फिलीपींस के बाद अब थाईलैंड, और कतार में यूएई, इंडोनेशिया और सऊदी अरब जैसे देश खड़े हैं। आखिर दुनिया के 17 देश अचानक भारत की दहलीज पर क्यों आए हैं? जो थाईलैंड वर्षों से चीनी हथियारों का खरीदार था और जिसकी अर्थव्यवस्था चीन पर टिकी है, उसे अचानक भारत की 3700 किमी/घंटा की रफ्तार वाली ब्रह्मोस की जरूरत क्यों पड़ी? बैंकॉक भले ही इसे चीन के खिलाफ न बताए, लेकिन समुद्र के भीतर यह ‘किलर मिसाइल’ किसके लिए तैनात हो रही है? क्या दक्षिण-पूर्व एशिया में किसी बड़े युद्ध की सुगबुगाहट है? ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज मिसाइल तो है ही, लेकिन इसके पीछे समुद्र का वह ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ चल रहा है जिसे मुख्यधारा का मीडिया नहीं दिखा रहा। जो चीन अमेरिका के F-35 की कॉपी कर J-20 बना सकता है, वह भारत की इस मिसाइल के सामने क्यों बेबस है? आखिर इस मिसाइल के भीतर वह कौन सा गुप्त सॉफ्टवेयर और सीक्रेट फॉर्मूला है जिसे ड्रैगन चाहकर भी डिकोड नहीं कर सकता? डीआरडीओ ने गोदरेज और सोलर इंडस्ट्रीज जैसी निजी कंपनियों के साथ मिलकर कैसे 13% स्वदेशी मिसाइल को 80% स्वदेशी बनाकर 40 हजार करोड़ का इकोसिस्टम खड़ा कर दिया?
आज हम ब्रह्मोस के उन रहस्यों को डिकोड करेंगे जिसने बीजिंग से वाशिंगटन तक खलबली मचा दी है। दुनिया की ज्यादातर क्रूज मिसाइलें, जैसे अमेरिका की टॉमहॉक, ‘सबसोनिक’ होती हैं जो आवाज की गति से कम रफ्तार पर उड़ती हैं। इन्हें आधुनिक रडार आसानी से पकड़ लेते हैं। लेकिन ब्रह्मोस एक ‘सुपरसोनिक’ मिसाइल है जो Mach 3 की भयंकर गति से उड़ती है। 3000 किलो का यह ढांचा जब इस प्रचंड वेग से टकराता है, तो इसकी काइनेटिक ऊर्जा दुश्मन के विशाल युद्धपोत को बारूद के बिना भी दो टुकड़ों में चीर सकती है।
दुश्मन के जहाजों पर मिसाइलों को रोकने के लिए तैनात सीआईडब्ल्यूएस (CIWS) सिस्टम ब्रह्मोस के सामने फेल हो जाते हैं। ब्रह्मोस समुद्र की लहरों से मात्र 5-10 मीटर ऊपर उड़ती है, जिसे ‘सी-स्किमिंग’ कहते हैं। पृथ्वी की गोलाई के कारण रडार इसे तब तक नहीं देख पाते जब तक यह लक्ष्य के बिल्कुल करीब न पहुंच जाए। इसके बाद शुरू होता है इसका ‘एस-मैन्यूवर’। टकराने से ठीक पहले यह अंग्रेजी के ‘S’ आकार में अपनी दिशा बदलती है, जिससे दुश्मन का कंप्यूटर इसकी सटीक लोकेशन कैलकुलेट नहीं कर पाता। अंत में, यह 90 डिग्री के कोण पर ‘स्टीप डाइव’ लगाकर जहाज के सबसे कमजोर हिस्से यानी डेक को तबाह कर देती है।
चीन ब्रह्मोस की रिवर्स इंजीनियरिंग क्यों नहीं कर पा रहा? विशेषज्ञों का मानना है कि मिसाइल का ढांचा कॉपी करना आसान है, लेकिन उसका ‘दिमाग’ यानी नेविगेशन सिस्टम (G3OM) डिकोड करना नामुमकिन है। यह भारतीय नाविक सैटेलाइट और मिलिट्री-ग्रेड एन्क्रिप्शन से सुरक्षित है। अगर कोई इसे हैक करने की कोशिश करे, तो सिस्टम खुद ही अपना डेटा नष्ट कर देता है। इसका ‘रडार सीकर’ तकनीक इतनी उन्नत है कि यह घनी आबादी के बीच भी सही लक्ष्य को पहचान लेती है।
सॉफ्टवेयर के अलावा इसकी ‘मेटलर्जी’ (धातु विज्ञान) भी एक बड़ी चुनौती है। Mach 3 की गति पर घर्षण से मिसाइल का तापमान इतना बढ़ जाता है कि आम धातु पिघल जाए। पुणे की FWT कंपनी ने इसके लिए विशेष ‘फ्रिक्शन वेल्डिंग’ तकनीक विकसित की है, जो दो अलग-अलग तापमान पर पिघलने वाली धातुओं को बिना आग के जोड़ देती है। इसके अलावा, इसका लिक्विड रैमजेट इंजन रूस का एक ऐसा रहस्य है जिसकी नकल चीन आज तक नहीं कर पाया। बिना सटीक डिजाइन पैरामीटर के, चीन की बनाई नकल Mach 3 की गति पर खुद ही फट जाएगी।
ब्रह्मोस का सफर किसी थ्रिलर फिल्म जैसा है। 1998 में एमटीसीआर (MTCR) संधि की पाबंदियों के कारण इसकी रेंज 290 किमी तक सीमित रखनी पड़ी थी। लेकिन 2016 में जब भारत एमटीसीआर का सदस्य बना, तो ये जंजीरें टूट गईं। भारतीय वैज्ञानिकों ने मिसाइल का आकार बदले बिना केवल सॉफ्टवेयर और क्रूजिंग ऑल्टिट्यूड (ऊंचाई) में बदलाव कर इसकी मारक क्षमता को बढ़ा दिया।
आज ब्रह्मोस-ER (Extended Range) 450 से 500 किमी तक वार कर सकती है। सुखोई Su-30MKI से दागे जाने पर यह 800 किमी दूर दुश्मन के ठिकानों को मलबे में तब्दील कर सकती है। अब भारत 1500 किमी की मारक क्षमता वाली ब्रह्मोस पर काम कर रहा है, जिसमें टू-वे डेटा लिंक और उन्नत थर्मल कोटिंग का इस्तेमाल होगा।
ब्रह्मोस की सफलता के पीछे 200 से अधिक भारतीय कंपनियों का हाथ है। गोदरेज एयरोस्पेस इसके विंग्स और नोज कैप बनाती है, तो लार्सन एंड टूब्रो (L&T) इसके मोबाइल लॉन्च सिस्टम तैयार करती है। चेन्नई की डेटा पैटर्न्स कंपनी इसका ‘फायर कंट्रोल सिस्टम’ बनाती है, जो मिसाइल का मुख्य नियंत्रण केंद्र है।
नागपुर की सोलर इंडस्ट्रीज ने इसमें ऐतिहासिक योगदान दिया है। मिसाइल को शुरुआती धक्का देने वाला सॉलिड बूस्टर और विनाशकारी वारहेड अब भारत में ही बन रहे हैं। इसी निजी भागीदारी के कारण आज भारत फिलीपींस जैसे देशों को समय पर डिलीवरी दे पा रहा है। हैदराबाद के इंटीग्रेशन कॉम्प्लेक्स में इन सभी हिस्सों को जोड़कर अंतिम मिसाइल तैयार की जाती है।
ब्रह्मोस को ‘जीरो मेंटेनेंस’ वाले ट्रांसपोर्ट लॉन्च कैनिस्टर (TLC) में रखा जाता है। इसके भीतर सूखी नाइट्रोजन गैस भरी होती है जो इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजन को नमी से बचाती है। यह मिसाइल 10-15 साल तक बिना किसी सर्विस के युद्ध के लिए तैयार रहती है। भारत ने इसे सीमाओं पर अंडरग्राउंड साइलो और नेवल डिपो में सुरक्षित तैनात कर रखा है।
आर्थिक नजरिए से भी ब्रह्मोस बेजोड़ है। इसकी एक यूनिट करीब 3.5 से 5 मिलियन डॉलर की पड़ती है, जो अमेरिकी टॉमहॉक के बराबर है, लेकिन इसकी मारक क्षमता उससे कहीं अधिक है। इसका ‘कॉस्ट टू किल रेशियो’ दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है। 4 मिलियन डॉलर की एक मिसाइल 1 अरब डॉलर के दुश्मन जहाज को डुबोने की ताकत रखती है।
फिलीपींस को 2024 में पहली डिलीवरी मिल चुकी है। इंडोनेशिया और वियतनाम के साथ भी करोड़ों डॉलर के सौदे पाइपलाइन में हैं। थाईलैंड जैसा देश, जो चीन का करीबी है, वह भी अपनी समुद्री सीमाओं की रक्षा के लिए ब्रह्मोस का मूल्यांकन कर रहा है। यह भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ की बड़ी जीत है। आने वाले वर्षों में भारत रक्षा निर्यात से 2 बिलियन डॉलर से अधिक की विदेशी मुद्रा कमा सकता है।
भारत का अगला लक्ष्य ब्रह्मोस-NG (Next Generation) है। यह वर्तमान मिसाइल से आधी वजन की होगी, जिससे इसे तेजस जैसे हल्के लड़ाकू विमानों से भी दागा जा सकेगा। लखनऊ के नए डिफेंस कॉरिडोर में इसका उत्पादन शुरू होने वाला है, जो भारत की मारक क्षमता को और बढ़ा देगा।
सबसे बड़ा खतरा ब्रह्मोस-2 है, जो एक हाइपरसोनिक मिसाइल होगी। इसकी गति Mach 7 से Mach 8 के बीच होगी। इतनी तेज रफ्तार पर मिसाइल के चारों ओर ‘प्लाज्मा क्लाउड’ बन जाएगा, जो इसे रडार के लिए अदृश्य बना देगा। यह दुनिया के किसी भी मिसाइल डिफेंस सिस्टम को बेकार साबित कर देगी। इसका नाम डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को समर्पित किया गया है।
1998 के एक छोटे निवेश से शुरू हुआ ब्रह्मोस का सफर आज 58,000 करोड़ के ऑर्डर्स तक पहुंच गया है। भारत अब केवल हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि एक ग्लोबल एक्सपोर्टर बन चुका है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में ब्रह्मोस की तैनाती न केवल मित्र देशों की सुरक्षा सुनिश्चित कर रही है, बल्कि शक्ति का नया संतुलन भी स्थापित कर रही है।

