पीएम मोदी का महा-मास्टरस्ट्रोक: यूएई के साथ हुई ऐतिहासिक डील, भारत के खिलाफ रची गई हर अंतरराष्ट्रीय साजिश नाकाम!

वर्तमान में वैश्विक महाशक्तियां पर्दे के पीछे से भारत की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने के लिए एक खतरनाक चक्रव्यूह तैयार कर रही हैं। मध्य पूर्व में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में अस्थिरता का माहौल है और वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह लड़खड़ा गई है। इस पूरी साजिश का मुख्य केंद्र भारत की तेल आपूर्ति को बाधित करना है। जिस समय भारत में ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन को लेकर हलचल तेज थी, उसी दौरान अमेरिकी नेतृत्व और चीन के बीच की बढ़ती निकटता ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नए सवाल खड़े कर दिए। महाशक्तियों की यह जुगलबंदी सीधे तौर पर भारत की आर्थिक स्थिरता और सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रही थी।

हालांकि, भारत को घेरने की कोशिश करने वाली शक्तियों को शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरगामी कूटनीति का अंदाजा नहीं था। वैश्विक ईंधन संकट की आहट मिलते ही पीएम मोदी ने देश के भीतर रणनीतिक कदम उठाए, लेकिन असली जवाबी कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर की गई। बिना किसी बड़े शोर-शराबे के, पीएम मोदी दुनिया के पांच सबसे महत्वपूर्ण देशों की रणनीतिक यात्रा पर निकल पड़े। इस हाई-प्रोफाइल विदेशी दौरे का मुख्य उद्देश्य भारत के आर्थिक हितों की रक्षा करना और वैश्विक इकॉनमी के खेल को भारत के पक्ष में मोड़ना है।

इस पांच देशों के दौरे का सबसे प्रभावशाली परिणाम संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में देखने को मिला है। पीएम मोदी के यूएई पहुंचते ही एक ऐसी महाशक्तिशाली डील पर मुहर लगी है, जिसने वैश्विक राजनीति के धुरंधरों को चौंका दिया है। ऊर्जा सुरक्षा को लेकर यूएई ने भारत के लिए अपने खजाने के द्वार खोल दिए हैं। यह ऐतिहासिक समझौता न केवल भारत की तेल जरूरतों को सुरक्षित करेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के बढ़ते कद का प्रमाण भी है।

ग्लोबल ट्रेड के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) एक अत्यंत संवेदनशील मार्ग है। यदि यह मार्ग किसी युद्ध के कारण बंद भी हो जाता है, तब भी भारत के पास तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित रहेगी। यूएई के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन जायद ने एक क्रांतिकारी घोषणा करते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी निर्भरता को समाप्त करने का निर्णय लिया है। यूएई अब अपने फुजेराह पोर्ट के माध्यम से एक विशाल और आधुनिक तेल पाइपलाइन परियोजना को युद्धस्तर पर पूरा करने जा रहा है, जो सीधे भारत जैसे देशों को लाभ पहुंचाएगी।

इस महापरियोजना का सीधा अर्थ यह है कि मिडिल ईस्ट में किसी भी प्रकार के तनाव या युद्ध के बावजूद, भारत के लिए गैस और तेल की आपूर्ति कतई प्रभावित नहीं होगी। अबू धाबी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि इस पाइपलाइन का निर्माण ‘फास्ट ट्रैक’ मोड पर किया जाएगा। क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने इस परियोजना को लेकर एडनॉक (ADNOC) के साथ एक उच्च-स्तरीय बैठक की है, जिसका एकमात्र एजेंडा इस पाइपलाइन को जल्द से जल्द क्रियान्वित करना है।

यह पाइपलाइन होर्मुज जलडमरूमध्य को बाईपास करते हुए अबू धाबी के मुख्य तेल भंडारों को सीधे ओमान की खाड़ी से जोड़ देगी। लक्ष्य यह है कि साल 2027 तक इसे पूरी तरह चालू कर दिया जाए। इसके क्रियान्वित होते ही यूएई की निर्यात क्षमता दोगुनी हो जाएगी, जो भारत की भविष्य की ऊर्जा मांगों के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच की तरह काम करेगी।

इस प्रोजेक्ट की आवश्यकता ईरान और यूएई के बीच बढ़ते रणनीतिक संघर्ष के कारण महसूस की गई। समुद्री मार्गों पर हमलों के डर से यूएई को सड़क मार्ग से तेल की आपूर्ति करनी पड़ रही थी, जो भारत जैसे बड़े बाजार के लिए पर्याप्त नहीं था। इसी खतरे को देखते हुए फुजेराह पाइपलाइन प्रोजेक्ट को प्राथमिकता दी गई, जो ईरान के प्रभाव क्षेत्र से बाहर है और सुरक्षित है।

पीएम मोदी और यूएई के राष्ट्रपति के बीच हुई यह वार्ता इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखी जाएगी। मोदी ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों का खुला और सुरक्षित रहना पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है। भारत ने जोर देकर कहा कि किसी भी देश की दादागिरी वैश्विक सप्लाई चेन को बंधक नहीं बना सकती और इस रुख को यूएई का पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ।

यह कूटनीतिक जीत तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब हम देखते हैं कि मार्च 2026 से ही होर्मुज का मार्ग संकटों से घिरा हुआ है। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी भारत ने अपनी कुशल डिप्लोमेसी के जरिए अपने जहाजों को सुरक्षित निकाला है। लेकिन अब भारत किसी की अनुमति पर निर्भर रहने के बजाय खुद को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर और सुरक्षित बना रहा है।

यूएई ने एक और चौंकाने वाला कदम उठाते हुए ओपेक (OPEC) की पाबंदियों से हटकर उत्पादन बढ़ाने का निर्णय लिया है। 2027 तक प्रतिदिन 50 लाख बैरल तेल उत्पादन का लक्ष्य भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में निर्णायक साबित होगा। यह कदम वैश्विक तेल राजनीति में एक नया संतुलन पैदा करेगा।

अंततः, पीएम मोदी की इस कूटनीति ने आपदा को अवसर में बदल दिया है। फुजेराह पाइपलाइन भारत और यूएई के अटूट संबंधों का प्रतीक है। ऊर्जा के मोर्चे पर भारत अब पहले से कहीं अधिक सुरक्षित है। यूएई तो केवल इस पांच देशों की यात्रा का पहला पड़ाव था; आगे आने वाले समझौतों से दुनिया को भारत की असली शक्ति का एहसास होना अभी बाकी है।

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