक्का जलडमरूमध्य से लेकर अरब सागर तक चीन के 70% तेल व्यापार पर एक अदृश्य खतरा मंडराने लगा। आखिर पाकिस्तान की नौसेना ने अचानक रेड अलर्ट जारी कर अपनी पनडुब्बियों को बेस पर वापस क्यों बुला लिया? इस युद्धपोत के भीतर ऐसा कौन सा घातक सोनार और टॉरपीडो सिस्टम लगा है जो पड़ोसी देशों के सैन्य अधिकारियों की नींद उड़ा रहा है? क्या आज के आधुनिक दौर में बिना किसी कप्तान के भी समंदर की लहरों पर जंग जीतना मुमकिन है?

यही वह हकीकत है जिसने चीन और पाकिस्तान के रक्षा गलियारों में रणनीतिक हलचल पैदा कर दी है। आज हम उस गुप्त मास्टर प्लान की चर्चा कर रहे हैं जिसे अब तक दुनिया से छिपा कर रखा गया था। भारतीय नौसेना का यह नया और अपराजेय योद्धा है— आईएनएस महेंद्रगिरि (INS Mahendragiri)।

भारतीय नौसेना के इतिहास में 11 जुलाई की तारीख एक बड़े बदलाव का संकेत है। आईएनएस महेंद्रगिरि का नौसेना में शामिल होना केवल एक नियमित खबर नहीं है, बल्कि यह एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल है जिससे दुश्मन अब चारों ओर से घिर चुके हैं। प्रोजेक्ट 17A के तहत विकसित यह सातवां स्वदेशी स्टेल्थ फ्रिगेट सिर्फ धातु और हथियारों का मेल नहीं है, बल्कि यह पूर्वी घाट की महेंद्रगिरि पहाड़ियों की तरह भारत की अडिग शक्ति का प्रतीक है।

भारत जिस तेजी से अपनी समुद्री शक्ति का विस्तार कर रहा है, वह वैश्विक नौसेनाओं के लिए एक शोध का विषय बन चुका है। भारतीय गोदी (Dockyards) में वर्तमान में 40 से अधिक आधुनिक युद्धपोत निर्माणाधीन हैं। यह केवल जहाजों की संख्या बढ़ाने का प्रयास नहीं है, बल्कि भारतीय नौसेना को एक आक्रामक ‘ब्लू वाटर नेवी’ के रूप में स्थापित करने की योजना है। यह सीधे तौर पर चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति का जवाब है। चूँकि दुनिया का अधिकांश व्यापार हिंद महासागर के जरिए होता है, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जो इस क्षेत्र पर नियंत्रण रखेगा, वही वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करेगा। महेंद्रगिरि के साथ भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस क्षेत्र का असली रक्षक कौन है।

आईएनएस महेंद्रगिरि को जो चीज सबसे अधिक घातक बनाती है, वह है इसका एडवांस स्टेल्थ प्रोफाइल। इसमें एक विशेष रडार-एब्जॉर्बिंग पेंट कोटिंग का उपयोग किया गया है। इसकी ज्यामितीय बनावट ऐसी है कि यह रडार सिग्नल्स को या तो सोख लेती है या उन्हें इस तरह बिखेर देती है कि जहाज की स्थिति का सही पता नहीं चल पाता।

इसके अलावा, इसके इंजनों से उत्पन्न होने वाली गर्मी को एक अत्याधुनिक थर्मल कूलिंग सिस्टम के जरिए ठंडा किया जाता है, जिससे दुश्मन की हीट-सीकिंग मिसाइलें इसे ट्रैक नहीं कर पातीं। पानी के भीतर यह किसी शांत शिकारी की तरह काम करता है। इसके गैस टर्बाइन इंजनों में प्रयुक्त अकॉस्टिक माउंट्स तकनीक इसे इतना खामोश रखती है कि यह बिना किसी शोर के दुश्मन की पनडुब्बियों के करीब पहुंच सकता है।

महेंद्रगिरि का डिजिटल मस्तिष्क, CMS-17A कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम, एक शक्तिशाली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है। यह इंसानी आदेशों की प्रतीक्षा किए बिना खतरों को भांपकर तत्काल निर्णय ले सकता है। इसका MF-STAR रडार 450 किलोमीटर की दूरी से ही किसी भी मिसाइल या ड्रोन की पहचान कर लेता है। यह एआई सिस्टम माइक्रोसेकंड्स के भीतर तय करता है कि किस खतरे को किस हथियार से नष्ट करना है।

यदि कभी दुश्मन की नौसेना इसे घेरने का प्रयास करे, तो इसका वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (VLS) तुरंत सक्रिय हो जाता है, जिसमें 8 ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें तैनात हैं। ध्वनि की गति से तीन गुना तेज चलने वाली ब्रह्मोस मिसाइल को दुनिया का कोई भी एयर डिफेंस सिस्टम फिलहाल नहीं रोक सकता। इसकी शक्ति किसी भी बड़े जहाज को पल भर में ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त है।

हवाई हमलों से बचाव के लिए इसमें 32 बराक-8 मिसाइलें लगाई गई हैं, जो 100 किलोमीटर दूर से ही दुश्मन के विमानों को नष्ट कर सकती हैं। अत्यंत निकट आने वाले खतरों के लिए 76 एमएम की सुपर रैपिड गन और AK-630 सिस्टम मौजूद हैं। वहीं, समुद्र के भीतर छिपे खतरों के लिए ‘वरुणास्त्र’ टॉरपीडो और RBU-6000 रॉकेट लॉन्चर इसे एक अभेद्य किला बनाते हैं।

पाकिस्तान के पास मौजूद चीनी युद्धपोतों की तुलना में महेंद्रगिरि की तकनीक कहीं अधिक उन्नत है। जहां पाकिस्तानी मिसाइल डिफेंस की रेंज सीमित है, वहीं महेंद्रगिरि सुरक्षित दूरी से ही पूरे बेड़े को निशाना बनाने में सक्षम है। ब्रह्मोस जैसी मिसाइल का मुकाबला करना फिलहाल पाकिस्तान की नौसेना के बस की बात नहीं है।

सबसे बड़ी बात यह है कि महेंद्रगिरि 75% से अधिक स्वदेशी है। युद्ध की स्थिति में भारत किसी बाहरी मदद के बिना इसे लंबे समय तक संचालित कर सकता है, जबकि पाकिस्तान को हर पुर्जे के लिए चीन पर निर्भर रहना पड़ेगा। इसका ‘हुमसा-एनजी’ सोनार दुश्मन की पनडुब्बियों को काफी पहले ही ट्रैक कर लेता है।

यह तो केवल शुरुआत है। भारत अब ‘प्रोजेक्ट-18’ के तहत 13,000 टन के नेक्स्ट-जेनरेशन डिस्ट्रॉयर्स पर काम कर रहा है, जो लेजर हथियारों और हाइपरसोनिक मिसाइलों से लैस होंगे।

वहीं ‘प्रोजेक्ट 75 अल्फा’ के तहत छह परमाणु संचालित पनडुब्बियां (SSNs) और 65,000 टन का तीसरा विमानवाहक पोत ‘आईएनएस विशाल’ भी पाइपलाइन में है। यह पूरी फौज समंदर में भारत के आधिपत्य को सुनिश्चित करेगी।

भारत अब केवल अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं कर रहा, बल्कि एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। मलक्का से लेकर स्वेज तक, भारत का दबदबा बढ़ रहा है। चीन और पाकिस्तान के लिए अब समंदर में कोई भी हिमाकत करना महंगा पड़ेगा, क्योंकि महेंद्रगिरि जैसे शिकारी अब लहरों पर पहरा दे रहे हैं।

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